सुषमा स्वराज, विदेश मंत्रालय का ‘एप’ और सादिया-अनस के पासपोर्ट का फर्जीवाड़ा!

एक मंत्री अपने द्वारा लिये गये गलत निर्णय को सही सिद्ध करने के लिये व अपने अहं को बनाए रखने के लिये किस सीमा तक जा सकता है यह विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने दिखा दिया है।

सादिया-अनस को तन्वी सेठ बनाने के लिये लखनऊ के पासपोर्ट आफिस से जिस तरह से कानून को तोड़ा-मरोड़ा गया है, वह भयावह स्थिति बता रहा है।

सुषमा स्वराज के कृत्य इस तरफ संकेत कर रहे है कि जिस संविधान को बाबा साहब भीमराव आंबेडकर ने बनाया था, वह इंदिरा गांधी की तरह रद्दी की टोकरी में फेंका जा सकता है।

लखनऊ पुलिस की एडवर्स रिपोर्ट को संज्ञान न लेकर सादिया-अनस को पासपोर्ट जारी कर देना बहुत कुछ कह जाता है।

पुलिस और लोकल इंवेस्टिगेशन यूनिट (एलआईयू) की ओर से की गई जांच में सादिया और अनस द्वारा पासपोर्ट बनवाने के लिए दी गई जानकारियों में से कई झूठी पाई गई थीं।

मेरा आरोप यह है कि अपनी गलती को आवरण देने के लिये सुषमा स्वराज ने आधे-अधूरे बने मोबाइल एप को तत्काल जारी कर के तन्वी सेठ उर्फ सादिया अनस को अपने पते के बारे में गलत सूचना देने से न सिर्फ बचाने का खेल खेला है बल्कि क्रैश हो जाने वाले अधूरे एप के बारे में मिल रही शिकायती को भी मैन्यूपुलेट करने का प्रयास किया है।

लोगों ने सोशल मीडिया पर सुषमा जी की फेसबुक की रेटिंग खराब की और सुषमा जी के विदेश मंत्रालय ने गलत सूचना के द्वारा उनके एप के 10 लाख डाउनलोड होने की खबर को संचार की दुनिया मे फैला दिया!

राष्ट्रवादी समर्थक इससे पहले कुछ समझ पाते, सुषमा स्वराज ने विक्टिम कार्ड खेलते हुये इन्हीं राष्ट्रवादियों को विलेन बनाकर न सिर्फ पूरे देश के सामने पेश कर दिया बल्कि राष्ट्रवादी मुखौटे में कांग्रेस से अनुग्रहित लोगों को भी आग में घी डालने का पूरा मौका दिया है।

सुषमा स्वराज ने अपने अहं को बचाने के लिए न केवल रातों रात सरकारी एप जारी किया, बल्कि तन्वी-अनस को उसके आधार पर पासपोर्ट भी दिलवाया और ट्रोल के बहाने मुद्दे को भी गौण कर देने का प्रयास किया है।

क़ानून तोड़ने के लिये मोबाइल सेवा के एक आधे-अधूरे प्लेटफॉर्म पर, एक नया एप जारी कर दिया गया। यह आधा-अधूरा एप गूगल प्ले स्टोर पर आखिरी बार 5 जून 2018 का अपडेट किया गया है और वह आज तक सही स्थिति में नहीं हो पाया है।

सच यह है कि गलत पता देने वाली सादिया-अनस का मामला 20 जून को हुआ था और सुषमा स्वराज उसे पासपोर्ट दिलवा कर आलोचना की पात्र बन चुकी थीं, इसलिए सुषमा ने बचने के लिए मंत्रालय से आनन-फानन में एक अधूरे एप को ही जारी कर दिया था।

सूत्रों के अनुसार, इस एप को कुछ महीनों बाद जारी किया जाना था लेकिन आश्चर्य है कि इंडियन एक्सप्रेस 29 जून को यह लिख रहा है कि 2 दिन में यह एप 10 लाख से अधिक डाउनलोड हुआ है! इसका अर्थ यह है कि यह एप 27 जून को जारी किया गया है?

