विकास के गवाह नेहरू हैं प्रधानमंत्री मोदी के सबसे बड़े फैन!

विकास क्या है? कहाँ है? हुआ या नहीं? किसका हुआ? दीखता क्यों नहीं?

ये कुछ आमतौर पर पूछे जाने वाले सवाल हैं, जिन्हे लोग उठाते हैं और ताना मारा जाता है कि “कुछ नहीं हुआ”.

तो आज आपको एक विकास की कहानी सुनाते हैं, बताते हैं की विकास क्या होता है, कैसे होता है, और कैसे आम जनता की ज़िंदगी को बदल देता है.

आपको मिलवाते हैं नेहरू जी से, जो प्रधानमंत्री मोदी के सबसे बड़े फैन हैं, जी हाँ आपने सही सुना!

ये हैं Mr. Tsering जिन्हें इनके गाँव के लोग प्यार से “नेहरू जी” बुलाते हैं. पिछले महीने मैं अपने दोस्तों के साथ चितकुल और स्पीति घाटी घूमने गया था. मेरे एक और मित्र ने बताया था की नाको गांव और नाको घाटी बहुत ही अच्छी जगह है. यह शिमला से करीब 315 कम और रेकोंग पेओ से लगभग 105 KM है.

ये गाँव भारत-तिब्बत बॉर्डर के एक दम नजदीक है. आस पास दूर दूर तक आबादी भी नहीं है. खाने पीने और रहने की व्यवस्था भी बहुत कम जगह पर है. और यह NH -5 -05 पर पड़ता है, जिसे दुनिया कि सबसे खराब सड़को में से एक माना जाता है.

हम लोग रेकोंग पेओ होते हुए नाको पहुंच गए. वहां सबसे पहले जो शख्स हमें मिले वो नेहरू जी ही थे. उन्होंने हमें अपने गेस्ट हाउस पर रुकने का न्योता दिया, शाम के 6 बज रहे थे, तो मना करने का सवाल ही नहीं था.

हम सीधे पहुंचे नेहरू गेस्ट हाउस पर. और हमें एक साफ़ सुथरा बढ़िया फर्निश्ड कमरा मात्र 600 रुपये में मिल गया. ऊपर से खाना पीना भी बहुत सस्ता और अच्छा. नेहरू जी बड़े ही साधारण से इंसान हैं, हमें शुरू में लगा कि ये बड़े ही गरीब इंसान हैं और इस वीराने में जैसे तैसे इस गेस्ट हाउस से अपना खर्चा निकालते होंगे. यहाँ तो पर्यटक भी नहीं आते होंगे, कैसे ये खाते कमाते होंगे.

इसी उधेड़बुन में रात को खाना खाया, और हमने उन्हें 100 रूपए टिप भी देने का मन बना लिया. लेकिन अब चौंकने की बारी हमारी थी!

ऐसे ही उनसे बातें करना शुरू किया, तो पता लगा कि हम तो उनके बारे में गलत ही सोच रहे थे. नेहरू जी कोई आम इंसान नहीं थे, उनके अच्छे खासे सेब के बगीचे थे, उनके पास स्वयं की मारुती देजीरे (नयी वाली टॉप मॉडल) थी, इसके अलावा महिंद्रा पिक अप भी था.

मैंने ऐसे ही सवाल पूछा कि सेब से कितना कमा लेते हैं आप? उनका जवाब था कि पिछले साल 25 लाख के सेब बेचे हैं!

अब हम भौचक्के थे. 25 लाख के सेब!! अगर लागत और मेहनत भी हटा दें तो दस-बारह लाख का मुनाफा तो कहीं नहीं गया…. गिरी से गिरी हालत में.

अब हम ज्ञान लेने वाली मुद्रा में थे… प्रभु कैसे इस वीराने इलाके में साल के 25 लाख का सामान बेच लेते हो.

नेहरू जी ने बताया कि 2014 -2015 तक उनकी खेती इतनी नहीं होती थी. उनके पास मशीन नहीं होती थी, खाद पानी की व्यवस्था अच्छी नहीं थी. बिजली भी दिन में आठ-दस घंटे ही आती थी. और सड़कें भी अच्छी नहीं थी, इस वजह से सेबों को दिल्ली की आज़ादपुर मंडी ले जाने में खर्चा भी बहुत होता था.

मैंने पूछा कि 2014 – 15 के बाद ऐसा क्या हुआ जो स्थिति बदल गयी?

उन्होंने कुछ चीजें बताई

> पिछले ३-४ साल में बिजली की स्थिति में जबरदस्त बदलाव हुआ है. अब वहां लगभग पूरे दिन बिजली आती है.. गाँव से inverters और generators हट गए हैं.
> किसान क्रेडिट कार्ड से छोटे मोटे लोन मिलने में आसानी हो गयी है
> खेती के उपकरण 80 से 85 % सब्सिडी पर मिलने लगे हैं
> सड़क का काम चल गया है, और ३-४ महीने में रेकोंग से काज़ा के बीच अच्छी सड़क बन जायेगी, अभी पिछले महीने तक लगभग आधी सड़क बहुत अच्छी बानी हुई है
> पानी की अब कोई किल्लत नहीं
> बिजली, खाद, सड़क और पानी की प्रचुरता की वजह से सेब की खेती लगभग दुगनी हो गयी.

मेरा ऐसा मानना है कि सरकार अगर आधारभूत इंफ़्रा दे दे, और थोड़ी फाइनेंसियल मदद दे दे तो इंसान अपने आप अपना काम उठा सकता है.

