सती और हलाला

मैं खुद को समाजशास्त्र का छात्र मानता हूँ, और समाज की रीतियों और प्रथाओं के उगम और प्रसार के कारण खोजने के प्रयास करता रहता हूँ।

हलाला की प्रथा का उगम खोजने पर पता चला कि उसका उगम उतना बुरा नहीं है जितना उसका आज का स्वरुप है।

अरब द्वीपकल्प में जहां इस्लाम का उदय हुआ, विवाह-विच्छेद एक आम बात थी। समाज बड़ा खुले विचारों का था।

इसका अनुमान आप इस बात से लगा सकते है कि खुद रसूलल्लाह की (पहली) पत्नी एक विधवा थी, अपना व्यापार चलाती थी, और जब उन्होंने रसूलल्लाह का चयन पति के रूप में किया तब उनकी उम्र लगभग 40 की थी, और रसूलल्लाह लगभग 25!

आज के समाज में सारे विश्व में कहीं भी ऐसा जोड़ा असाधारण माना जाएगा। लेकिन छठे शताब्दी के अरबस्तान में यह बड़ा सहज मिलाप था।

उस समय का समाज आज जितना स्थिर नहीं था, और न ही विवाह सम्बन्ध स्थिर थे। स्वयं रसूलल्लाह के परिवार में, खास कर उन की बेटियों के वैवाहिक जीवन में कई बार सम्बन्ध विच्छेद का उल्लेख आता है।

जितना पढ़ा है उस से यही प्रतीत होता है कि समस्या यदि हो, तो अविवेकी और बेहद सरल तलाक की ही हो सकती थी!

हो सकता है कि कई बार पति भावावेश में तलाक दे देता, और न चाहते हुए भी सम्बन्ध विच्छेद हो जाता, जिसके बाद पति और पत्नी का साथ रहना अनैतिक हो जाता।

उस समय अकेली स्त्री के लिए रोटी, कपड़ा और मकान का जुगाड़ कठिन था, और इस प्रकार अकारण घर टूटना, परिवार बिखरना अवांछित हुआ करता था।

याद रहे कि अवयस्क बच्चे अपनी माँ के साथ ही रहते, और उन से बिछड़ना सनकी तलाकवीरों के लिए भी बेहद पीड़ादायी होता होगा।

रसूलल्लाह ने इस पर उपाय लागू किया – लेकिन शायद इसी उपाय ने पुरुषप्रधानता के बीज बोए, जो आगे चल कर एक सामाजिक विषवल्ली के रूप में उभरे –

नया नियम यह था कि यदि ऐसा अविचारी तलाक दे दिया जाए तो दो बार तो उस तलाक़ को वापस लिया जा सकता है, लेकिन तीसरी बार यदि तलाक हो जाता है, तो पति-पत्नी विभक्त हो ही जाने चाहिए।

अब बार बार कोई व्यक्ति अपने पत्नी को तलाक दे उसे वापस ले रहा है तो स्पष्ट है कि वह प्रावधान का मज़ाक उड़ा रहा है। ऐसी स्थिति पनपने देना उचित नहीं। इसलिए विभक्त होने के लिए कहा गया होगा।

उस के बाद उन दोनों को अपने अपने पसंद के कोई और साथी चुनने को कहा गया है, जो सही भी है। अब यदि नया सम्बन्ध टिक नहीं पाता तो पुराने साथी साथ हो लेने में कोई आपत्ति होनी नहीं चाहिए, और वैसा ऐलान भी हो जाता है।

यदि आप इस पूरे प्रावधान का ठीक आकलन करें, तो उसमें आपत्तिजनक कुछ है ही नहीं। हाँ, कुछ पुरूषप्रधानता की बू ज़रूर है, लेकिन असहनीय नहीं!

लेकिन समय के चलते इस चलन को एक भयानक रूप दिया गया, जिस में स्त्री को एक भोग्यवस्तु के समकक्ष ला कर खड़ा किया गया। महज तीन बार ‘तलाक’ शब्द के उच्चारण को तीन बार का सम्बन्ध विच्छेद मान लिया गया, क्यों कि समाज के तथाकथित ‘धुरीणों’ को इस में अपना स्वार्थ दिखाई दिया।

और इस तरह दमन, शोषण का एक अनवरत चक्र चला, जो पिछली 14 सदियों से चला ही आ रहा है। आज विश्व भर की 75 करोड़ मुस्लिम महिलाएं इस दुष्टचक्र का शिकार हैं।

ऐसा नहीं है कि समूचे विश्व के सारे दोष केवल मुस्लिम धर्म में है। हिन्दू धर्म भी कुरीतियों से अछूता नहीं है। छुआछूत, दहेज़, बाल विवाह, सती प्रथा, और कई भयानक अत्याचार हिन्दू धर्म में भी हुए है। लेकिन इन रीतियों और मुस्लिम प्रथाओं में एक मौलिक अंतर है –

हिन्दू धर्म के किसी भी अन्यायपूर्ण और अविचारी प्रथा को हिन्दू समाज के नेता और आम सदस्य से कोई समर्थन नहीं मिलता। यदि कोई आज कहे कि वह छुआछूत मानेगा, और अपने परिवार के विधवा स्त्री को उस के पति के चिता पर जला कर मारेगा, तो एक तो वह कारावास में सड़ेगा – हिन्दुओं ने अपने धर्म को सुधारने के लिए कई क़ानून बना कर कार्यान्वित कर दिए है। दूसरे ऐसे दुःसाहस का दोषी, समाज में खुद को बहिष्कृत पाएगा – कोई भी उसका पक्ष लेने से कतराएगा!

इस के ठीक विपरीत मुस्लिम कुरीतियों के पुरस्कर्ता खुद उन कुरीतियों से लाभान्वित होते है और उन्हें आगे चलाने के लिए राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय समर्थन का जुगाड़ कर लेते है। जो कोई समाज सुधारक इन कुरीतियों को गलत कहेगा उसका बहिष्कार हो जाएगा। उसका हुक्का-पानी बंद हो जाएगा, उससे कोई रोटी-बेटी व्यवहार नहीं करेगा, और मामला और संगीन हुआ तो उसको मार गिराने की आज्ञा करनेवाला फतवा जारी होगा!

इसीलिए मैं हिन्दू धर्म को पुरोगामी और इस्लाम को प्रतिगामी करार देता हूँ। हिन्दू धर्म में पाया जानेवाला स्वातंत्र्य जब मुझे इस्लाम में मिले, शायद मैं उसे अपना भी लूँ! पर मेरा दावा है कि ऐसा स्वातंत्र्य इस्लाम जब अनुयायियों को देगा तब वह इस्लाम के रूप में बचेगा ही नहीं, शायद वह हिन्दू धर्म में परिवर्तित हुआ दिखेगा!

इसलिए अपने भाग्य पर खुश रहो मित्रों, आप को पता नहीं है आप कितने भाग्यशाली है – केवल हिजाब उतारने भर के लिए 2 वर्ष का कारावास और 8 वर्ष दोष का कलंक जिसे आज मिला है, उस ईरानी लड़की से पूछो व्यक्तिगत स्वातंत्र्य का मूल्य क्या होता है!

क़ुरान के विवाह विच्छेद सम्बंधित उद्धरणों के अर्थों का यह पृष्ठ इस पर के आधिकारिक विचार को स्पष्ट करता है। किन्तु अत्यधिक विश्लेषण और अपनी डींग हांकने के प्रयासों ने मूल अर्थ को अस्पष्ट किया है। पढ़िएSurah Al-Baqarah 2:222-230 Towards Understanding the Quran

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