अंग्रेज़ चले गए, चम्मच छोड़ गए!

“क्या चम्मच मिल सकता है?”

सवाल ने मुझे चौंकाया था। सुनकर कोई भी चौंकेगा। तिरुमाला के विशाल अन्न प्रसादम गृह में, जहाँ एक समय में एक साथ सैकड़ों लोग हाथ से भोजन ग्रहण कर रहे हों, वहाँ किसी एक के द्वारा यह पूछा जाना अटपटा तो लगेगा ही।

मैंने बगल में बैठे उस युवक की ओर देखा। वो अब “स्पून स्पून…” करके उस महिला से मांग रहा था जो बड़ी सी ट्रॉली लेकर चावल परोस रही थी।

अब पता नहीं, उस तेलगु महिला को चम्मच समझ आया या स्पून या फिर इस काले अंग्रेज का हाथ का इशारा, मगर उसने बड़ा सा मुँह बनाते हुए ना में सर हिलाया था और एक कटोरा चावल उसके पत्तल पर परोस दिया था।

और आगे बढ़कर उस काली अंग्रेजन के पत्तल पर चावल कुछ ज्यादा ही उड़ेल दिया था जो अपने पति के साथ स्पून को इशारे में समझाने के लिए अधिक प्रयास कर रही थी।

अपने सामने चावल का पहाड़ देखकर उस काली अंग्रेजन ने बुरा सा मुँह बनाया था। ऐसा मुँह बनाते मैंने किसी अंग्रेज को भी किसी हिल्टन से लेकर ओबेराय होटल में नहीं देखा, फिर चाहे वो मॉन्ट्रियल पेरिस से लेकर लन्दन ही क्यों ना हो।

हर जगह हर बार मैंने हाथ से ही खाया है मगर कहीं भी ऐसी प्रतिक्रिया कम से कम मुझे देखने को नहीं मिली। हां, हिन्दुस्तानियों में चम्मच की दीवानगी अनेक बार पहले भी देखने को मिल चुकी थी।

मैंने एक बार फिर तिरछी निगाहों से किसी तरह देखा, उपरोक्त गौरवर्ण युवती उंगली से चावल के पहाड़ को ऐसे छूने का प्रयास कर रही थी कि पता नहीं क्या अनचाहा छू रही हो।

“यहां तो हाथ से ही खाना पड़ेगा।” पति धीरे से उसे कह रहा था। बोली से बिहार का जान पड़ता था।

“नो, आई कांट…” कहकर उसने उसकी ओर अनमने ढंग से देखा था। आपस में टूटी फूटी अंगरेजी मतलब कोई कॉरपोरेट वाला जोड़ा लग रहा था।

मैंने चारों ओर नजर दौड़ाई, सभी जिन्हे सांबर मिल चुकी थी, अपने अपने हाथ से उसे चावल में सान कर सब्जी से लपेट लपेट कर खा रहे थे।

दक्षिण भारतीय तो पूरी हथेली का सदुपयोग करते हैं। कुछ तो चावल के गोले भी बना कर मुँह में डाल रहे थे। इनमें सभी गांव देहात के हों ऐसा भी नहीं था, शहरी और पढ़ा-लिखा दक्षिण भारतीय, फिर चाहे वो न्यूयॉर्क में क्यों ना हो, हाथ से ही खाना चाहेगा, फिर ये तो वैसे भी देवस्थान है।

ये लोग तो अपने घरों में भी अनेक संस्कारों परम्पराओं का पालन करते हैं। इनके घरों में जूते चप्पल ले जाने की मनाही होती है। जबकि हम उत्तर भारतीयों ने तो अपने घर के रसोई में भी जूते पहनकर जाना अपनी आधुनिकता का पैमाना बना लिया है। बस सिर्फ मंदिर का गर्भगृह ही बचा है वरना हमारा बस चले तो हम बिस्तर पर भी चप्पल के साथ ही सोएं।

