डिजिटल मार्केटिंग : आक्रोश और आरोप के बीच

जिस तेजी से इन्टरनेट फैल रहा है, हम ये दावे के साथ कह सकते हैं कि थोड़े वर्षों बाद ‘डिजिटल मार्केटिंग’ के अलावा कोई मार्केटिंग बचेगी नहीं।

टीवी चैनल्स से ज्यादा प्रचलित होते यू ट्यूब चैनल, अख़बारों की जगह लेते पोर्टल्स के साथ दुनिया डिजिटल होती जा रही है।

इसी डिजिटल मार्केटिंग का एक छोटा सा हिस्सा सोशल मीडिया मार्केटिंग भी है। देश की आबादी का करीब पचास फीसदी युवाओं का है और इनमें से ज्यादातर सोशल मीडिया पर हैं।

ज्यादा उम्र के लोग भी अब सोशल मीडिया का इस्तेमाल सीख रहे हैं तो माना जा सकता है कि भारत की करीब 40% आबादी, निश्चित रूप से सोशल मीडिया का किसी ना किसी रूप में इस्तेमाल कर रही है।

‘हा हुसैनी परम्परा’ के लोग मेरी गिनती की कमियां निकालना शुरू करें, इस से पहले ही हम ये भी याद दिला दें कि टीवी के दर्शकों की गिनती इस बात से नहीं जोड़ी जाती कि कितने टीवी बिके हैं। गिनती जोड़ते समय ये याद रखा जाता है कि एक घर में लगा टीवी औसत 4-5 लोग देख रहे होंगे। ऐसे ही अख़बारों को पढ़ने वालों की गिनती में भी होता है।

अगर आप अपना टिन का चश्मा उतार लें, तो आस पास ही कहीं ऐसे जोड़े नजर आ जायेंगे, जो एक एक मोबाइल में वीडियो एक-एक कान में इयरफोन लगाए देख-सुन रहे हैं। इन्टरनेट पर या सोशल मीडिया पर बिखरे पड़े संदेशों को देखने-पढ़ने वालों की गिनती भी ऐसे ही ज्यादा होती है। कोई अच्छा सन्देश आपने अपने किसी मित्र को अपने मोबाइल से पढ़ने दिया, या कोई वीडियो दिखाया तो उसे भी जोड़ा जाना चाहिए।

परम्परागत विज्ञापन के तरीकों में एक दिक्कत ये होती थी कि आपका सन्देश प्रसारित हुआ, ये तो आप जानते थे, मगर कितने काम के लोगों तक पहुंचा ये नहीं पता होता।

जैसे करीब हर रविवार, परीक्षा केन्द्रों पर प्रचार के जो पर्चे बांटे जाते हैं, वो वहीँ कहीं सड़क पर फेंके हुए दिखते हैं। हज़ार पर्चे बांटे गए ये तो कोई भी बता देगा, लेकिन उनमें से कितनों को देखा-पढ़ा गया, ये कोई नहीं जानता। ऐसा ही टीवी के विज्ञापनों में भी होगा, किसने कब चैनल बदल लिया, ये आंकलन मुश्किल है।

इसकी तुलना में डिजिटल मार्केटिंग के जरिये किये विज्ञापन कितने लोगों तक पहुंचे ये इन्टरनेट फ़ौरन बता देता है। कितना वक्त उस पेज पर गुजरा, किस-किस हिस्से पर ध्यान दिया और कहाँ नहीं, ये तक बताया जा सकता है। यहाँ नापने के पैमाने बेहतर हैं।

मार्केटिंग का काम ही गिनती पर चलता है, इसलिए गिनती में बेहतर होना डिजिटल मार्केटिंग को बेहतर बना देता है। ये आप ऐसे भी देख सकते हैं कि कैसे बड़े राजनैतिक दल इसपर मोटी रकम खर्च करने लगे हैं।

योगेन्द्र ‘सलीम’ यादव जो आजकल आयकर विभाग के छापों का रोना रो रहे हैं, वो कभी ऐसे ही एग्जिट पोल करना कांग्रेस को सिखाते थे। उनके बाद डिजिटल माध्यम लेकर और लोग आये और फिर कैंब्रिज ऐनालिटीका जैसे मामलों में करोड़ों की रकम भी अज्ञात पक्षकारों ने कमाई।

राहुल गाँधी के सोशल मीडिया मैनेजर को कैमरा लिए खदेड़ते रिपब्लिक के पक्षकार का वीडियो भी काफी चर्चित रहा था।

