‘टू किल’, ‘टू किस’ और ‘टू बी यू’ का चंडाल योग

कुछ व्यक्तिगत कारणों से न मैं लोगों पढ़ पा रहा हूँ और न ही कुछ लिख पा रहा हूँ।

लेकिन एक बात देख कर अच्छा लग रहा है कि कर्नाटक के चुनाव के बाद से ‘अगली बार भी मोदी सरकार’ का आह्वान करने वाले साथी, तर्क, तथ्य व सही आंकड़ों के साथ अपने विरोधियों को जवाब दे रहे हैं।

वे दृढ़ता से अपनी बात कर रहे है। साथ ही सुषमा स्वराज के तन्वी सेठ के पासपोर्ट को लेकर लोगों ने सार्थक व तर्क संगत विरोध किया है।

जहां यह सब देखा, वहीं यह भी देखा कि जिन साथियों ने पुरानी बॉल को स्पिन पिच पर स्विंग कराने की आदत बना रखी थी, वे अभी भी वैसलीन लगा-लगा कर स्विंग कराने में लगे हुये हैं।

खैर, मुझे इन तेज स्विंगर्स को लेकर विशेष चिंता नहीं रही है क्योंकि जिसको निशाने पर रख कर यह लोग मेहनत कर रहे हैं, वो उनकी क्षमता व दक्षता से कहीं बढ़ कर है।

ऐसे मौकों पर जब भी मुझे अकेलापन कुछ ज्यादा लगने लगता है तो मैं अपनी लाइब्रेरी में रखी अंग्रेज़ी की किताबों को उठा लेता हूँ और उन्हें फिर से पढ़ने लगता हूँ।

लेकिन इस बार मैंने कोई उपन्यास नहीं पढ़ा बल्कि पिता जी की अलमारी में रखी ह्यूमन साइकॉलजी (मानवीय मनोविज्ञान और मनोवृत्ति) पर लिखी किताबों के पन्ने पलटे व सिग्मंड फ्रायड और अल्फ्रेड किंसे पर लिखे गये कुछ पेपर्स पढ़े।

मेरे लिये यह सब विषय के रूप में बहुत भारी होते हैं लेकिन खुद को समझने से ज़्यादा, अगल बगल के वातावरण को समझने में यह सब ज़रूर बहुत सहायक होते हैं।

उन्ही लेखों के किसी पन्ने पर मुझको एक लाइन दिखी जिसने मुझे बड़ा आकर्षित किया और उस पर मनन करने से अपने को नहीं रोक पाया हूँ।

लेख में, लेखक ने, उन लोगों का मनोविज्ञान समझाया है जो किसी व्यक्ति विशेष, जो या तो शीर्ष पर पहुंच गया है या किसी रूप में स्थापित हो गया है, उसके विरोधी हैं या फिर वे जो उस व्यक्ति विशेष के साथ पहले खड़े थे लेकिन अब अपने स्वार्थों के अधीन उन्मादी भीड़ बन कर अपने ज़हर बुझे तीरों को तरकश से निकाल कर उसको निशाना बना रहे हैं।

देखा जाए तो यह बहुत स्पष्ट रूप से व्यवहारिक जीवन में और विशेषतः जब इसमें राजनीति भी समाहित हो जाती है तो परिलक्षित होती है कि जब आप विशिष्ट स्थान प्राप्त कर लेते तो आपके विरोधी जहां अवसादग्रस्त हो जाते हैं, वहीं कभी आपके समर्थक या साथी रहे लोग अपनी ही हीनता के अधीन कुंठाग्रस्त हो जाते हैं।

इस बात को समझाते हुये अंग्रेज़ी में किसी ने बहुत खूब लिखा है कि, “They will either want to Kill You, Kiss You, or Be You.”

यहां पर Kill (किल) का भावार्थ, लोगों द्वारा उस व्यक्ति की शारीरिक से लेकर चारित्रिक हत्या या उसकी अस्मिता को नष्ट करने या कराने से है।

Kiss (किस) का मतलब, उस व्यक्ति के करीब होने, करीबी दिखने या उससे अभिलाषित होने की तीव्र लालसा है।

और to Be You (टू बी यू) का अर्थ है कि उस व्यक्ति का व्यक्तित्व इतना प्रभावी हो जाता है कि लोगों में उसकी तरह होने की इच्छा तो जन्म ले लेती है लेकिन उनके खुद के शून्य उनमें हीनता का वास करा देते है।

उन लोगों के सामर्थ्य में यही तीन प्रकार के तीर होते हैं जिससे वे शीर्ष पर खड़े उस व्यक्ति विशेष पर अपना निशाना साधते हैं।

यह एक ऐसी स्थिति होती है जिस पर उस व्यक्ति विशेष, जिसको निशाने पर लिया जाता है, उसका इस परिस्थिति पर कोई अधिकार नहीं होता है लेकिन वह इसको लेकर असहाय भी नहीं होता है।

वितृष्णा, घृणा व नपुंसकता से भरे यह महीन और विष से बुझे तीर उसको छलनी करते तो ज़रूर हैं लेकिन वे उसे रोक नहीं पाते हैं।

जहां उस पर वार करने वाले अपनी अदम्य तीन इच्छाओं ‘टू किल, टू किस और टू बी यू’ के हाथों विवश होते हैं, वहीं शीर्ष पर बैठा व्यक्ति इससे स्वतंत्र होता है कि वो इन तीनों प्रकार की इच्छाओं को किस रूप में स्वीकार करे।

यहां पर लेखक शीर्ष पर बैठे व्यक्ति को सलाह देता है कि जो ‘किल’ (Kill) चाहता है, उसे वहीं दीजिये। उससे रशियन रॉलेट खेलिये (जहां दोनों के हाथ में पिस्तौल होती है), Let The Fastest Gun Win As You Are The Fastest One (रशियन रॉलेट उसके साथ खेलिये, उसको मजबूर कर दीजिये कि वो खुद ही चुनौती दे दे। जो जितना तेज़ गोली चलाने वाला होगा वही जीतेगा और तुम्हारे विरोधियों को यह नहीं मालूम है कि तुम गोली मारने में सबसे तेज़ हो)।

जो ‘किस’ (Kiss) चाहता है, उसमें यह आप को देखना है कि उसके मुंह से बदबू तो नहीं आ रही है। यदि मुंह से बदबू आ रही है तो उसे मुंह नहीं लगाना है, बल्कि अपना हाथ आगे बढ़ा देना है जिसे वह या तो चूम कर अपने अहं को त्याग, समर्पण कर मित्रता कर लेगा या फिर वह इसका भी अधिकार खोकर अस्तित्वविहीन हो जायेगा।

और जो ‘टू बी यू’ (to Be You) चाहता है तो उसको शुभकामनाओं के साथ, श्रद्धांजलि का फूलों का गुलदस्ता भिजवा देना, क्योंकि वो न तो आप बन सकता है और न ही वह यह स्वीकार कर पाता है कि वो नहीं बन सकता है।

आज मैं जब सारे अपने अगल-बगल के वातावरण को देखता हूं तो वाकई मोदी जी के साथ सहानुभूति हो आती है। यही सब तो वे झेल रहे हैं!

और जब वो झेल रहे हैं तो सोशल मीडिया पर कोई किसी को निशाना बना रहा है तो उसको उससे क्या विचलित होना? कुंठित, हीनता और स्वयं से हारे हुये लोगों की इस अभिलाषा “They will either want to Kill You, Kiss You, or Be You” का क्या संज्ञान लेना!

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