अमृत : ये वेगड़ लोग कहीं नहीं जाते

लोग कहते हैं अमृतलाल वेगड़ चले गए। लोग पता नहीं क्या क्या बोलते हैं। कोई वेगड़ कभी जाता है? जब तक नर्मदा हैं, नर्मदा के भावुक प्रेमी हैं, तब तक वेगड़ जी कहाँ जाएंगे? उन्हीं के बीच धूनी रमाएँगे। किसी महानगर के किसी घर के ड्राइंग रूम में, किसी गांव की किसी कुटिया में, किसी निर्जन वन में खुले आकाश के नीचे। ये वेगड़ लोग कहीं नहीं जाते।

मेरा सौन्दर्य से जब भी सामना हुआ, अचानक, निष्प्रयोजन हुआ। वेगड़ जी ने लिखा है न : जहां प्रयोजन समाप्त होता है, वहाँ सौंदर्य आरम्भ होता है।

वेगड़ जी से मेरी भेंट का किस्सा सुनाता हूँ।

मेरे जीवन की अधिकांश कीमती बातें निर्मल वर्मा से किसी न किसी तरह जुड़ी हुई हैं। मैं निर्मल से मिला नहीं। पर निर्मल न होते तो ये न होता वो न होता, पता नहीं क्या क्या न होता। निर्मल ने मेरे जीवन में हजार हजार खिड़कियां खोली हैं। उन्हीं में से एक खिड़की हैं – अमृतलाल वेगड़।

न मेरी निर्मल से भेंट होती, न मैंने उनका मुग्ध कर देने वाला अमरकंटक का यात्रा विवरण पढ़ा होता, न मैं अमरकंटक यात्रा पर गया होता, न यात्रा से हालिया लौटते ही वह पतली सी धूल से भरी पुस्तक बनारस में विश्वविद्यालय प्रकाशन में देखी होती, न उसके नाम – सौंदर्य की नदी नर्मदा – को देख उत्सुकतावश मैंने उसे ख़रीदा होता, न मैं आज यह लिख रहा होता।

और फिर मित्रों, जैसे आंग्ल भाषा में कहते हैं न – the rest is history।

वे नर्मदा के प्रेम में पागल थे, मैं उनके प्रेम में पागल हुआ। वही ढाई आख़र जिसकी गाथा गाते कबीर थकते नहीं (वेगड़ जी की पुस्तक से उधार)। वही प्रेम जिसने जमशेदपुर निवासी उन बंगाली सज्जन को पागल किया जिसके कारण विवश होकर उन्हें नौकरी छोड़ अमरकण्टक के उस बियाबान में आकर बसना पड़ा। ये सारी कहानी तो बस प्रेम की है।

मै जब वह पतली सी पुस्तक विश्वविद्यालय प्रकाशन से ख़रीद कर लाया था तो मुझे इसके अंजाम का अंदाज़ा भला कहाँ था। पतली सी किताब थी, सस्ती थी, नर्मदा के बारे में थी और मैं अभी अभी अमरकंटक से लौटा था। एक अनाम लेखक की पुस्तक। पता नहीं कब पढ़ता न पढ़ता। वैसी कितनी ही किताबें पहले से पढ़े जाने की प्रतीक्षा में बिसूर रही थीं। बस संयोग की बात कि उस सुबह मैं बनारस में बेकार सा अपने फ़्लैट में बैठा था और मैंने यूँ ही देखने के लिए यह किताब उठाई थी। पहला ही पन्ना पढ़ा था कि भांग का नशा सा सवार हुआ जो आज तक नहीं उतरा। मैंने कई बार, बार बार यह पुस्तक पढ़ी है, ज़बरन लोगों को पढ़वाई है, उसकी प्रतियाँ मँगवा कर बंटवाई हैं।

वेगड़ जी कोई स्थापित लेखक न थे। होते तो शायद वह मासूमियत, वह ताजगी न होती जिसने मेरे जैसों को मदहोश किया। मेरा अनुमान है कि वेगड़ जी की उम्र पचास और साठ के बीच रही होगी जब उन्होंने यह पुस्तक लिखी ( सुधी मित्र कृपया मेरी ग़लती सुधारें)। इसके पहले उनके लिखने की बात का मुझे तो पता नहीं है। और यह एक पतली, नाज़ुक, विनम्र डाली पुराने धीर गम्भीर वृक्षों पर बहुत भारी। नगीने बस बिखरे पड़े हैं इधर उधर बेतरतीब, खुरदरे इस यात्रा की राह में। हज़ारहाँ फूल सजे हैं इस डाल पर। इन फूलों के अपने फूल होने का कोई भान नहीं। ये जंगली घास के फूल हैं। और फिर वे रेखाचित्र ! हे ईश्वर। आप बस उन्हें देखते ही रहिए। लोग सादगी की बात करते हैं। सादगी अनायास, निष्प्रयोजन निर्मल हृदय से उगती है। और जहाँ ऐसी निर्मल सादगी हो, वहाँ से सौन्दर्य का उठ कर कहीं जाना नामुमकिन है। सौंदर्य वहीं गुंजलक मार कर बैठ जाता है।

मैं लिखूँ तो बस लिखता ही जाऊँ। पर यहीं विराम दूँगा।

नर्मदा के इस सुंदर सलोने पुत्र को इस भावुक प्रेमी का सलाम।

वेगड़ जी का जाना…

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