अब मंत्रालय यह कह सकता है कि चूंकि यह 5 जून को ही अपडेट हुआ था और 20 जून को सादिया-अनस का मामला सामने आया था तो फिर कोई भी, कहीं रहते हुए कहीं से भी पासपोर्ट का आवेदन कर सकता है, यह कानून सादिया अनस पर लागू होता है। इसी लिये लखनऊ पुलिस के एडवर्स रिपोर्ट को दरकिनार करने के पीछे पासपोर्ट विभाग का यही तर्क सामने आयेगा।

मेरा सीधा मानना है कि सादिया अनस और उसके पति अनस सिद्दिकी का मामला जो 20 जून को आया था और उसको लेकर सुषमा स्वराज को किये गये ट्वीट के बाद उनके मंत्रालय ने जिस तरह से आनन-फानन में पासपोर्ट अधिकारी विकास मिश्रा का तबादला किया और दोनों पति-पत्नी को तत्काल हाथ में पासपोर्ट दिया था, ठीक उसी तरह, रातों-रात आधे अधूरे बने ‘पासपोर्ट सेवा’ मोबाइल एप को डाल कर, उन सारे गैरकानूनी पहलुओं को ढंक दिया गया जो पासपोर्ट बनाने में आड़े आ रहे थे।

जैसे कि सादिया और अनस रहते गाजियाबाद में थे लेकिन पासपोर्ट लखनऊ के पते पर चाहते थे, जो गैरकानूनी था। इसके तत्काल बाद सुषमा मैडम ने पासपोर्ट सेवा एप जारी कर पते की बाध्यता ही खत्म कर दिया था!

एप आने के बाद कोई कहीं रहते हुए कहीं से भी पासपोर्ट के लिए आवेदन कर सकता है। इसके लागू होते ही सादिया-अनस को लेकर लखनऊ पुलिस द्वारा जारी एडवर्स रिपोर्ट कूड़े के डब्बे के लायक रह गयी है।

सुषमा स्वराज ने दूसरी चाल अंग्रेजी मीडिया के जरिये चली है। उन्होंने सभी वामपंथी और अंग्रेजी पत्रकारों और मीडिया हाउसों के माध्यम से इस एप को दो दिन में एक मिलियन यानी 10 लाख डाउनलोड के रूप में प्रचारित कराया और इसे पासपोर्ट बनवाने को लेकर देश का सबसे बड़ा सुधारात्मक कदम साबित करने का प्रयास किया है।

आप जरा गूगल प्ले स्टोर में चले जाइए और इस एप को लेकर लोगों के रिव्यू पढि़ए। साफ पता चल जाएगा कि अंग्रेजी मीडिया और आम जनता की सोच के बीच कितना अंतर है। आनन-फानन में जारी किए गये एप के कारण इसमें कई कमियां रह गयी, जिसे लेकर गूगल प्ले स्टोर में जनता ने रिव्यू भी दिया है, लेकिन चूंकि इस एक प्रचार से कई चीजों को ढंकना था इसलिए इन कमियों को मीडिया ने उठाया ही नहीं।

जनता ने, यह एप बार-बार क्रैश हो रहा है, बहुत स्लो है, पेमेंट ऑप्शन काम नहीं कर रहा है, अनुपयोगी साबित हो रहा है, आदि रिव्यू दिया है। लेकिन असली रिव्यू से ध्यान भटकाने के लिये एकाएक बिना रिव्यू दिये गये इस एप को पांच सितारा देने वाले एकाउंट की बाढ़ आ गयी!

यह साफ-साफ दर्शाता है कि किसी टीम को रखकर यह पांच सितारा रेटिंग मैनेज किया गया है। जिन लोगों ने पांच सितारा रेटिंग दिये हैं, उन्होंने रिव्यू में कुछ भी ऐसा नहीं लिखा है जो यह स्पष्ट करता है कि यह सुषमा स्वराज के लिये लोगों की आवाज को दबाने का एक संगठित प्रयास किया गया है।

इस तरह सुषमा स्वराज ने जनता के सुझाव को अपने मंत्रालय व लुट्यन्स समर्थक अंग्रेजी मीडिया की मदद से उसी तरह पूरी तरह से नकारने का काम किया है, जैसा कि ट्वीटर पर उन्होंने तुष्टिकरण के विरोध में सही सवालों के साथ उतरे ट्वीटराज़ियों के विचारों को कुछ अभ्रद्र लोगों के अभद्र ट्वीट के जरिये नकारने का प्रयास किया है।