सोशल मीडिया की चर्चा इसलिए भी, क्योंकि हाल में भारत की सत्ताधारी पार्टी भी अपने सोशल मीडिया बैठकों के लिए खूब चर्चित रही है। आज ऐसा ही भाजपा सोशल मीडिया मीट का आयोजन पटना में था।

ख़बरों के मुताबिक इस बैठक में भाग लेने के लिए प्रदेश भर से 12000 के करीब लोग आये थे। ख़बरों की छोड़ भी दें तो दिन भर पटना शहर का जैसा हाल देखा है उसके हिसाब से ये गिनती कम बताई गई है। इस से शायद ज्यादा ही लोग आये हैं।

इतने बड़े स्तर के आयोजन के बाद डिजिटल मार्केटिंग के लिहाज से इस सोशल मीडिया मीट की सफलता कैसे आंकी जाए? ये आसान काम है। अगर 2000 से अधिक लोग एक #हैशटैग के साथ ट्वीट कर दें, तो वो ट्रेंड में नजर आने लगेगा। 10000 अलग अलग ट्वीट अगर एक हैश टैग इस्तेमाल कर दें, तो वो टॉप ट्रेंड में पहुँच जाएगा।

ये स्थिति कुछ ऐसी होगी कि इस सोशल मीडिया मीट में क्या चर्चा हुई उसे आपको ढूंढना नहीं होगा। आप नहीं भी चाहेंगे तो भी वो आपकी न्यूज़ फीड में दिखाई देगा। अब बताइये क्या आपको पता है कि इस सोशल मीडिया मीट में क्या चर्चा हुई? नहीं पता है क्या!

अगर इस बैठक में हुई चर्चाओं कि खबर आप तक सोशल मीडिया के जरिये नहीं पहुंची है तो कुछ बातें गौर करने लायक हैं। अपुष्ट ख़बरें बताती हैं कि भारत भर में सिर्फ सोलह प्रतिशत के लगभग जिलों में भाजपा के पास सोशल मीडिया की टीम है, उसमें से भी 80% लोग नौसिखुए हैं।

इसी को बिहार पर लागू करें तो यहाँ शायद 4-5 जिलों में भाजपा के पास टीम होगी। तो कुल 12-15 हजार लोग जो आये थे उनमें से 250 (5 जिले गुना 50 लोग प्रति जिला) ही सोशल मीडिया वाले थे।

यहाँ आये ज्यादातर लोग किसान हैं, जिन्हें सोशल मीडिया चलाना नहीं आता। एक दिन की तथाकथित कार्यशाला में इन्होंने कुछ सीखा हो तो वो सोशल मीडिया पर जल्दी ही दिखेगा, ऐसी उम्मीद जरूर की जा सकती है। उम्मीद जरूर रखनी चाहिए क्योंकि उम्मीद पे दुनिया कायम है।

काम की बात ये कि ब्लॉगिंग या सोशल मीडिया, कंटेंट के आधार पर चलता है। फर्जीवाड़े से आप एक दो दिन आगे निकल सकते हैं, लेकिन साल भर भी टिके रहना मुश्किल है। आपकी रोज की तस्वीरों में भी किसी की रूचि नहीं होती इसलिए भाजपा सांसदों-विधायकों के फेसबुक पेज कुछ ख़ास काम नहीं आने वाले।

जो मंत्री हैं वो नीतियों की चर्चा ना करें, संसद की बहसों की बात सांसद के फेसबुक पेज पर ना हो, स्थानीय मुद्दों पर विधायक महोदय की कोई राय ही ना हो, तो भला क्यों कोई बार-बार उन्हें देखेगा?

इन्टरनेट की दुनिया में ‘कंटेंट इज़ द किंग’ एक बहुत पुराना जुमला है। समस्या ये है कि ये शाह साहब के ‘पंद्रह लाख’ जैसा जुमला नहीं, ये बार बार सच हो जाने वाला ‘जुमला’ है!

भारत की आबादी का एक बड़ा वर्ग पिछले पांच सालों में अट्ठारह की उम्र पार कर चुका है। ये अगले लोकसभा चुनावों में पहली बार मतदान करेगा। नैरेटिव भी कंटेंट से ही बनता है, ये भी सोचना चाहिए।

बाकी सत्ता की जिम्मेदारियां कई बार सोचने की फुर्सत नहीं भी देती। भागदौड़ के बीच सोचने का समय कहाँ मिलता है? भागदौड़ से कभी फुर्सत हो तब सोच लेंगे, आज ही सोचना जरूरी भी नहीं, चुनावों में अभी देर है!

मैं कम्युनिस्टों का पक्का दुश्मन हूँ : डॉ बाबा साहेब अंबेडकर

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