MSME हब तैयार नहीं होंगे तो कस्बों की तरफ़ नहीं आएँगे बड़े कारखाने

मेक इन इंडिया एक महत्वाकांक्षी प्रयास है। बड़े कारखाने जैसे सैमसंग, अल्स्टॉम, लॉकहीड मार्टिन या फिर अन्य बड़ी और स्थापित कंपनियां लग रही हैं। लेकिन जब तक MSME (Micro, Small & Medium Enterprises अर्थात सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम) मज़बूत नहीं होगा, इकॉनमी मज़बूत नहीं हो सकती।

दिल्ली, मुंबई, पुणे, अहमदाबाद, बंगलोर, चेन्नई, हैदराबाद जैसे शहर और बड़े होते जाएंगे लेकिन क्या होगा लखनऊ, बनारस, जबलपुर, रांची, कटक, गोरखपुर, समस्तीपुर, तिनसुकिया, सिल्चर या इन जैसे अन्य 2, 3, 4 कैटेगरी के शहरों या कस्बों का?

इन जगहों पर बड़ी कंपनी का आना मुश्किल। आएं तो किसके बूते क्योंकि इधर MSME के नाम पर कुछ भी नहीं।

पिछले 2 वर्षों से अपने प्रोडक्ट्स बनाने के दिशा में काम करना चालू किया। तीन बार से मार्किट लांच की डेडलाइन बढ़ती जा रही है अक्टूबर 2017, मार्च 2018 और फिर जुलाई 2018 लेकिन अभी भी समय नहीं आया।

इसके पीछे के कारण बहुत से हैं। लखनऊ कानपुर में कोई ढंग की मेटल और प्लास्टिक प्रोसेसिंग यूनिट नहीं है, PCB बनता नहीं, मशीन का कैबिनेट बनाने के लिए दिल्ली जाइए और दिल्ली तथा आस पास वाले चालू काम करके दुगुना पैसा वसूलने के लिए मशहूर हैं।

आगे बढ़िए, अहमदाबद या मुंबई जाइए। इनके पास लोकल इतना काम है कि यूपी – बिहार से आया हर आदमी भइया है। चालू काम करके टरकाने के फेर में लगे रहते हैं, और खर्च भी ज्यादा, जिससे लागत बढ़ जाती है और माल महंगा हो जाता है।

क्या फायदा?

अभी मुंबई और बड़ोदा की दो कम्पनी से फुल पेमेंट करके सामान मंगा रहा हूँ लेकिन मार्च माह से कुछ न कुछ करके समय आगे बढ़ा रहे हैं या फिर शॉर्ट शिपमेंट कर दी और बचा माल अभी तक नहीं भेज पाए।

अब सब इकठ्ठा को तो जोड़-जाड़ के कैसे देखा जाए कि अपना सामान ठीक बना या नहीं। 2 साल से वहीँ, जहाँ से शुरू किया था, लेकिन पैसे खर्च हो गए औकात से बाहर।

कारणों में एक Product continuity बड़ी समस्या है। कोई भी एक प्रोडक्ट स्टैण्डर्ड का नहीं। एक का पार्ट दूसरे में फिट नहीं होता।

उदाहरण के लिए पावर प्लग देखिए। एक बड़ा ब्रांड है Anchor लेकिन अक्सर खोलने पर अंदर के पेंच गायब रहते हैं। एक Three Plug top दूसरे socket में नहीं लगता। कोई इतना ढीला कि स्पार्किंग का खतरा या फिर टाइट इतना कि एक-दो माह में पूरा बोर्ड उखड़ के बाहर।

यहीं यूरोप, अमेरिका या चीन से आए सामान में continuity और repeat-ability देखिए कितना शानदार होती है। ऐसा नहीं कि हम भी नहीं बना सकते लेकिन वही lack of professionalism and Wisdom की समस्या है।

अब अगर आपके सप्लायर के प्रोडक्ट में continuity और repeat-ability नहीं तो वही आपकी भी गत होना है। आपका प्रोडक्ट चालू बाजार में तो चल जाएगा लेकिन कम्पटीशन में फेल हो जाएगा और आप चित्त हो जाएंगे।

