Jio Institute : कम्युनिस्ट सोच बदल कर, शिक्षा-उद्योग को साथ साथ चलना होगा

Photo courtesy : http://www.cdri.res.in/

बात IIT से लेकर आने वाले जिओ इंस्टिट्यूट तक की चली है तो लोगों को मालूम होना चाहिए कि IISc, TIFR की स्थापना उद्योगपति टाटा समूह ने की थी। BITS पिलानी और BIT मेसरा अलग अलग बिड़ला समूह के हैं।

एक और महान शिक्षाविद थे प्रो विक्रम साराभाई जो कि एक धनी उद्योगपति परिवार से थे, उन्होंने डॉ सी वी रमन के अंतर्गत Ph D की थी। उनका विज़न था और उन्होंने भारत में IIM, ISRO और IFR की स्थापना किया था।

प्रो विक्रम साराभाई को अम्बालाल साराभाई समूह उद्योग, साराभाई केमिकल, सिट्रॉनिक्स से लेकर ISRO के लिए बैंगलोर, पुणे, अहमदाबाद में 450 से ऊपर इकाइयां खुलवाने का भी श्रेय है। शिक्षा और उद्योग का नाता होता है।

शिक्षण संस्थान से निकले लोग शिक्षण संस्थान की मदद से उद्योग को शुरू करें वो हितकारी होता है। उद्योग संस्थान भी शिक्षण संस्थान लगाएं, ये दुनिया भर में प्रचलित है क्योंकि अच्छे संस्थान से ही उद्योग को चलाने वाले लोग निकलते हैं।

आज हम रिलायंस के शिक्षा में उतरने की बात पर इतना उद्वेलित क्यों हैं? आखिर क्यों सरकार को निजी संस्थाओं/ व्यक्तियों को बुलाकर संस्थान लगाने की नौबत ही आई?

क्योंकि जब IIT, NIT, CSIR आदि बने तो उनका लक्ष्य था कि भारत में ज्यादा उद्योग लगें, विज्ञान की क्रांति हो। लेकिन क्या इतने वर्षों में IIT, CSIR या अन्य इस दिशा में आगे बढ़ पाए, ये समझना होगा।

उदाहरण के लिए एक प्रोडक्ट लेते हैं… Antibody.

भारत में हर यूनिवर्सिटी, IIT, CSIR, ICMR, ICAR करोड़ों अरबों की antibody हर वर्ष खरीदते हैं। अमेरिका और यूरोप प्रमुख सप्लायर हैं। इधर 5 – 7 वर्षों से चीन भी खूब बना रहा है और एक्सपोर्ट कर रहा है।

हम कहाँ हैं?

इतना बड़ा CSIR और ICMR, सबको बड़ी बड़ी ग्रांट, लेकिन कभी किसी ने Antibody खुद बनाने की बात ही नहीं सोची।

लखनऊ Antibody की खरीदी का गढ़ है – SGPGI, KGMC, CDRI, लोहिया संस्थान, NBRI, CIMAP, IITR, ERA, Amity और कुछ अन्य प्राइवेट संस्थान सब मिलकर करोड़ों खर्च करते हैं antibody खरीदने में। यहाँ की CSIR लैब का बड़ा नाम है लेकिन एक अदद antibody नहीं बनाते है।

भारत में antibody जितने इम्पोर्ट होते हैं उसका 1% भी अगर भारत में बना लिया जाता है और कुछ कंपनी इसके दम पर खड़ी हो सकती हैं तो वो न सिर्फ रोज़गार दे सकती हैं बल्कि विदेशी निर्भरता और मुद्रा दोनों बचा ले जाती।

सब कुछ है – भवन, animal house, लैब, कीमती उपकरण, लेकिन नहीं है तो बनाने की चाह और सिस्टम। गलती ये भी है कि सिस्टम द्वारा संस्थानों को B. Tech, M. Tech, MBBS, Ph. D की डिग्री पाने और देने का स्थान बना दिया गया। सिस्टम ने कभी कहा ही नहीं कि कोई वैज्ञानिक अगर कुछ बनाता है तो उसकी कंपनी भी वो खुद ही या उसके स्टूडेंट खड़ा कर सकते हैं।

