क्या आप कल के कश्मीरी पंडित हैं?

कुछ साल पहले काफी बातें उड़ीं कि कश्मीरी पंडितों का पुनर्वसन होगा।

जायज़ा लिया तो सभी को कोई खास उत्साह था नहीं। कई अब के वेल सेटल्ड पंडितों के फेसबुक पेज पर नाराज़गी ही दिखी कि सुख की ज़िंदगी छोड़कर वहाँ क्यों जाएं?

और सब जगह समान जो बात थी वह यही थी कि सरकार हमें वहाँ क्या सुरक्षा देगी? नहीं देगी तो हम अपनी जानें क्यों जोखिम में डालें?

केवल इस सरकार को श्रेय देने के लिए? हम सभ्य लोग हैं, शान्तिप्रिय हैं, हमें हिंसा से दूर रहना है और सरकार का कर्तव्य है कि हमारी सुरक्षा करे।

यही बात सभी जगह व्यक्त हुई।

सब लोग इस बात से सहमत हो रहे थे। लेकिन मैंने उस बात का विरोध किया कि यह हठ हमारे हजारों सैनिकों के उस ज़मीन को भारतीय रखने के लिए बहाये गए रक्त का अपमान है।

और रही बात सभ्य, संभ्रांत और शिक्षित होने की, तो इज़रायली लोग शायद विश्व के सब से सुशिक्षित, संभ्रांत और हिंसा से दूरी बनानेवाले थे, कई सदियों से सामूहिक हिंसा का शिकार ही होते आए थे।

लेकिन जब इज़रायल बना तो क्या हुआ? वहाँ गए सभी यहूदी, हिटलर से बचे हुए नहीं थे, अमेरिका से भी कई यहूदी समृद्ध शांति का जीवन छोड़कर इज़रायल गए, जहां सुबह से घर से निकलो तो शाम जीवित लौटने की कोई गारंटी नहीं थी।

अपनी बात के लिए मैंने काफी गालियां खाई। एक महिला बहुत मुखर हुआ करती थीं भाजपा के समर्थन में, सुमेधा सर्वदमन। वे टूट पड़ीं। क्या क्या न सुनाया। ठीक है, आप को अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता थी, आप ने इस्तेमाल कर ली।

आज देख रहा हूँ, मैं कोई लगातार आलोचना नहीं करता रहा कश्मीरी पंडितों की, विषय छोड़ दिया। फिर भी आज कई लोग वही बात कह रहे हैं जो मैंने तब कही थी।

आप लोगों ने हथियार क्यों नहीं उठाया, संगठित हो कर सशस्त्र प्रतिकार क्यों नहीं किया? आज अगर आप को वहाँ भेजा जा रहा है तो क्यों नहीं जाते? ज़मीन के लिए जान तो हमेशा दांव पर लगती ही रही है।

एक हद के बाद अगर समस्या सुलझती नहीं तो लोग उससे मुंह मोड़ना शुरू करते हैं। यह भी नई बात नहीं – वो अफसाना, जिसे अंजाम तक, लाना न हो मुमकिन… उर्दू के लिए अग्रिम क्षमा प्रार्थी हूँ लेकिन बात समझाने के लिए उदाहरण अच्छा था।

अब ये बताइये, क्या इस लेख का शीर्षक – क्या आप कल के कश्मीरी पंडित हैं? – विस्तार से समझाना आवश्यक है भी?

और हाँ, अगर पंडितों के लिए भागने को भारत नहीं बचता तो वे लड़ते, लड़ना अनिवार्य होता क्योंकि उनके लिए धर्मांतरण का सरल ऑप्शन तब हटाया गया था।

इदं न मम, इदं राष्ट्राय। जय हिन्द!

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