महज़ आम चुनाव नहीं, अस्तित्व का महासंग्राम है 2019

सेना में ऐसे लोग कदापि न होने चाहिए जो माने कि गुलामी ही सही, ज़िंदा तो बचेंगे।

वे योद्धा कहलाने के लायक ही नहीं जो अपनी क्षमता तथा अपने नेता की क्षमता में विश्वास नहीं रखते और न अंत तक लड़ते रहने की हिम्मत रखते हैं।

यही लोग युद्ध के पहले ही हार की संभावनाएं तलाशते हैं और खुद के लिए सुरक्षित मार्ग (safe passage) की तजवीज में रहते हैं।

मुसलमान और अंग्रेजों ने इनका खूब इस्तेमाल किया लेकिन मुसलमानों ने अक्सर अपना काम निकालने के बाद इनको ठिकाने लगा दिया।

जगत सेठ ने मराठों को आर्थिक सहायता नहीं दी, मीर जफर को दी और मीर जफर के दामाद ने जगत सेठ के खानदान के सभी पुरुषों के सिर कलम किए और औरतों के साथ इस्लाम की आज्ञा का पालन किया।

सोशल मीडिया के कारण आज हर कोई सैनिक है और उनमें भी कई ऐसे हैं जो स्वयं को सेनापति ही मानते हैं। सरकार की आलोचना में प्रखरता से मुखर भी हैं। काश इतना समझते कि 2019 अस्तित्व का महासंग्राम है, महज आम चुनाव नहीं है।

जैसा कि कहता आया हूँ कि सरकार से कई शिकायतें मेरी भी हैं। लेकिन संग्राम की पहचान है और यह भली भांति समझता हूँ कि यह घड़ी अपने दल की आलोचना की नहीं बल्कि लामबंद होने की है। आवश्यकता अहंकार और असंतोष को परे रखकर अनुशासन से चलने की है अन्यथा पानीपत करोगे।

खैर, इन सभी को Sun Tzu की Art of War पढ़ने की विनती है। बहुत बड़ी पुस्तक नहीं, हालांकि सीख बहुत बड़ी देती है। इंटरनेट पर कई लेखकों द्वारा मुफ्त उपलब्ध है, सब से सरल और टू द पॉइंट रचना Gary Gagliardi की है। अन्य भाषांतर पुराने हैं, भाषा किंचित क्लिष्ट है ।

पंचतंत्र भी पढ़ लीजिये, वे बच्चों की कहानियाँ नहीं हैं बल्कि राजपुत्रों को राज्य चलाने का उपदेश है। “जिसे इसका ज्ञान होगा, इन्द्र भी उसका बाल बांका नहीं कर सकेगा” यह रचनाकार का दावा है।

वैसे, anagram जो होता है उसमें अक्षरों के एक ही समूह से अलग अलग अर्थ के शब्द बनते हैं। ‘मु ख र’ से ‘मूरख’ भी बन जाएगा, नहीं?

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