प्राणायाम : मस्तिष्क सम्पादन से दिव्य क्षमताओं, अतीन्द्रिय सामर्थ्यों का बनें स्वामी

जीवन के हर क्षेत्र को मस्तिष्क प्रभावित करता है। उसके स्तर के अनुरूप शारीरिक स्वास्थ्य में उतार-चढ़ाव आते रहते है। मनोविकार स्वास्थ्य को गिराने और व्यक्तित्व को हेय बनाने के प्रधान कारण होते हैं।

इसी प्रकार किसी के व्यक्तित्व की-गुण, कर्म, स्वभाव की दिशाधारा इसी आधार पर बनती है कि मस्तिष्क को किस प्रकार प्रशिक्षित एवं अभ्यस्त किया गया।

अचेतन मस्तिष्क से संबंधित असंख्यों न्यूरौनल-फाइबर्स शरीर के प्रत्येक घटक तक पहुँचते हैं। उसकी सुव्यवस्था करते हैं, आवश्यक आदेश देते हैं तथा समस्याओं का समाधान करते हैं।

नोबेल पुरस्कार विजेता प्रख्यात न्यूरोसर्जन डॉ० रोजन स्पैरी ने मानवी मस्तिष्क पर गहन अनुसंधान किया है। तत्पश्चात वे इस निष्कर्ष पर पहुँचे हैं कि मनुष्य की आकांक्षा, विचारणा एवं भाव संवेदना का उसके मस्तिष्क से गहरा संबंध है। मस्तिष्कीय विकास के मूल में इन्हीं को कार्यरत देखा जा सकता है।

उनके अनुसार मस्तिष्क के दो भाग है जिन्हें क्रमशः दांये एवं बांये गोलार्द्ध-“हेमीस्फीयर” के नाम से जाना जाता है। इनमें बांये भाग को विचार-बुद्धि द्वारा तथा दांये भाग को भाव संवेदनाओं द्वारा प्रभावित-नियंत्रित देखा गया है। शरीर शास्त्रियों को भी अब लगभग यही मान्यता बनती जा रही है कि बायाँ गोलार्द्ध बुद्धि या वाणी का तथा दांया गोलार्द्ध भावना संवेदनशीलता तथा कला कौशल उस क्षेत्र की प्रतिभा-सम्पदा को हस्तगत किया जाता है।

मस्तिष्क के दोनों भाग सामान्य स्थिति में एक सेतु से जुड़े होते है। जिसे ‘कार्पस कैलोजम’ कहते है। इसी के कारण जानकारियों-भाव संवेदनाओं का आदान-प्रदान होता रहता है। दोनों गोलार्द्धों को समान रूप से क्रियाशील बनाकर ही कोई व्यक्ति अपनी समग्र क्षमता का बहुमुखी प्रतिभा का विकास कर पाने में सफल होता है।

शरीर के अन्यान्य अंग-अवयवों को मनुष्य अपनी इच्छानुसार मोड़ने में एक सीमा तक ही सफल हो सकता है, पर मस्तिष्क के संबंध में बात दूसरी है। उसे सुधारा-बदला ही नहीं, वरन उलटा तक किया जा सकता है। इस दृष्टि से वह जितना सशक्त और महत्वपूर्ण हैं, उतना ही कोमल भी।

जिस प्रकार आहार का शरीर क्रम के साथ भारी संबंध है, उसी प्रकार आकांक्षा, चिंतन प्रक्रिया और संकल्प शक्ति मनःसंस्थान को प्रभावित करती है। संसार में ऐसे अगणित व्यक्ति हुए हैं जिनका आरंभिक जीवन साधारण ही नहीं निम्न स्तर का भी था, किन्तु जब उन्होंने अपने आप को उच्चस्तरीय बनाने-मस्तिष्कीय क्षमता बढ़ाने का निश्चय कर लिया तो अभ्यस्त आदतें जो परिवर्तन स्वीकारने में आना-कानी करती थी, संकल्प शक्ति के दबाव से आमूल-चूल परिवर्तित हो गईं। सामान्य व्यक्ति असामान्य बन गये।