नेहरू जी को पिछले ३ साल में जो फायदा हुआ, उस पैसे को उन्होंने बर्बाद नहीं किया, बल्कि उस पैसे को उन्होंने अपने अन्य कामों में लगाया. उन्होंने स्वयं के लिए एक कार खरीदी. एक महिंद्रा पिक अप खरीदा, जिसे वो स्वयं के काम में भी लेते हैं, और खाली होने पर गाँव में किसी और को किराए पे दे देते हैं… इससे वो महीने के 25 – 30 हजार रूपए कमा लेते हैं. पिछले ही साल उन्होंने अपने घर का रेनोवेशन करवाया, और एक हिस्से में ३ बैडरूम और एक बड़ी डोरमेट्री बना ली, जिसमें वो अपने ग्राहकों के रहने को व्यवस्था कर देते हैं. और सीज़न में आराम से 30 -35 हजार महीने का गेस्ट हाउस से ही कमा लेते हैं.

फिर उन्होंने अपनी व्यथा भी सुनाई, कहा कि आज़ादी के बाद से ही इस इलाके को हमेशा ही इग्नोर किया गया. आधारभूत सुविधाएं तक इस इलाके में नहीं थी. पहले की सरकारें सोचती थी कि इन इलाकों में सड़क बनाएंगे तो चीन को फायदा हो जाएगा. उसके लिए घुसपैठ करना आसान हो जाएगा. ये सच है.

पहले की सभी सरकारें हमारे बॉर्डर के दुर्गम इलाकों के विकास के लिए सोचती ही नहीं थी. आज भी इस पूरे इलाके में आपको मोबाइल नेटवर्क नहीं मिलेगा. सड़कों पर भी अभी ही काम शुरू हुआ है, वरना तो पहले ये इलाका साल में 7-8 महीने सड़क संपर्क से कटा ही रहता था.

लेकिन आज बेसिक इंफ़्रा अच्छा होने की वजह से यहाँ लोगो की खेती में फायदा हुआ है, उनका यात्रा करना आसान हुआ है, बिजली आने की वजह से generators पर होने वाला खर्च ख़त्म हो गया है, सड़कें ठीक होने की वजह से पर्यटक ज्यादा आने लगे हैं, और इस वजह से इलाके की इकॉनमी में जबरदस्त उछाल आया है. लोगो का पलायन रुका है, क्योंकि अब वो लोग अपने घरों में ही रह कर शहरों से ज्यादा कमा सकते हैं. नेहरू जी इसके बहुत बड़े उदाहरण है. जो आज अपने घर पर ही रहते हुए, किसी भी बड़ी MNC के सीनियर मैनेजर्स के बराबर कमा रहे हैं.

जाते जाते एक सवाल और पूछा, कि वोट किसको देंगे, तो एक ही नाम था मोदी. कहा कि पहले तो यहाँ भेड़ चाल थी, इलाका देश से कटा हुआ था तो पता ही नहीं होता था कि चल क्या रहा है. कभी गाँधी, कभी नेहरू के नाम पर इमोशनल फूल बना कर वोट डलवा दिए जाते थे. लेकिन अब यहाँ लोगो को देश की मुख्यधारा से जोड़ दिया गया है, उन्हें समझ आता है कि कौन अच्छा काम कर रहा है और कौन उनके जीवन स्तर को आगे ले जाने की कोशिश कर रहा है.

लोग कहते हैं कि बेसिक इंफ़्रा देना हर सरकार का काम होता है, और वो स्वतः ही हो जाता है. लेकिन यहाँ और ऐसे ही सैंकड़ो गाँव कसबे हैं जहाँ पिछले ७० सालों में नहीं हुआ. नॉर्थ ईस्ट में कई ऐसे इलाके हैं जहाँ अब जा कर बिजली आयी, अब जा कर सड़कें बन रही हैं, मेघालय जैसे राज्य में अब जाकर रेल नेटवर्क आया है.

तो भैया ये है विकास, और यह विकास पागल नहीं हुआ है…. यह हमारे ही इर्द गिर्द बन रहा है, दिख रहा है लोगों की जिंदगियां बदल रहा है….. हाँ आपको नहीं दिख रहा या आप देखना ही नहीं चाहते तो इसमें विकास की कोई गलती नहीं.

और हाँ, जब कभी नाको जाएँ तो नेहरू जी से जरूर मिलें. अगर किसी को फ़ोन नम्बर चाहिए तो पर्सनली मुझसे मांग लें. आप इस लेख में लिखी हुई बातें उनसे, उनके पड़ोसियों से पूछ सकते हैं. और यह तो मात्र एक इंसान की कहानी है, नाको के हर घर में एक नेहरू पैदा हो रहा है, क्योंकि उसको विकास सहारा दे रहा है.

अब बहुत ही जल्दी नेहरू जी स्वयं की एक वेबसाइट बनवा रहे हैं, जिसके द्वारा आप घर बैठे वहां टूर पैकेज बुक कर सकते हैं, उनके गेस्ट हाउस में रह सकते हैं, एडवेंचर एक्टिविटी और आस पास के इलाको में घूमने कि सुविधाएं आपको उस एक वेबसाइट से मिल जायेगी.

देखा विकास ने एक आम किसान जो दूर किसी अनजान गाँव में रहता था उसे कहाँ से कहाँ पंहुचा दिया, वो इस डिजिटल क्रांति में जुड़ने को तैयार बैठा है.

– मनीष शर्मा

Comments

comments

loading...

LEAVE A REPLY