संजीव और गुरुदत्त : दो सबसे जीवंत अभिनेता, जीवन से बहुत जल्दी कह गए अलविदा

मेरी किशोर उम्र में मेरी सखियाँ जब मिथुन चक्रवर्ती और गोविंदा के गीत पर थिरकती थीं, मैं गुरुदत्त की फिल्मों के गाने सुना करती थी.

गुरुदत्त का चेहरा जैसे उनकी सारी पीड़ा को बयान करता था. तब तो जानती भी नहीं थी उनके जीवन में क्या घटित हुआ था लेकिन न जाने क्यों मुझे बचपन से ही पीड़ा की तरफ अधिक आकर्षण रहा है.

इसलिए ये किसी अभिनेता के अभिनय का आकर्षण नहीं था, उनके अभिनय में छलकती उनकी पीड़ा और पीड़ा में भी कातिलाना मुस्कान को कायम रखने की उनकी अदा की मैं कायल थी.

ऐसी ही मुस्कान मुझे संजीव कुमार के चेहरे पर दिखाई देती थी. हालांकि संजीव की अदाकारी की मैं अधिक मुरीद थी, वो भी तब से जब 12-13 साल की उम्र में दूरदर्शन पर उनकी फिल्म देखी थी “अनोखी रात” .

उस समय जिस वेदना से गुज़री थी वो आज भी उतनी ही ताज़ा है, सोच रही हूँ कितना अंतर आया है परिस्थितियों में. इस हो हल्ला और चीख पुकार और सजावटी मोमबत्तियों के पीछे आज भी वही चीत्कार है, और उन मोमबत्तियों के आगे वही नारे बाजी… फिल्म की कहानी वही गैंग रेप पर.. लगता है नहीं, कुछ नहीं बदला है सिर्फ समय आगे बढ़ गया है.

इस नौ नंबर में ज़रूर कुछ तो बात है, दोनों नौ जुलाई को जन्मे, दोनों ने बहुत कम उम्र में जीवन को अलविदा कह दिया… ये नौ नम्बरी संजीव कुमार के ही बस की बात थी कि एक ही फिल्म में “नया दिन नयी रात” में नौ भूमिका निभा गए.

अंकशास्त्र की माने तो ये नौ नम्बरी जीवन के प्रति बहुत तटस्थ होते हैं, अपनी ज़िद के आगे अच्छों अच्छों को झुका देते हैं. शायद यही कारण है कि जीवन ने भी उनकी मृत्यु के आगे घुटने टेक दिए और वो दोनों मृत्यु को जीत ले गए… संजीव का इतना सजीव होना ही शायद उनकी मृत्यु का कारण रहा होगा कि वो बहुत कम जीवन में बहुत सारा जी गए.

आज के दिन उन दोनों को याद करते हुए मुझे अनोखी फिल्म का ही एक गीत याद आता है….

सूरज को धरती तरसे
धरती को चन्द्रमा
पानी में सीप जैसे
प्यासी हर आत्मा
बूँद छुपी किस बादल में
कोई जाने ना….

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