मगर ये तो कोई न जाने, कि मेरी मंज़िल है कहाँ…

मैं एक से अधिक बार बता चुका हूँ कि ज़िंदगी का पहला उपन्यास नौ साल की उम्र में पढ़ा था, घनघोर रोमांटिक, पाकिस्तानी लेखक ए. हमीद का, चोरीछिपे पढ़ना था, सो लगभग 40-50 मिनट में ख़त्म कर दिया था, उस उपन्यास का नशा/जादू ऐसा चढ़ा कि आजतक कम नहीं हुआ…. वगैरह-वगैरह…

बड़े राजकुमार ज्योतिर्मय जी बीती 15 मई को आठ साल के होकर नौवें की ओर अग्रसर हैं… शैफाली जी को कई बार याद दिला चुका हूँ कि यही वो उम्र है जब मैंने पहला उपन्यास पढ़ लिया था, पर ये जनाब दिनभर आईने के सामने खड़े रहकर भांति-भांति की मुखमुद्राएं बनाते रहते हैं, यूट्यूब पर देख-देख कर डांस करते रहते हैं.

नृत्य के प्रति उनकी दीवानगी इस कदर है कि पिछले हफ्ते ट्रेन के इंतज़ार में रेलवे प्लेटफ़ॉर्म पर खड़े थे और किसी के मोबाइल पर इनका पसंदीदा गाना बजा और जनाब बिना किसी झिझक के वहीं शुरू हो गए. यही हाल ट्रेन में हुआ.

खुद से तुलना करूं तो पाता हूँ कि इस उम्र तक ही क्यों, बल्कि युवावस्था तक मैं बहुत ही संकोची और अंतर्मुखी था… हालांकि पैदा शायद ज्योतिर्मय जैसा ही हुआ था, पर माता-पिता के अति-कठोर अनुशासन ने मुझे ऐसा बना दिया…

स्व. अम्मा मेरा एक किस्सा सुनाती थीं, संयोगवश वो भी रेलवे स्टेशन का है… दृश्य लगभग वही, बस पात्र बदले हुए हैं… पुत्र की भूमिका में मैं हूँ… उम्र तीन या साढ़े तीन साल… एक अंतर ये भी कि तब मोबाइल नहीं थे, तो गाने की ज़िम्मेदारी एक भिखारी की… अब तो प्लेटफ़ॉर्म पर दिखते नहीं भिखारी, पर तब आम बात थी.

तो उस भिखारी ने, जो नेत्रहीन था और एक जगह बैठा हुआ था, लोगों का ध्यान अपनी ओर आकर्षित करने के लिए गाना शुरू कर दिया… और कुछ दूर पापा-अम्मा के साथ खड़े मैंने नाचना… और नाचते-नाचते मैं उस भिखारी के करीब पहुंचा और उसकी गोद में बैठ गया.

उस नेत्रहीन भिक्षुक ने टटोल कर मुझे अनुभव किया और अपनी पोटली में से एक पांच पैसे का सिक्का मेरे हाथ में थमा दिया. हर तथाकथित ‘अच्छे बच्चे’ की तरह मैंने वो सिक्का अम्मा को सौंप दिया. जिसे उन्होंने पापा को, और पापा ने उसमें एक दस पैसे का सिक्का और डालकर उस भिक्षुक को दे दिया.

खैर बात हो रही थी, ज्योतिर्मय और उनके बेझिझक नृत्य की… तो कल सुबह उन्होंने मुझसे पूछा कि ‘मैं 18 का कब हो जाउंगा’, मैंने कहा 2028 में, जवाब में वे सर हिलाते हुए चले गए.

कुछ देर बाद फिर प्रकट हुए कि ‘अगर मुंबई जाना हो तो वहाँ तो कई रेलवे स्टेशन हैं, किस स्टेशन पर उतरना ठीक रहेगा?’ मैंने कहा मुंबई सीएसटी… सीएसटी का मतलब पूछने पर उन्हें बता दिया.

