कविता में आ जाना मेरी… कबसे ये मन बुझा हुआ है…

पुरानी कविता की नब्ज टटोली
वो पगली गुमसुम सी बोली

रंग भरो कुछ
कबसे मैं बेजान पड़ी हूँ

तुमने लिख दी तबसे है खाली सा आँगन
दरवाजे के दस्तक से मैं डर जाती हूँ
लाल दुपट्टा पड़ा हुआ बक्से में कबसे
पीले कागज के पन्नों पर गीत लिखा था
मीत लिखा था
साथ लिख दिया बात लिखी
फिर भूल गई क्या?

मुझको भी मौसम के जैसे
अदल बदल कर लिखा करो तुम
इन्द्रधनुष के रंग ही लिख दो
शाम लिखो ना… वहीं लिपट कर
जब करती थी प्यार की बातें

फूल लिखो जो सूख गया सा आज भी
तुमने रखा होगा
याद लिखो उसकी जिसकी बातों में
खोई खोई सी थी
होली का वो रंग भी लिखना
जो गालों से उतर गया था
उतर सका ना मन से अब तक

पुरवाई ..अमराई लिख दो
अच्छा छोड़ो पतझड़ लिख दो
सूखे पत्तो पर कितना लिखा था तुमने
सबकुछ जैसे चूर हो गया

सुनो सखी! आंसू मत लिखना
मेरा मन भी भारी सा है
आओ लगो गले से मेरे
तुम मुझमें मैं तुममें मिलकर खो जाते है
वादा है हम साथ रहेंगे…

राग कोई हो सुर से उतरे तो कानों को चुभते से हैं
रात कलेजे में कोई टीस हुई थी नींद गई थी
तबसे मन को मन की कोई खबर नहीं है….

– शैलजा

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