महाबलिपुरम : ‘आर्य बनाम द्रविड़’ के वामपंथी झूठ का प्रमाण

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महाबलिपुरम पहले समुद्र किनारे 'सात मंदिरों का स्थान' नाम से प्रसिद्ध था। उनमें से बचा एकमात्र मंदिर, बाकी के मंदिर समुद्र में समा गए

महाबलिपुरम, हमारे इतिहास का गौरव है। भारत के स्वर्णिम काल का प्रकाश स्तम्भ।

यह प्रमाण है कि हम विभिन्न कलाओं में उस कालखंड में भी प्रवीण थे जब विश्व में अन्य सभ्यतायें अपनी संस्कृति को अभी तराश ही रही थीं।

महाबलिपुरम के जीवंत पत्थरों और बोलती हुई चट्टानों के बीच जब मैं टहल रहा था तो एक तथ्य ने मेरा ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया था।

मृत पत्थरों और कठोर चट्टानों में जिस तरह से मूर्तिकारों व शिल्पकारों ने जान फूंकी, वो सब तो हैरान करता ही है मगर इन सब के बीच एक बात ने मुझे चौंकाया था, जिस तरफ अमूमन हमारा ध्यान नहीं जाता।

ये मूर्तियां इतिहास के महानायकों की हैं और इन कलाकृतियों के माध्यम से पौराणिक कथाओं का चित्रण हुआ है। कौन हैं ये महानायक और कौन सी कथायें यहां परोसी गई हैं? इनके जवाब में ही हैं वो विचार, जो मेरे दिल-दिमाग पर यहां आकर अनायास ही छा गए थे।

यहाँ एक चट्टान को काटकर गुफा बनाई गई है, जिसे फिर कृष्ण मंडप का रूप दिया गया। यहां अंदर की चट्टानों पर श्री कृष्ण अपनी लीला करते हुए देखे जा सकते हैं।

गोवर्धन पर्वत को उन्होंने उठा रखा है। साथ ही बलराम भी हैं। श्री कृष्ण को चारों तरफ से ग्वाल-बाल, गोपिकाओं और ग्वाल-ग्वालिनों ने अपने अपने दूध दही के मटकों के साथ घेर रखा है। ग्वालों के दूध दुहने के दृश्य भी हैं।

ये सभी आपस में मिल कर आँखों को अनायास मथुरा-वृंदावन ले जाते हैं। मगर एक सवाल मेरे मस्तिष्क ने मुझसे पूछा तो मैं चौका था, और वो प्रश्न था कि श्रीकृष्ण तो उत्तर भारत के हैं और आर्य हैं, तो फिर ये दक्षिण में द्रविड़ों के बीच हज़ारों साल से क्या कर रहे हैं?

बगल की एक चट्टान पर ही अर्जुन दिखे, दिव्य शस्त्र के लिए तपस्या में लीन। दूसरा सवाल मस्तिष्क ने दागा कि ये पाण्डु पुत्र अर्जुन यहां महाबलिपुरम में क्या कर रहे हैं?

सिर्फ अर्जुन ही नहीं, सभी पाण्डु पुत्र हैं यहां। हस्तिनापुर के पांचों राजकुमार के साथ द्रौपदी भी एक पात्र हैं, यहां उकेरी गई कालकृतियों में।

महाबलिपुरम में एक स्थान है, जहां पांच रथ बने हैं। असल में एक विशाल चट्टान को काटकर इन पांच रथों का निर्माण किया गया है। इनकी दीवारों पर खूबसूरत नक्काशी है। ये कुल मिलाकर अद्भुत है। इन रथों में चक्के नहीं हैं।

इनमें पहला रथ द्रोपदी का है, फिर अर्जुन का, फिर युद्धिष्ठिर और फिर भीम का, साथ ही नकुल-सहदेव का रथ है। इन सब रथों के साथ में शेर, हाथी और नंदी की विशाल मूर्तियां हैं। ये सभी रथ एक कतार में हैं सिर्फ नकुल सहदेव के रथ को छोड़ कर, जो इस कतार के ठीक बगल में स्थित है।

दूर से देखने पर लगता है कि पांडवों ने अपने रथों को यहां पार्क कर रखा है। अर्थात यह उनकी पार्किंग थी। मगर ये पाण्डु पुत्र तो यहां कभी आये नहीं। तो फिर उत्तर भारत के तथाकथित आर्य वंश के राजकुमारों की कल्पना यहां के कलाकारों के बीच उन दिनों क्या कर रही थी?

