मगर ये तो कोई न जाने, कि मेरी मंज़िल है कहाँ…

मैं एक से अधिक बार बता चुका हूँ कि ज़िंदगी का पहला उपन्यास नौ साल की उम्र में पढ़ा था, घनघोर रोमांटिक, पाकिस्तानी लेखक ए. हमीद का, चोरीछिपे पढ़ना था, सो लगभग 40-50 मिनट में ख़त्म कर दिया था, उस उपन्यास का नशा/जादू ऐसा चढ़ा कि आजतक कम नहीं हुआ…. वगैरह-वगैरह… बड़े राजकुमार ज्योतिर्मय जी … Continue reading मगर ये तो कोई न जाने, कि मेरी मंज़िल है कहाँ…