कालिदास, बरदराज आदि के उदाहरण ऐसे ही हैं जिनमें उनकी प्रारंभिक स्थिति देखते हुए अनुमान होता था कि ये सदा मूर्ख रहेंगे। विद्याध्ययन में भी इन्हें सफलता न मिलेगी। पर जब उन्होंने संकल्प पूर्वक विद्वान बनने का निश्चय किया तो प्राकृतिक संरचना को उलटकर इतनी तीक्ष्णता अर्जित कर ली कि सामान्य जनों की अपेक्षा अधिक ऊंचे स्तर के विद्वान बन गये।

अमेरिकी राष्ट्रपति थियोडोर रूजवेल्ट के बारे में कहा जाता है कि अपने बाल्यकाल में बड़े ही रुग्ण, संकोची, मंदबुद्धि और एकाकी प्रकृति के थे, किन्तु आयु वृद्धि के साथ-साथ जब उन्होंने अपने चिंतन प्रक्रिया में परिवर्तन किया तो न केवल विद्वान बने वरन् महानता के उच्च शिखर पर जा पहुँचे।

यही बात महात्मा गांधी के बारे में भी है। विश्व विख्यात वैज्ञानिक आइंस्टीन के मस्तिष्क का भार सामान्य जनों के समतुल्य एवं संरचना भी वैसी ही थी। पर उन्होंने अपने मानसिक क्षमता असामान्य स्तर तक बढ़ा ली थी।

समझदारी का मस्तिष्क के वजन से कोई सीधा संबंध नहीं है अन्यथा मनुष्य की बुद्धिमत्ता पिछले दस हजार वर्षों में प्रायः सौगुनी अधिक विकसित हुई है।

यदि भार और विस्तार से इसका संबंध होता तो उसका सिर उसी अनुपात से बड़ा दिखाई देता। वस्तुतः मानवीय बुद्धिमत्ता का रहस्य इस बात में सन्निहित है कि उसके कपाल के भीतर भरी मज्जा के अंतर्गत सूक्ष्म घटक न्यूरॉन्स कितने है और वे परस्पर कितनी सघनतापूर्वक एक दूसरे के पूरक बनते है।

वे जितने सूक्ष्म, जितने अधिक सक्रिय और जितने सक्षम होते है उसी अनुपात से बुद्धिमत्ता का विकास होता है। यह घटक अगणित वर्गों के है और उन्हीं के वर्ग विकास पर मानसिक गतिविधियों का निर्धारण होता है।

तंत्रिका विशेषज्ञों का कथन है कि मनुष्य की बुद्धिमत्ता का अनुमान उसकी मस्तिष्कीय संरचना को देखकर लगाया जा सकता है। प्रायः जन्म के समय बच्चे का मस्तिष्क अन्य प्राणियों की तुलना में अधिक भारी होता है, तदुपरान्त मस्तिष्क का स्थूल भाग तो कम बढ़ता है पर स्नायुतंत्र में आमूल-चूल परिवर्तन-अभिवृद्धि देखने को मिलती है।

शैशवकाल में मस्तिष्क के बाह्य भाग का लिबलिबापन बुद्धिमत्ता का परिचायक माना जाता है। उसी में वह क्षमता सन्निहित होती है और आगे चलकर विकसित होती है। उसी भाग को अपनी इच्छानुसार क्रियाशील बनाकर मनुष्य सर्वगुण सम्पन्न बन सकता है।

मूर्धन्य तंत्रिका विज्ञानी डॉ० जे० वी० ल्यूकों की खोजों ने यह तथ्य प्रस्तुत किया है कि मानवी मस्तिष्क स्वेच्छाचारी नहीं है। चिन्तन प्रक्रिया द्वारा उसकी दिशा उलटी जा सकती है और नई आदतों से उसे अभ्यस्त कराया जा सकता है।

