विषैला वामपंथ : यूँ ही नहीं दी जा रही पितृसत्ता को चुनौती

पितृसत्ता क्या है? कैसे यह स्त्री का शोषण करती है? कैसे पितृसत्ता समाज में बलात्कार के लिए जिम्मेदार है?

मुझे नहीं पता!

पर पितृसत्ता क्या होती है, इसका कुछ कुछ अनुभव है.

मेरे घर में पिता की सत्ता थी, इसमें कुछ शक नहीं है. हम सब भाई बहन पिता से थर-थर काँपते थे. सारा शहर चाहे जो करे, सूर्यास्त से पहले घर में घुस आना होता था. हाथ पैर धोकर सात बजे से पहले पढ़ने बैठ जाना होता था.

पता नहीं, लोग हत्या या बलात्कार के लिए पितृसत्ता को कैसे दोष देते हैं. यहाँ तो पिता का यह आतंक जाना है कि पड़ोसी के बागान से अमरूद चुराते हुए पकड़े जाने पर भी पिटाई होती थी.

एक बार स्कूल में बाथरूम के पीछे की नाली में फेंकी हुई एक कलम उठा लाया था तो घर में एक घंटे जिरह झेलनी पड़ी थी कि कहीं चोरी करके तो नहीं लाया.

कभी स्कूल से भाग कर कल्पना टॉकीज में सिनेमा का पोस्टर देखने तक नहीं गया. उस पर भी किसी ने मेरे लँगोटिया दोस्तों को स्कूल से भागकर सोमवारी के मेले में मंदिर में घूमते देख लिया तो उसकी भी रिपोर्ट हो गई और संगति के धोखे में हम भी पिट लिए.

कभी मुँह से कोई अपशब्द, मामूली सी एक गाली तक नहीं निकली जब तक पिता की सत्ता में रहे.

यह नहीं कि बदमाशियाँ नहीं कीं, पर तभी जब पिता की सत्ता से छूट के हॉस्टल गए. तभी पहली बार अश्लील फिल्में देखीं या किसी लड़की पर फब्तियाँ कसीं. वह भी पिता की सत्ता का उल्लंघन ही था, और यह ख्याल जूते में पड़े कंकड़ सा चुभता रहा.

पिताजी आज 86 वर्ष के हैं. अब छड़ी लेकर चलते हैं. अब उनका आतंक नहीं महसूस होता लेकिन उनकी बनाई हुई अनेक लक्ष्मण रेखाएँ हैं जिन्हें कभी पार नहीं करूँगा.

पिता को भी मैंने हमेशा अपने ही एक अनुशासन से बँधा पाया. जीवन में उन्होंने कोई व्यसन नहीं किया, कभी एक पान तक नहीं खाया. बच्चों को पढ़ाने से बड़ी उनकी कोई प्राथमिकता नहीं रही.

अपने ऊपर एक पैसा खर्च करते उन्हें नहीं देखा. जिंदगी भर सायकिल से चले, उनकी अकेली चप्पल की जोड़ी हमेशा टूटी ही दिखी.

सरकारी फैक्ट्री के एकाउंट डिपार्टमेंट में जिंदगी भर काम करके भी उन्होंने कभी एक पैसे की गलत कमाई नहीं की. कभी किसी का एक पैसा अपने ऊपर नहीं रखा.

एक दिन सुबह सुबह उन्होंने मुझे पड़ोस के कृष्णन अंकल के पास भेजा, किसी कारण से उनसे 25 पैसे लेने पड़ गए थे ऑफिस में… वह लौटाने के लिए.

जितनी परेशानियों और अभावों के बावजूद वे हमेशा आशावान रहे और चैन की नींद सोते रहे… उसका दशांश भी मैं तो नहीं झेल सकता.

पिता सिर्फ परिवार का पालक रक्षक ही नहीं होता, समाज का निर्माता भी होता है. वह भविष्य की ईंटें अपने व्यक्तित्व की आँच में पकाता है और युग की नींव में रखता है.

पितृसत्ता को चुनौती यूँ ही नहीं दी जा रही. उन्हें पिता के पुरुषार्थ से भय है कि वह अपनी संततियों के भविष्य के लिए आखिरी साँस तक लड़ेगा. इसीलिए उसकी सत्ता की वैधता को चुनौती दी जा रही है.

मुझे तरस आता है उन वामियों-वामिनियों पर, जो बलात्कार जैसे जघन्य पापों के लिए पितृसत्तात्मक समाज को दोष देते हैं. ऐसे वामी संपोलों को उनकी मांओं ने कैसे पिता के वीर्य से पाया होगा, यह वितृष्णा का विषय है.

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