महाबलिपुरम में जहां देखो वहीं श्री कृष्ण और पाण्डुपुत्र हैं। सवाल उठता है कि आज से 1400 से 2000 साल पूर्व ‘तथाकथित द्रविड़’ जनता के आदर्श ‘तथाकथित आर्य’ श्री कृष्ण कैसे हो सकते हैं? उसी जनता के जीवन-संस्कृति में नायकों के स्थान पर ‘तथाकथित आर्य’ पाण्डुपुत्र कैसे विराजमान हो सकते हैं?

1400 से 2000 साल इसलिए क्योंकि यही कालखंड है जब इन कलाकृतियों का निर्माण हुआ था। कोई भी समाज अपने प्रतिद्वंद्वी, प्रतिस्पर्धी व विदेशी आक्रमणकारी समाज के नायकों को स्वीकार नहीं कर पाता।

क्या हम कभी भी बर्बर बाबर से लेकर कट्टर औरंगज़ेब को अपना नायक मान पाए? क्या हम कभी भी इंग्लैंड की रानी को अपनी महारानी के रूप में स्वीकार कर पाए? नहीं।

अगर यह घटनाक्रम सच होता, जैसा कि हमें पढ़ाया जाता रहा है कि द्रविड़ों को हराकर बाहरी आर्यों ने हिंदुस्तान पर कब्ज़ा किया था, तो फिर दक्षिण के स्वर्णिम इतिहास काल में उत्तर के नायकों का गुणगान इस स्तर का नहीं होता।

महाबलिपुरम के वैभव काल में पल्लव राजवंश का शासन था। यहां का अधिकांश निर्माण पल्लव राजाओं के द्वारा हुआ। इनमें से अधिकांश महान राजा हुए। इन्हे मामल्ल कहा जाता था।

मामल्ल को ध्यान से देखें तो यह महा और मल्ल से बना है, और यह ठीक भी है क्योंकि मामल्ल का अर्थ होता है महान पहलवान। यहां के राजा शक्तिशाली होते थे। यह महान पहलवानों का पुर है अर्थात क़स्बा है, इसलिए इसे मामल्लपुरम भी कहते हैं।

यह स्थान पल्लव और चालुक्य राजवंश के आपसी संघर्ष का साक्षी भी है। ये दोनों दक्षिण के प्रमुख राजवंशों में से हैं। इन दोनों राजवंशों के पूर्व भी और बाद में भी, दक्षिण भारत में, महाभारत और पौराणिक कथाओं के प्रति कितनी गहरी आस्था थी, महाबलिपुरम उसका एक प्रमाण मात्र है।

असल में महाबलिपुरम दक्षिण का एक प्रमुख बंदरगाह था। उस काल में वृहत्तर भारत, विशेष कर सुदूर कम्बोडिया और इंडोनेशिया आदि में दक्षिण भारत से बहुसंख्यक लोग जाकर बसे थे और वहाँ पहुँच कर उन्होंने भारतीय सभ्यता और जीवन संस्कृति को स्थापित किया था।

महाबलिपुरम में एक पहाड़ी पर स्थित दीपस्तम्भ इनकी समुद्र यात्राओं की सुरक्षा के लिए बनवाया गया था। विदेश यात्राओं पर जाने वाले इन यात्रियों को, महाबलिपुरम की कलाकृतियां, मातृभूमि का अन्तिम सन्देश देती थीं।

स्थानीय प्रजा के साथ साथ, यहां से जाने वाले अपने साथ में सनातन के संस्कार भी ले जाएँ, महाबलिपुरम के निर्माण को इस दृष्टि से भी देखा जा सकता है।

महाबलिपुरम पहले समुद्र किनारे ‘सात मंदिरों का स्थान’ नाम से प्रसिद्ध था। यह नामकरण नाविकों के द्वारा हुआ था। आज उनमें से एक ही मंदिर बचा है। बाकी के मंदिर समुद्र में समा गए। कुछ एक के अवशेष अब भी मिल जाते हैं।

जब यह एक बचा मंदिर ही अप्रतिम अद्भुत और अतुलनीय है तो कल्पना की जा सकती है कि जब सभी साथ मंदिर होंगे तब कितना भव्य दृश्य क्षितिज पर उभरता होगा।

महाबलिपुरम के इन सभी मंदिरों में भी ब्रह्मा विष्णु महेश के साथ साथ दुर्गा की ही पूजा होती रही है। इन्ही देवी-देवताओं की मूर्तियां और उनसे संबंधित कथाएं पत्थरों पर उकेरी भी गई हैं।

