जब सेनापति ही हाथ खड़े कर दे तो समर्पण की मुद्रा में आ ही जाएगी फौज

नेताओं के दरबार में जाना मुझे हमेशा कठिन काम लगा है… मोको कहाँ सीकरी सो काम.

आज लंदन में भाजपा नेता रविशंकर प्रसाद का दरबार लगा था. स्टैनमोर में आज इनका “चार साल बेमिसाल” कार्यक्रम था.

जैसी कि नेताओं की आदत है, दो घंटे देर से आये, दो घंटे सरकार के आंकड़े सुना कर पकाया और फिर चल दिये.

सवाल पूछने का समय हुआ तो कह दिया कि देरी हो रही है, सो सिर्फ तीन-चार सवालों के जवाब देंगे.

पता नहीं क्यों इतने अच्छे मौसम में रविवार की सुहानी शाम को ओवरसीज़ फ्रेंड्स ऑफ बीजेपी के इस आयोजन के लिए बर्बाद करने का फैसला किया.

वहाँ जाकर मुझे तो समझ में ही नहीं आया कि यह बन्दा यहाँ करने क्या आया था? ये नेता लोग एकतरफा प्रलाप करते हैं, सिर्फ ट्रांसमिशन ऑन होता है, रिसेप्शन का स्विच परमानेंट ऑफ रहता है…

खैर, नेताओं का तो जो स्तर है वह है ही. कार्यकर्ताओं की यह हालत हो रखी है कि नेता के साथ एक सेल्फी के लिए मरे जा रहे हैं. लोगों ने क्या धक्का मुक्की की सेल्फी के लिए. वह भी रविशंकर प्रसाद के स्तर के नेता के साथ.

योगी-मोदीजी के साथ सेल्फी लेनी हो तो कुछ लोकप्रियता या फैन फॉलोइंग समझ में आती. यह तात्कालिक स्टारडम देकर आप उनका कितना नुकसान कर रहे हैं, यह समझ नहीं रहे.

हो सकता है 2019 की मई के बाद उनके हाथ देने से ऑटो वाला भी ना रुके… और आज आप सेल्फी के लिए उसका दिमाग फिराए हुए हो…

पर उससे भी भयावह एक और बात दिखाई दी.

नेताजी के भाषण के बाद कुछ लोगों ने भारत माता की जय और वन्दे मातरम के नारे लगाए. तब मैंने पीछे से जोर से नारा लगाया – जय श्रीराम…

छोटा सा हॉल था, कुल जमा दो सौ लोग थे. और मेरी आवाज़ कोई इतनी हल्की भी नहीं है… पर लोगों को साँप सूँघ गया. मुश्किल से तीन चार आवाजें आईं जवाब में. मैंने दुबारा नारा लगाया, तो इस बार वो चार आवाज़ें भी खामोश थीं.

फिर प्रश्न-उत्तर सेशन में पटना के एक डॉक्टर साहब ने पूछ दिया कि मेरी इंग्लैंड में चार जगह प्रॉपर्टीज़ है… पर मेरी हार्दिक इच्छा है कि मैं भारत के अभिन्न अंग कश्मीर में लाल चौक पर एक मकान खरीदूँ… यह कब तक संभव हो पायेगा?

मैंने साथ खड़े एक बनारसी बन्दे को तैयार किया कि जब रविशंकर जी इस प्रश्न का उत्तर देना समाप्त करें तो हम भी उन्हें याद दिलाएँ कि इस प्रश्न पर भाजपा का स्टैंड क्या है…

तो जैसे ही रविशंकर जी ने अपना गोल मोल उत्तर पूरा किया, हमने मिल कर नारा लगाया – जहाँ हुए बलिदान मुखर्जी… वह कश्मीर हमारा है…

इस बार सबने कुछ ऐसी वक्र दृष्टि से हमें देखा जैसे ये हुड़दंगी कहाँ से आ गए. यह तो सुना था कि सत्ता की कुर्सी के पेंदे में चिमटे लगे होते हैं और उसपर बैठते ही नेताओं का साहस नोच कर निकाल लिया जाता है.

पर यह बीमारी गहरी होती जा रही है, नेताओं से निकल कर कार्यकर्ताओं तक पहुँच रही है. भाजपा पूर्ण पतन की ओर अग्रसर है.

क्या आपने सोचा था, वह दिन भी आ रहा है जब भाजपा की रैली में “…कश्मीर हमारा है” या “जय श्रीराम” के नारे लगाने पर आपकी ओर वक्र दृष्टि से देखा जाएगा? जब सेनापति ही हाथ खड़े करके खड़ा हो जाये तो फौज तो समर्पण की मुद्रा में आ ही जाएगी.

प्रश्नोत्तर सत्र में किसी ने पप्पू और प्रेस्टीट्यूट के बारे में कुछ कह दिया. जनाब मिमियाने लगे कि मीडिया को प्रेस्टीट्यूट कहना उचित नहीं है. हम लोकतंत्र हैं और लोकतांत्रिक व्यवस्था में मीडिया का सम्मान होना चाहिए…

मैं तो सुलग गया. मैं तो घर से सोचकर गया था कि उनसे शराफत से यह प्रश्न पूछूँगा कि मीडिया का यह जो देश को तोड़ने का एजेंडा है, यह देश में गृहयुद्ध फैलाने का जो षड्यंत्र रचा जा रहा है… उस मीडिया को नियंत्रित करने और राष्ट्रहित के प्रति जवाबदेह बनाने के लिए आपकी क्या योजना है? झूठी और द्वेषपूर्ण रिपोर्टिंग रोकने के लिए मीडिया एकाउंटेबिलिटी बिल जैसा एक बिल बनाने के बारे में आपकी क्या राय है. पर ये साहब तो लोकतंत्र में मीडिया के महत्व का गुणगान करने में लग गए.

मैंने उन्हें टोक कर कहा, पूरा देश सहमत है कि मीडिया प्रेस्टीट्यूट है. आप कानून मंत्री हैं… मीडिया की हरकतों को कानून के दायरे में लाने के लिए आपने पिछले चार वर्षों में क्या किया है?

जवाब तो ना मिलना था, नहीं मिला. समझ में आता है, क्यों यह भाजपा प्रवक्ता थे तो रोज टीवी चैनलों पर बेइज्जत होकर दाँत निपोरते दिखाई देते थे. भाजपा वालों का मीडिया के सामने यह दीनभाव सचमुच बहुत दयनीय लगता है.

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