क्या बैंक इतने बड़े नुकसान को सह पाएंगे?

जब कोई कंपनी या कॉरपोरेट किसी बैंक से लोन लेता है तो बैंक उस लोन को एसेट के रूप में अपनी बैलेंसशीट में दिखाता है। कंपनी को दिए गए लोन से प्राप्त हुए इंटरेस्ट को इनकम के रूप में बैंक दिखाता है।

एक कंपनी लिए गए लोन के बदले इंटरेस्ट और अक्सर मूलधन का कुछ हिस्सा इंटरेस्ट के साथ बैंक को हर महीने चुकाती है, जिसे हम EMI भी कहते हैं।

किसी कंपनी की हालत खराब हो तो उसकी बैलेंसशीट से पता चल जाता है। और दिक्कत ये है कि अगर कंपनी की बैलेंसशीट ख़राब है तो जिन बैंकों ने उसे लोन दिया है उनकी भी बैलेंसशीट पर असर पड़ना लाज़िमी है।

बैंक के पास अपनी एक निश्चित पूँजी होती है जिसे शेयर कैपिटल कहते हैं। फिर आम जनता से जमा हुआ पैसा उसके पास होता है। और रिज़र्व बैंक से उसे आगे कर्जा देने के लिए भी पैसा मिलता है। इन तीनो फंड्स से वो आगे कंपनी, पर्सनल लोन और सरकारों को लोन देते हैं।

क्या हो अगर लोन वापस न हों? क्या हो अगर कुछ कंपनी लोन पर इंटरेस्ट देना बंद कर दें? और आगे चलकर लोन अमाउंट ही वापस न करें।

बैंक के पास अपनी खुद की पूँजी सीमित है। कुछ बीस तीस पचास हज़ार करोड़ की शेयर कैपिटल। अगर कुछ हज़ार करोड़ का लोन डिफाल्ट हो जाये तो उससे हुआ नुकसान उसकी शेयर कैपिटल उतनी ही कम करेगा।

पंजाब नेशनल बैंक को 13 हज़ार करोड़ का हुआ लोन घोटाले से नुक्सान उसकी शेयर कैपिटल को एकदम नीचे ले आया है।

रिज़र्व बैंक के नियमों के मुताबिक एक बैंक को बहुत से रेश्यो मेंटेन करने होते हैं जिनमें से एक कैपिटल रिज़र्व रेश्यो है।

कुछ समय पहले मोदी सरकार ने करीब 2 लाख करोड़ के पैकेज का ऐलान किया था जिसमें सरकारी बैंकों में ये 2 लाख करोड़ रुपया उनके शेयर कैपिटल को बढ़ाने के लिए डाला जाना था।

बैंकों के पास उचित मात्रा में अपनी खुद की पूँजी नहीं होगी तो वो आगे लोन नहीं दे सकेंगे। यहाँ तक कि जनता के जमा पैसे को भी आगे लोन के लिए नहीं दे सकेंगे। क्योंकि अगर लोन वापस न आया तो जनता को चुकाने के लिए उनके पास खुद के भी पैसे न होंगे।

बैंको के पास अपनी शेयर कैपिटल महज बीस से पचास हजार करोड़ की होती है जबकि वो लोन लाखों करोड़ का देते हैं।

अभी भारत में सार्वजनिक बैंको ने करीब 75 लाख करोड़ रुपया लोन के रूप में बांटा हुआ है।

और इसका 12% NPA है। जहाँ बैंक को इंटरेस्ट इनकम नहीं हो रही, प्रिंसिपल अमाउंट का कुछ हिस्सा वापस हर महीने नहीं आ रहा।

करीब दस लाख करोड़ रुपया डूबने के कगार पर है।

क्या बैंक इतने बड़े नुकसान को सह पाएंगे?

क्या उनके पास खुद की पर्याप्त पूँजी है जो इस नुकसान को कवर कर सके?

इससे भी ज़रूरी सवाल है कि क्या बैंक आम जनता, सरकार, स्टॉक एक्सचेंज, अपने निवेशकों को इस बारे में आगाह कर रहे हैं कि उनके सामने बैड लोन्स, NPA का इतना अभूतपूर्व संकट है?

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