अब कोई मुझे यह स्पष्ट करे कि मैं इन त्रिदेव को आर्य मानूँ या द्रविड़? जो वामपंथी माता दुर्गा के लिए भ्रम फैलाते हैं उन्हें पकड़ कर यहां के मंदिरों में घुमाया जाना चाहिए, क्योंकि यहां शक्ति स्वरूपा माता दुर्गा महिषासुर का वध करते हुए देखी जा सकती हैं।

यही नहीं, एक गुफा का नाम ही है महिषासुरमर्दिनी गुफा। ये प्रमाण हैं कि वामपंथ अपने विषैले विचारों से भारत को बांटने का प्रयास करता रहा है। नमन करता हूँ कि पल्लव राजाओं ने पत्थरों और चट्टानों से मूर्तियां बनाई, जिन्हें नष्ट करना किसी के लिए ही कभी भी इतना आसान नहीं रहा। जो आज प्रमाण हैं हमारी सांस्कृतिक एकता के।

यहां मेरे लेख का असली उद्देश्य समाप्त नहीं हुआ। यह तो प्रमाणित करने में मैं एक बार फिर बहुत हद तक सफल रहा हूँ कि आर्य और द्रविड़ के बीच पूर्व में ऐसा कोई बंटवारा नहीं था जैसा हमें पढ़ाया और बताया जाता रहा है।

(आर्य बाहरी आक्रमणकारी नहीं थे और द्रविड़ हमारे ही भाई हैं, इसका विस्तार में प्रमाण अपनी आने वाले पुस्तक ‘मैं आर्यपुत्र हूँ’ में तो होगा ही, साथ ही तिरुपति और महाबलिपुरम पर आगे लिखे जाने वाले लेखों में भी इस के अनेक पक्ष उभरेंगे।)

असल में उत्तर और दक्षिण भारत के बीच, जो कुछ भिन्नता थी या है भी, वो भौगोलिक और प्राकृतिक भिन्नता के कारण, खानपान, रहन सहन में होना स्वाभाविक है। मगर यह तो उत्तर भारत के हरियाणा, पंजाब और बिहार-उत्तरप्रदेश के बीच भी मिल जाएगी। क्या गुजरात और बंगाल, किसी भी तरह से, खानपान, रहन सहन और भाषा के संदर्भ में एक समान नजर आते हैं? नहीं।

तो फिर हम गुजराती और बंगाली को तो इस हद तक अलग अलग करके नहीं देखते। असल में भारत आदिकाल से एक राष्ट्र रहा है, जिसमें राजनैतिक और व्यवस्था की दृष्टि से अनेक राज्य होते रहे हैं, जिनकी सीमायें बदलती रहती थी।

हम कुछ समय पहले तक भी अपने गांव जाने को देश जाना बोलते रहे हैं। मगर सभी राज्य सांस्कृतिक रूप में सनातन से निकली हुईं छोटी बड़ी धाराएं ही थीं। जिन्हे बड़े षड्यंत्रपूर्वक पहले अंग्रेज़ों ने, फिर वामपंथियों ने कई तरह से बांटा।

सवाल उठता है क्यों? क्योंकि बांटने के बाद बंटे हुए पर शासन आसानी से किया जा सकता है, जो विभिन्न राजनैतिक पार्टियों ने आज़ादी के बाद किया भी। और आज तक यह गन्दा खेल खेला जा रहा है।

मगर कोई पूछ सकता है कि ऐसा करके अंग्रेजों को क्या मिला? इस सवाल का उत्तर जानने के लिए तमिलनाडु को ज़मीन पर उतर कर ध्यान से देखें, कैसे मिशनरी ने अपने धर्म परिवर्तन का खेल सफलतापूर्वक चलाया है। इसका विस्तार और उसके दुष्परिणाम को देखकर मुझ जैसा कोई भी राष्ट्रवादी विचलित हुए बिना नहीं रह सकता।

मेरे दक्षिण के भाई भी श्रेष्ठ थे और हैं, कला संस्कृति में शस्त्र और शास्त्र में, अर्थात वे भी आर्य ही थे और हैं। अब अगर कोई मेरे द्रविड़ भाइयों को मुझसे भिन्न दिखाने की कोशिश करे तो उसे ले जाना महाबलिपुरम, जो तमिलनाडु के राजनैतिक केंद्र चेन्नई से कुल साठ किमी ही दूर है, और वहां उसे किसी भी स्थानीय गाइड के सामने खड़ा कर देना, जो दुनिया की हर भाषा में श्रीकृष्ण की लीला और पांडवों की पौराणिक कथायें बड़े अभिमान से हर पर्यटक को सुनाता है।

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