बाहर से आने वाले नंगे पैर अगर गंदे हो सकते हैं तो जूते चप्पल कैसे गन्दे नहीं होते होंगे, और वो घर को क्यों और कैसे गन्दा नहीं करेंगे, यह मेरी समझ से बाहर है।

पैरों को तो फिर भी धोया जा सकता है मगर जूतों का क्या करें। उस पर से हमारी सड़कों का क्या हाल है, किसी से छिपा नहीं। मगर आज घर के अंदर चप्पल सहित प्रवेश ही स्वच्छता की निशानी है।

बहरहाल, बगल वाले पति के चेहरे से चिंता का टपकना स्वाभाविक था। आधुनिक भारत की आधुनिक पीढ़ी की युवा जोड़ी। कोई भी उसकी स्थिति को समझ सकता है और जो नहीं समझ रहा वो शादीशुदा नहीं हो सकता।

इस बीच सांबर भी परोस दी गई थी। जिसे संभालना पड़ता है वरना वो केले के पत्ते पर तेजी से फैलने लगती है। और वही हुआ, युवती के पत्तल की सांबर फैलने लगी तो उसने उसे उंगली से रोकने की कोशिश की थी, गरमा गरम सांबर ने वो झटका मारा कि उंगली सीधे मुँह में थी।

स्वाद का तो पता नहीं मगर उसका मूड बिगड़ गया था और लगा कि वो यहां से निकलना चाहती हैं। मगर बीच पंगत से उठती कैसे? वो किसी तरह बैठी रही मगर पति देव ज्यादा परेशान हो रहे थे।

ये लोग भगवान के दरबार में आते ही क्यों हैं, यह सवाल मेरे मन में उठा था।

“हाय” मुझसे रहा नहीं गया तो मैंने बातचीत का सिलसिला छेड़ा था। अंगरेजी में हाय बोलने से जल्दी रिस्पांस मिलता है और मिला भी।

“कहाँ से हैं आप लोग?”

‘दिल्ली, गुड़गांव से’

“नहीं नहीं, ओरिजनली?” मैंने पूछ लिया था।

‘बिहार से’

“आप दोनों?”

‘जी’

बातचीत का सिलसिला चल पड़ा था।

“मुझे आप के यहां का दही-चूड़ा बहुत पसंद है और दही-खिचड़ी भी”

‘अच्छा।!’

“जी, जब भी जाता हूँ, जरूर खाता हूँ, फिर चाहे संक्रांत हो या ना हो, मगर खाता हाथ से ही हूँ, पता है क्यों?”

इस बार उसने कुछ नही कहा था, मगर मैं अपनी बात जारी रखे हुए था,

“… पता है क्यों? क्योंकि अपना घर हो या होटल, चम्मच के साफ़ ना होने की संभावना बनी रहती है जबकि अपने हाथ के साफ़ होने की पूरी गारंटी आपके अपने हाथ में है।”

इस वार्तालाप के बाद वो युवक मेरे साथ कैसा बर्ताव करता, मुझे नहीं पता, क्योंकि बातचीत का अंतिम भाग मैंने अपने मन ही मन कह-सुन लिया था।

हाँ, मैंने उस जोड़े को सुनाते हुए अपने मित्र से यह जरूर कहा था कि अपने हाथ से खाने का मज़ा ही कुछ और है, और कहते हुए मैंने उंगली भी चाटी थी।

“तुझे पता है दुनिया की कोई भी चीज़ ऐसी नहीं है जो हाथ से नहीं खाई जा सके, मगर ऐसी कई हैं जो चम्मच से नहीं खाई जा सकती?”

“जैसे कि?” मेरे मित्र ने भी जानबूझ कर मुझसे पूछा था।

“जैसे कि तिरुपति बाला जी का लडडू, इसे तुम चम्मच से खा कर दिखाओ!”

कहकर मैंने अपने पड़ोस में देखने की कोशिश भी नहीं की थी, क्योंकि मुझे पता था वो युवती मुझे बिना चम्मच के खा जाती।

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