सुषमा स्वराज एक मंझी हुयी रसजनीतिज्ञ हैं। वह जानती हैं कि जब वो बैकफुट पर हो तो मुद्दों को कैसे भटकाया जाता है। याद कीजिये जब नरेंद्र मोदी को गोवा में प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित किया गया था तब सुषमा स्वराज के गुरु लालकृष्ण आडवाणी कोपभवन में चले गये थे और सुषमा स्वराज गोवा की बैठक से तत्काल निकल गयी थीं और उसके बाद मोदी जी की खबर दबकर आडवाणी-सुषमा की खबर ही चलती रहीं थी।

पासपोर्ट मामले में भी सुषमा स्वराज ने यही किया है। सुषमा स्वराज को हजारों लोगों ने ट्वीटर पर टैग कर तुष्टिकरण का विरोध करते हुए संयत भाषा में अपना विरोध दर्ज कराया था, लेकिन सुषमा स्वराज ने कुछ बदतमीज और असंस्कारी लोगों के चुनिंदा ट्वीट उठाए और उन्हें री-ट्वीट कर दिया।

इसी को वामपंथी-अंग्रेजी मीडिया व पत्रकारों एवं कांग्रेस ने हाथों-हाथ लिया। बरखा दत्त, राजदीप सरदेसाई, सागरिका घोष, शेखर गुप्ता, महबूबा मुफ्ती, कांग्रेस पार्टी ने सुषमा के बहाने राष्ट्रवादियों, हिंदुत्ववादियों और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी समर्थकों पर जमकर भड़ास निकाली और सुषमा स्वराज ने इसको लेकर न सिर्फ चुप्पी साधी बल्कि मोदी समर्थको को ट्विटर पर ब्लॉक करने का काम भी किया।

इधर यह हुआ और उधर ‘अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता’ के तथाकथित समर्थक पत्रकार यह ट्वीट करने लगे कि ट्रोल करने वालों को सोशल मीडिया और ट्वीटर पर बैन किया जाना चाहिये। सुषमा स्वराज द्वारा जो प्रतिक्रिया हुई है उससे उनको चार फायदा हुये हैं।

पहला यह कि विक्टिम प्ले करने के कारण उनके प्रति तटस्थ लोगों में उनके लिये सहानुभूति बढ़ी और हिंदुवादियों के प्रति नफरत का भाव पैदा हुआ है।

दूसरी अपनी गलती को ढंकने के लिए आनन-फानन में जारी किए गये आधे-अधूरे एप की कमियों की ओर किसी का ध्यान नहीं गया है और एप की गलतियां भी ढंक दी गयी है।

तीसरा सादिया-अनस द्वारा गलत सूचना देकर भी पासपोर्ट हासिल करने में मदद किये जाने से उन्होंने मुस्लिम तुष्टिकरण को वैधता प्रदान कर के वीज़ा माता के नाम पर मुस्लिम वोट बैंक में मोदी जी से अलग हट कर के छत्रछाया बनाया है।

चौथा नि:स्वार्थ भाव से बने मोदी जी के समर्थक राष्ट्रवादियों को बेचारा साबित करना है और उनको नपुंसकता का एहसास करा के इनका 2019 में भाजपा से मोहभंग कराना है। जिससे प्रत्यक्ष नुकसान प्रधानमंत्री मोदी जी को होगा और उसका फायदा बीजेपी के 2013 के 180 प्लस के गिरोह को इकोसिस्टम व लेफ्ट बिरादरी की मीडिया से हो जाये!

सुषमा स्वराज के उठे कदम 2013 का पुनरागमन है और इस बार घर को आग लगाने वाले घर में ही बैठे हैं।

(यह लेख संदीप देव के लेख का ही पुनर्लेखन है। इस विषय पर मैं लिख रहा था लेकिन सन्दीप का जब यह लेख सामने आया तो अपना मूल लेख को छोड़ कर मैंने उनके ही लेख को आधार बना कर लिखा है।)

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