सार्थक रविवार : अपने ही होने को खारिज कर आप भला कैसे हो सकते हैं ‘महान’

अगर कोई आपको यह कहे कि वर्तमान समय में दो खास आविष्कारों ने दुनिया को बदल दिया जिनमें एक है फेसबुक और दूसरा iPhone है, तो शायद आप असहमत नहीं हो सकेंगे। है न?

जानते हैं, इन दोनों में क्या समानता है? साम्य यह कि दोनों के अधिष्ठाता एक बार भावनात्मक, आर्थिक और मानसिक तौर पर भी बिल्कुल अकिंचन सा हो गए थे।

दोनों को ऐसा लग रहा था कि अब आगे कोई भी मार्ग शेष नहीं है। ऐसा कुछ भी नहीं है जिसे अब उनके द्वारा किया जाना संभव हो। एक तरह से वे दोनों खुद को एक लुट-पिट गए व्यक्ति के रूप में देखने लगे थे।

ऐसे समय में सामान्यतया लोग क्या करते हैं? ज़ाहिर है, सबसे आसान मार्ग अपनाते हैं खुद को ख़त्म कर लेने का। लेकिन, इन दोनों युवकों ने ऐसे में क्या किया, पता ही होगा आपको।

दोनों ने भारत की राह पकड़ी। कभी किसी ने बताया होगा उन्हें कि चरम विषाद के समय में मां भारती की गोद समूची दुनिया को शिशु बना अपने अंक में समेट लेती है।

उसी तरह जैसे आख्यानों के अनुसार भारत की एक ऋषिकन्या ने ब्रम्हा-विष्णु-महेश तीनों का नवजात-जन्मजात बना कर कोरा में भर लिया था…

जुकरबर्ग और स्टीव जॉब्स। दोनों अलग-अलग समय पर भारत आये। इस अद्भुत राष्ट्र के गिरि-कंदराओं में प्रवास किया। गुरुओं-गुरुजनों का सामीप्य लिया। शरणागत हुए। बटुकों की तरह घूमते रहे वन्य प्रान्तरों-मठ मंदिरों में और…

और दोनों एक उज्जवल प्रकाश, नव दृष्टि के साथ विदा हुए गुरुजनों की अनुमति लेकर, नयी दुनिया के लिए कुछ अद्भुत करने का जज्बा, कुछ सार्थक करने की प्रेरणा, कुछ अच्छा देने का विचार लेकर।

और आगे तो आप जानते ही हैं कि वर्तमान ही अपना ऐतिहासिक बना दिया है इन दोनों ने। यह लेख भी मैं इन दोनों के माध्यम से ही आप तक पहुंचा पा रहा हूँ।

पहले से आपको पता है इस कथानक के बारे में लेकिन, यहां इसे लिखने का आशय क्या है, नीचे यह कहने की कोशिश कर रहा हूं…

बाज़ार के दिए कुछ नए शब्द-संक्षेपों, टर्मिनोलॉजी में से एक मुझे काफी आकर्षित करता रहा है, वह है USP। आप जानते ही हैं- Unique Selling Proposition कहते हैं इसे। हिन्दी में इसका पर्याय शायद विशिष्टता, अनोखापन, नयापन… जैसा कुछ होना चाहिए।

आशय यह कि दुनिया हर तरह के उत्पादों-सेवाओं-विचारों से भरी पड़ी है। आपको अगर इसके बीच से सफल होकर निकलना है, तो आपको बताना पड़ेगा कि आखिर वैशिष्ट्य क्या है आपका?

प्रतिस्पर्द्धा के इस कठिन दौर में आपकी सफलता इस बात पर ही निर्भर होना है कि आपका यूनिकनेस क्या है। क्या कुछ अलग आप समाज को दे सकते हैं। आप ऐसा क्या आप बता सकते हैं जो उन्हें पता न हो। क्या ऐसा विचार दे सकते हैं उन्हें जो इससे पहले उन्होंने सोचा न होगा…

एक भारतीय के रूप में आपकी USP वही है जो लेकर जुकर-जॉब्स गए थे यहां से। आप लाख सर पटक लें लेकिन अगर आपको वास्तव में दुनिया की दुकान में खुद को भी कुछ लेकर खड़ा होने की महत्वाकांक्षा हो तो कॉपी कैट बनने से आपका काम बिल्कुल नहीं चलेगा। यही एक मौलिकता आपके पास है। अध्यात्म की इस थाती के बिना आप रीढ़हीन मनुष्य, मानवता की एक पश्चिमी भौंडी नक़ल ही साबित होंगे।

लाख सर पटक लीजिये… भारत की आध्यात्मिकता ही आपको बाज़ार में भी रास्ता दिखा सकती है। चाहे दीनी या दुनियावी, किसी भी बाज़ार में आपको अपनी पीठ में ज़रा रीढ़ रोप कर खड़े रहने का मन हो, तो आध्यात्मिकता रूपी कबीर की इसी लुकाठी को साथ रखिये… वरना दैन्य और आत्महीनता किए कहते हैं, कैसे अपने ही होने को खारिज कर आप ‘महान’ हो सकते हैं – ऐसा तो पिछले सत्तर-अस्सी वर्ष में सीखा ही है जी भर कर हम सबने।

हम दलित-वंचित-शोषित-स्वाभिमान से रहित, दरिद्र, अविकसित, प्रतिगामी, असभ्य, भौंडा, शर्मनाक, सदा पराजित, बाहरी, पलायनवादी, अनार्य, अश्रेष्ठ, नीच, जर्जर, निरीह, अन्धविश्वासी, कबीलाई, जंगली, सपेरा, अशिक्षित, मूर्ख… आदि-आदि रहे हैं, ऐसा पोथी पढ़ा-पढ़ा कर इसी पुण्य भूमि की जारज संतानों ने हमें तो ‘पोंगा’ बना ही दिया है। लेकिन, समय है अब अपना वैशिष्ट्य पहचान लेने की… युग है भारत और भारतीयता के प्रति प्रेम का ढाई आखर पढ़ कर सही अर्थों में पंडित हो जाने का।

आत्मवत सर्वभूतेषु यः पश्यति स पंडितः

नमस्कार.

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