ऊँ आचमनविधिं व्याख्यास्यामः

जघ्ङे पाणिपादौ प्रक्षाल्य प्राङ्मुख उदङ्मुखो वा बद्धशिखो यज्ञोपवीती।ब्राह्मणस्य दक्षिणे हस्ते पञ्च तीर्थानि भवन्ति। अङ्गुल्यग्रे देवतीर्थं कनिष्ठिकामूले आर्षिकं तीर्थं [ अङ्गुष्ठतर्जन्योर्मध्ये ] पैतृकं तीर्थं अङ्गुष्ठमूले ब्रह्मतीर्थं मध्ये अग्नितीर्थम्।

न तिष्ठन्न हसन् न बुब्दुदैर्न च लोमैः गोकर्णाकृतिवत् कृत्वा माषमग्नजलं पिबेत्। तेन त्रिराचामेत्। प्रथमं यः पिबेदृग्वेदः प्रीणातु। द्वितीयं यः पिबेद्यजुर्वेदः प्रीणातु। तृतीयं यः पिबेत् सामवेद: प्रीणातु। लोमाधरोष्ठमथर्ववेदः प्रीणातु। मुखमग्नितृप्तं सर्वं प्रोक्षति।

यः पादौ प्रोक्षति यश्र्चक्षुषी यश्र्चन्द्रमादित्यौ यन्नाभिं तेन पृथिवी यस्ततस्तेन विष्णुः। यच्छिरस्तेन रुद्रः। मुर्न्धि शतकुबेरः। सर्वदेवत्यास्ते प्रीणान्तु। य एवं वेद। इत्युपनिषत्॥

आचमन की विधि-व्यवस्था :-

जंघाओं (पिण्डलियों) और हाथ-पैरों को धोकर पूर्व या उत्तर को मुख करके शिखबन्धन करे, यज्ञोपवीत धारण करे.

ब्राह्मण के दाहिने हाथ में पाँच तीर्थ होते हैं. अँगुलियों के अग्रभाग में देवतीर्थ, कनिष्ठिका के मूल में आर्षिकतीर्थ, अंगुष्ठ और तर्जनी के मध्य में पैतृकतीर्थ, अंगुष्ठमूल में ब्रह्मतीर्थ तथा मध्य में अग्नितीर्थ होता है.

न खड़ा रहकर, न हँसते हुए, न बुदबुदाते हुए, न रोमाञ्चित होते हुए, गौ के कान की सी हाथ की आकृति बनाकर हथेली भर जल का पान करे. इससे तीन बार आचमन करे. पहली बार जो पिये, उससे ऋग्वेद प्रसन्न हो. दूसरी बार पीने से यजुर्वेद प्रसन्न हो. तीसरी बार पीने से सामवेद प्रसन्न हो.

(आचमनोपरान्त) लोमसहित अधरोष्ठ (मुँछों सहित नीचे और ऊपर के ओष्ठ) के स्पर्श से अथर्ववेद प्रसन्न हो ( शास्त्रीय परम्परा में आचमन के बाद अंगुष्ठ के मूल भाग से होठों को पोंछने का विधान है ).

अग्नितृप्त-मुख सबका प्रोक्षण करता है. जो पैरों का प्रोक्षण करता (धोता) है, (वह मानो) उससे (पवित्र जल से) पृथ्वी का प्रोक्षण करता है; जो चक्षुओं का प्रोक्षण करता है, (वह मानो) उसमें चन्द्रमा और सूर्य का प्रोक्षण करता है. जो नाभि का प्रोक्षण करता है, (वह मानो) उससे विष्णु का प्रोक्षण करता है; जो शिर का प्रोक्षण करता है, (वह मानो) उससे रुद्र का प्रोक्षण करता है; जो मूर्धा (मस्तक) का प्रोक्षण करता (धोता) है, (वह मानो) उससे शतकुबेर का प्रोक्षण करता है. इस प्रकार समस्त देवता प्रसन्न व कृपालु होते है.

जो ऐसा जानता है, यही रहस्य (उपनिषद्) है.

“एवं स ब्राह्मणो नित्यमुस्पर्शनमाचरेत्।
ब्रह्मादिस्तम्बपर्यंन्तं जगत् स परितर्पयेत्॥”
( व्याघ्रपाद )

प्रत्येक कार्य में आचमन का विधान है. आचमन से हम न केवल अपनी शुद्धि करते हैं अपितु
ब्रह्मा से लेकर तृण तक को तृप्त कर देते हैं.

जल लेकर तीन बार निम्न मंत्र का उच्चारण करते हुए जल ग्रहण करें-

ॐ केशवाय नम:
ॐ नाराणाय नम:
ॐ माधवाय नम:

बोलकर ब्रह्मतीर्थ (अंगुष्ठ का मूल भाग) से दो बार होंठ पोछते हुए ॐ ह्रषीकेशाय नम:,बोलकर हस्त प्रक्षालन करें (हाथ धो लें). फिर अँगूठे से नाक, आँखों और कानों का स्पर्श करे.

छींक आने पर, थूकने पर, सोकर उठने पर, वस्त्र पहनने पर, अश्रु गिरने पर आचमन करे. उपरोक्त विधि ना कर सकने की स्थिति में केवल दाहिने कान के स्पर्श मात्र से ही आचमन की विधि पूर्ण मानी जाती है.

आचमन बैठकर करना चाहिये-किंतु घुटने से ऊपर जल में खड़े होकर भी आचमन किया जा सकता है. जब जल घुटने से कम हो तो यह अपवाद लागू नहीं होता, तब बैठकर ही आचमन किया जाना चाहिये.

जान्वोरूध्-र्वं जले तिष्ठन्नाचान्तः शुचितामियात्।
अधस्ताच्छतकृत्वोऽपि समाचान्तो न शुध्यति॥

(आचारेन्दू, पृ०२९में, विष्णु-स्मृति )

– निशा द्विवेदी के सौजन्य से

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