तिलचट्टे एवं बिल्ली-चूहों पर वैज्ञानिक प्रयोगों द्वारा उनके मस्तिष्कीय न्यूरॉन्स की सिनेप्टिक हलचलों में हेर-फेर कर मानसिक स्तर पर फेर बदल करके दूसरी तरह सोचने के लिए विवश करने में उन्होंने काफी सफलता पाई है। इस प्रयोग में बिल्ली और चूहे अपनी परम्परागत दुश्मनी भूलकर साथ-साथ हिलमिल कर रहने लगे।

फ्राँसीसी वैज्ञानिक प्रो० देल्गादो का कथन है कि मस्तिष्कीय चेतना को उलटा अथवा बदला जा सकता है। आदतों और अभ्यासों की उसी तरह काट छाँट की जा सकती है जैसे फोड़े-फुन्सियों की। किसी की नसों में रक्त चढ़ाने की तरह उसके मस्तिष्क में अच्छी आदतों का भी बाहर से प्रवेश करा सकना भी अगले दिनों संभव हो सकेगा।

मैंकग्रील विश्वविद्यालय के सुप्रसिद्ध तंत्रिका मनोविज्ञानी डॉ० वेंटल मिलनर एवं उनके सहयोगियों ने तंत्रिका तंत्र पर किये गये अपने विभिन्न प्रयोग परीक्षणों के आधार पर यह निष्कर्ष निकाला है कि मस्तिष्क का प्रत्येक गोलार्द्ध अपने आप में प्रबल क्षमता सम्पन्न है। यह दोनों ही भाग अलग-अलग काम करते रहने में भी सक्षम है।

इस संदर्भ में मूर्द्धन्य न्यूरोसर्जन डॉ० बोगेन का कहना है कि मस्तिष्कीय क्रिया कलापों के अतिरिक्त उसका दांया भाग शरीर के बांये अंग का तथा बायाँ भाग दायें अंग का नियंत्रण करता है। एक को भाषा की जानकारी है लेकिन दिशा ज्ञान की नहीं, जबकि दूसरे भाग को दिशा ज्ञान तो है, पर भाषा-ज्ञान नहीं है। इलेक्ट्रोएनसिफेलोग्राफ द्वारा मस्तिष्कीय तरंगों के अनुलेखन से भी यह प्रमाणित हो चुका है कि मस्तिष्क के दोनों भाग भिन्न-भिन्न प्रकार की क्षमताओं से सम्पन्न है।

प्रायः लोग बौद्धिक क्षमता के विकास को ही प्रमुखता देते है जिससे उनके मस्तिष्कीय विकास की दिशा एकांगी हो जाती है। विद्वान लेखक द्वय जैकलीन वंडर एवं प्रिसिला डोनोवल ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक “होल ब्रेन थिंकिंग” में बताया है कि स्प्लिट पबन विभाजित मस्तिष्क के अनुसंधानों से यह प्रमाणित हो चुका है कि भौतिकवादी इस युग में अधिसंख्य लोग प्रत्यक्ष उपलब्धियों को ही सब कुछ मानते है, परोक्ष को नहीं। इस तरह के बौद्धिक चिंतन से उनके मस्तिष्क का बायाँ भाग अधिक सक्रिय एवं प्रभावी हो गया है। बौद्धिक विकास जब अपनी चरम अवस्था में पहुँच जाता है। तो ऐसी स्थिति में भावनात्मक स्त्रोत सूखने लगते है और मस्तिष्क के दोनों भागों में असंतुलन पैदा हो जाता है। इसी प्रकार भावनाएँ भी मस्तिष्क को अनेकों प्रकार से प्रभावित करती है। मनुष्य के खण्डित व्यक्तित्व का मूल कारण यही है। मानसिक रोगों का कारण भी यही असंतुलन है।