ट्रांसपोर्टेशन महा भयंकर समस्या है। पैसा देकर Blue Dart, TCI से ट्रांसपोर्ट करिए, चाहे सस्ते कैरियर से करिए लेकिन 50% आपका सामान टूटा हुआ ही मिलेगा। आप लाख Handle With Care, Glass Inside, छाता का निशान बना लें आपका डब्बा उलटा ही मिलेगा।

किसी ट्रांसपोर्टर के यहाँ सामान उठाने उतारने को प्रोफेशनल स्टाफ और गैजेट नहीं है। उनक एक ही तरीका – उठाना और फेंकना, अपना क्या जाता है अगले के नुक्सान से हमें क्या! पूरी तरह से आवारा टाइप हरकत।

अपना कल ही Rs.1 लाख 15 हज़ार का सामान पूरी तरह टूटा पहुंचा है, समझ नहीं आ रहा क्या किया जाए। सब बेकार हो गया। लोहे का कबाड़ बन गया।

बीमा कराओ तो भी कोई फायदा नहीं। सामान पहुँचने के 3 दिन के भीतर इंस्पेक्शन कराओ, नहीं तो भागो। अब 3 दिन में कहीं पहुँचने की टिकट मिल नहीं सकती भारत में। पूर्वोत्तर हो तो और भी बुरा हाल। एक माह से पहले टिकट नहीं मिलेगी। Safe transportation is big problem in India.

समस्या है प्रोफेशनल और स्किल्ड लोग। इन लोगों को मालूम ही नहीं कि कैसे समय रहते काम पूरा करना है। Short shipment कैसे बड़ी परेशानियां खड़ी करता है, ये सोचने की शक्ति ही नहीं है।

ट्रासंपोर्ट, रेल या कूरियर से टूटा सामान पहुंचाना मतलब आपने किसी का लाखों का नुक्सान कर दिया और वो शायद इस वजह से बर्बाद हो सकता है। इन सबके सामने रोज ही ऐसे केस आते हैं लेकिन कोई असर नहीं। वही, सब चलता है वाला attitude चलते जा रहा है।

बेरोजगारों की लम्बी भीड़ है देश में, लेकिन इस भीड़ में ढंग का वेल्डर, फिटर, लोडर, सोल्डरिंग करने वाला, ट्रांसपोर्ट करने का तरीका जाने वाला, पैकिंग करने वाला, यहाँ तक कि स्टॉक तक गिनने और एंट्री करने वाला इस भीड़ में मौजूद नहीं है।

बड़ी बड़ी डिग्री है लेकिन साइन करने के अलावा कोई काम करने की दक्षता मौजूद नहीं। ढंग का प्रोफेशनल नहीं होने से कहीं भी किसी भी शहर या कस्बे में MSME का हब तैयार नहीं हो पा रहा।

जब तक MSME का हब तैयार नहीं होता तब तक बड़े कारखाने कस्बों की तरफ़ नहीं आएँगे और न पलायन रुकेगा और न ही बेरोजगारों की लम्बी भीड़ में कोई कमी आएगी।

डिग्री लेकर लखनऊ, पटना, दिल्ली आके कुछ वर्ष सरकारी नौकरी की तैयारी करना और लाखों की भीड़ में कुछ हज़ार नौकरी में से एक नहीं पाने के बाद सिस्टम को कोसते हुए कहीं अन्यत्र पलायन करना या फिर वापस आने गाँव देहात में frustrate होकर सारी जिन्दगी कुढ़ते हुए गुजारना।

समय रहते ही इस भीड़ को दक्ष कर्मकार बनना होगा, नहीं तो ये भीड़ बढ़ती जाएगी। इस विस्फोट को रोकने के लिए समाज को खुद जागरूक और सिस्टम को इस अनुरूप बनना होगा।

Comments

comments

loading...

LEAVE A REPLY