कुछ देर बाद वे अपना लैपटॉप उठाकर कम्प्युटर रूम में ही आ गए और छोटे राजकुमार गीत के साथ मिलकर मुंबई के अच्छे होटल्स सर्च करने लगे. उनकी खोज का पैमाना था कि वहाँ फ्री वाई-फाई होना चाहिए.

अब मुझसे रहा नहीं गया, ‘भाई क्या हो रहा है ये सब?’, तो जवाब मिला कि जब मैं 18 का हो जाउंगा तो हमेशा के लिए घर छोड़ के एक्टिंग और डांस क्लास में एडमिशन लेने मुंबई चला जाउंगा, और फिर कभी वापस नहीं आउंगा.

मैं अवाक… तुरंत अपनी उम्र के 8वें साल में पहुंचा और याद किया कि मैं कैसा था… न तो ऐसे कोई ख्वाब थे, न कोई प्लानिंग और न ऐसा आत्मविश्वास…

इतना अंतर कैसे? ‘तब से अब ज़माना बदल गया है’ वाले सरल तर्क को किनारे रखकर जो विचार आया कि मैं भी तो वैसा नहीं जैसे मेरे पापा हैं. जितनी बातें मैं अपने बेटों से करता हूँ, उतनी तो दूर, उसका दशांश भी मेरे और पापा के बीच में जीवन भर में नहीं हुई होंगी. जितनी स्वतंत्रता मैंने बेटों को दे रखी है, उतनी तो मुझे आज भी पापा की तरफ से नहीं है. अम्मा के जीवित रहते कभी मेरी पापा से सीधे बात नहीं हुई, अम्मा ही हमारे संवाद का पुल थीं. और इधर ये दोनों इतने घुले-मिले हैं कि कभी मेरे और पापा के बारे में जानेंगे तो, या तो समझ ही नहीं पाएंगे कि दिक्कत क्या थी, या फिर विश्वास ही नहीं करेंगे कि ऐसा कुछ भी होता है/था.

Ma Jivan Shaifaly
Ma Jivan Shaifaly

खैर, ज्योतिर्मय के मुंबई प्लान के बारे में शैफाली जी को बताया, ‘उंह, बच्चे हैं’ के साथ उन्होंने बात को हल्का करके टालने की कोशिश की. रात जब सोने जा रहा था तो नियमानुसार घर भर में घूम कर चेक किया कि कहीं कोई लाईट तो जलती नहीं छूट गई, कोई स्विच on तो नहीं रह गया. बिस्तर पर बैठा ही था कि ध्यान आया राजकुमार का लैपटॉप नहीं दिख रहा. मामूली सी खोज के बाद मिला… कहाँ?

देवियों और सज्जनों, मुंबई जाने के लिए पैकिंग हो चुकी थी…

एक पुराने स्कूल-बैग में लैपटॉप करीने से रैप करके रखा हुआ था. साथ में एक नोटबुक, एक पेन, पानी की बोतल और हाँ, लैपटॉप का चार्जर…

मैं लैपटॉप निकाल कर वापस टेबल पर रखने लगा तो इन्होने रोक दिया कि सुबह उठकर ज्योतिर्मय देखेंगे तो उदास हो जाएंगे.

आगे क्या करना है, कैसे उनको टैकल करना है, ये सब मुझे दोपहर दो बजे से पहले तय करना है, जब वे स्कूल से लौट कर आएँगे.

ps : एक बात बताने को रह गई, बैग में दो किताबें भी हैं. पहली 121 Science Experiments और दूसरी उनके दादा यानी मेरे पापा के दार्शनिक मित्र स्व. डॉ कृष्णमूर्ति जनस्वामी लिखित Rustle of thoughts.

पहली तो समझ में आती है कि बच्चों के खुद करके देखने वाले सरल वैज्ञानिक प्रयोगों के बारे में है, पर ये दूसरी!!!

आप-हम किस मुँह से नई पीढ़ी के पुस्तकों से दूर होने का रोना रोते हैं?

 

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