वर्तमान समय की मूल समस्या मनोविकारों की हैं। चिन्ता, भय, आशंका, असंतोष, अविश्वास, ईर्ष्या, द्वेष, आत्महीनता, अपराधी, मनोवृत्ति आदि विश्वव्यापी समस्या बन गयी है। मनोवैज्ञानिकों के अनुसार इस बिगड़े असंतुलन को साहित्य, संगीत, कला, अध्यात्म से जुड़ी सृजनात्मक प्रवृत्तियाँ अपनाकर दूर किया जा सकता है। इससे ने केवल प्रसुप्त शक्तियाँ जाग्रत होती है वरन् मस्तिष्क का दाहिना भाग भी सक्रिय होता प्रबल बनता चला जाता है। आत्मिकी का आश्रय लेकर भावना, संवेदनशीलता आदि सद्गुणों की अभिवृद्धि की जा सकती है। जिनका दांया मस्तिष्क विकसित है उन्हें बांये भाग को सक्रिय बनाने एवं संतुलन बिठाने का प्रयत्न करना चाहिए।

प्राचीनकाल में योग विज्ञान ने मस्तिष्कीय शक्ति को अभीष्ट दिशा में मोड़ने व विकसित करने की पद्धति विकसित कर ली थी और उस विज्ञान से लाभ भी उठाया गया है। आधुनिक विज्ञान भी अब अपने ढंग से इस दिशा में प्रयोग अनुसंधान कर रहा है। स्वीडेन के गोथेन वर्ग यूनिवर्सिटी के प्राध्यापक होलगर हाइडन ने यह सिद्ध किया है कि मानवीय मस्तिष्क की स्थिति पत्थर की लकीर नहीं है। उसकी क्षमता को रासायनिक पदार्थों की सहायता से घटाया-बढ़ाया और सुधारा-बिगाड़ा जा सकता है।

कनाडा के डॉ० विल्डर पेनफील्ड, फ्राँस के प्रोफेसर देल्गादो, टैक्सास विश्वविद्यालय के राबर्ट थांपसन आदि वैज्ञानिकों ने अपने अपने विभिन्न प्रयोग परीक्षणों के आधार पर यह सिद्ध कर दिखाया कि विद्युत उपकरणों की सहायता मस्तिष्क के विभिन्न केन्द्रों को बिजली के झटके देकर आदतों एवं अभ्यासों को बदला जा सकता हैं तथा मस्तिष्कीय क्षमता को घटाया बढ़ाया जा सकता है।

बुखारेस्ट-रोमानिया के विख्यात चिकित्सा विशेषज्ञ डॉ० आई० एन० रिंक ने श्वास-प्रश्वास प्रक्रिया को नियंत्रित एवं नियमित करके मानसिक असंतुलन को दूर करने में सफलता पाई है। सैन डिआगो के “बिहैवियॉरल न्यूरोबायोलॉजी” के डैविस अनुसंधान केन्द्र में भी इसी प्रकार के प्रयोग परीक्षण चल रहे हैं।

भारतीय योग शास्त्रों में मस्तिष्कीय गोलार्द्धों में परिवर्तन की प्रक्रिया का संबंध प्राणायाम साधना से बिठाया गया है। प्राणयोग के सम्पादन से अपने मस्तिष्क के दोनों भागों को सबल सक्रिय बनाकर न केवल बौद्धिक एवं भावनात्मक क्षमताओं में संतुलन बिठाकर समग्र प्रगति का द्वार खोला जा सकता है वरन् दिव्य क्षमताओं-अतीन्द्रिय सामर्थ्यों का स्वामी भी बना जा सकता है। यह राजमार्ग अध्यात्म पथ के सभी जिज्ञासु पथिकों के लिए खुला पड़ा है।

– निशा द्विवेदी

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