शिक्षा पर कम्युनिस्ट छाप साफ़ दिखाई देती है – सब कुछ गोपनीय है। सब गोपनीय ही रखना है तो मत्था काहे मारा जाए। इसी चक्कर में सब पिछड़ता चला गया।

दुनिया भर में, अमेरिका, यूरोप, जापान, सिंगापुर के शिक्षण और औद्योगिक संस्थान साथ साथ चलते हैं, उद्योग बनाते हैं शिक्षण संस्थान और शिक्षण संस्थान से निकलते हैं वैज्ञानिक – उद्योगपति, दोनों मिलकर देश को उचाईयों पर ले जाते हैं।

फिलहाल मोदी सरकार ने सिस्टम को दुरुस्त किया है और शिक्षण संस्थान अपने यहाँ उद्योग के लिए सौंपने incubate करने को स्वतंत्र हैं ..

हमारे देश में उद्योगपति – व्यवसायी मतलब ‘खून चूसने वाला’ – यही इमेज बनाई गयी है। अम्बानी – अडानी नाम बोलकर उद्योगपतियों और व्यवसाइयों से चिढ़… ये हमको हमारी कम्युनिस्ट शिक्षण प्रणाली से विरासत में मिला है और दिमाग में ठूंस ठूंस कर भरा गया है।

इस कम्युनिस्ट सोच को बदलना होगा। शिक्षा – उद्योग को साथ साथ चलना होगा। एक उदाहरण देता हूँ, एक कंपनी है पुर्तगाल में Nzytech जिसको 2008 में Lisbon University के एक प्रोफेसर ने बनाया था, सिर्फ 3 उत्पाद थे।

अब 10 वर्षों में इसके 1000 से ऊपर उत्पाद हैं और भारत समेत 30 देशों में एक्सपोर्ट करती है मॉलिक्यूलर बायोलॉजी के प्रोडक्ट्स। जितने आसान इसके प्रोडक्ट हैं और यूनिवर्सिटी के एक लैब में शुरू की गई, वो आसानी भारत का CCMB, IIT, CDRI, NIV, कोई ICAR का वैज्ञानिक शुरू कर सकता था, लेकिन नहीं हुआ और हम इस पिद्दी सी कंपनी से इम्पोर्ट कर रहे हैं।

एक और उदाहरण है मेरे पास – 2010 में फ्रांस में एक कंपनी में जाने का मौका मिला Lamy नाम की। सिर्फ 2000 स्क्वायर फिट में Lyon University से सहयोग से बनी कंपनी आज भारत समेत 153 देशों में अपना उत्पाद निर्यात कर रही है। हम कितनी ऐसी कंपनी बना पाए?

जब तक शिक्षण संस्थान – औद्योगिक संस्थान एक दूसरे के साथ हाथ मिलाकर नहीं चलेंगे, बस वही घिसी पीटी लकीर पर रहेंगे। कोई विकास क्रान्ति नहीं हो सकती।

आजकल लखनऊ के CDRI को बहुत सारे Youth Scientists ने ज्वाइन किया है। उनमें से अगर कुछ आगे बढ़ के Nzytech जैसी मॉलिक्यूलर बायोलॉजी, immunology आधारित या एक – दो antibody ही बनाने का काम शुरू करके कोई कंपनी बना सकें तो बहुत ख़ुशी होगी।

मैं उनके साथ बिना किसी चाह के इंडस्ट्री – इंस्टीट्यूशन सहयोग और कोलैबोरेशन को आगे बढ़वाने के लिए अपने क्षमताओं का योगदान देने को तैयार हूँ। मेरा खर्च मेरे काम से चल ही रहा है।

भारत को अमर बोस जैसों की जरूरत है जो न सिर्फ उद्योग खड़ा करें, बल्कि MIT जैसे विश्स्तरीय संतान के शेयरहोल्डर भी हों। और संस्थानों को उच्च स्तर तक लेकर जाएं। Jio Institute खुलने पर अम्बानी समूह द्वारा ही ऐसा होने की आशा कम से कम मैं तो रखता हूँ। Welcome Jio Institute…

जब 8वीं फेल और ग्रेस से 12वीं पास लोग शिक्षा पर बोलें, तो समझिए माजरा क्या है!

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