बुराड़ी काण्ड का पर्दाफाश : मोक्ष के नाम पर मूर्खता

मुझे शुरुआत से ही लग रहा था कि दिल्ली के बुराड़ी काण्ड के पीछे पूरा भाटिया परिवार नहीं बल्कि भाटिया परिवार का कोई एक सदस्य ही मुख्य रूप जिम्मेवार है। भाटिया परिवार का छोटा बेटा ललित जिसे लगता था कि उसके मृत पिता उससे बात करते हैं, जो उसी कल्पनानुसार विभिन्न तरह के कर्मकांड करता था। और घरवाले भी यह सच मानते थे कि ललित की अपने मृत पिता से बात होती है! सारा परिवार उसके मूर्खतापूर्ण कर्मकांडो में उसका साथ देता था !

दिल्ली में विशेषकर दिल्ली की पंजाबी संस्कृति में यह एक आमचलन सा दिखता है जिसमें घर के लोग किसी “बाबा” या “माता” को भगवान का अवतार मान न सिर्फ पूजते हैं बल्कि उन पर अंधविश्वास करते हुए उनके कहे अनुसार ही अपने घर -परिवार के फैसले भी लेते हैं।

और ताज्जुब यह है कि ये सभी लोग बेहद पढ़े -लिखे होते हुए ऐसे अन्धविश्वासी होते है, और अपने अंधविश्वास को ही अपना धर्म मानते हैं। मेरे बेहद करीबी परिचितों में ऐसे कुछ लोग शामिल हैं। एक आंटी जी का तो ये हाल है कि अपनी “माता रानी” के तमाम टुटके करते -करते उनका बेटा ही मानसिक रूप से विक्षिप्त हो गया है, पर उस बेटे का ईलाज कराने की जगह उन्होंने अपनी “माता रानी” के कहने पर धोखे से अपने बीमार बेटे की शादी करवा दी।

लड़की को शादी के कुछ दिन बाद समझ आया कि उसका पति दिमागी रूप से बीमार है। बिन माँ – बाप की उस लड़की को मामा ने पढा -लिखाकर बड़ा किया, शादी की। अब वो दुबारा उन पर बोझ नही बनना चाहती इसलिए ऐसी शादी निभा रही है।उस पर लड़के की मां अभी तक लड़के का सही तरीके से ईलाज कराने की जगह “माता रानी” के टोने -टुटकों के हिसाब से ही चल रही है।उनका बेटा अब पूरी तरह विक्षिप्त हो गया है। वो भी काल्पनिक लोगो से बातें करता है!

ये लोग अपने अंधविश्वास को लेकर इतने ज़िद्दी और अड़ियल होते है कि इन्हें कोई नहीं समझा सकता। अपनी ज़िद से ऐसे लोग दूसरों को भी जबरन अपने कर्मकांड में लपेट लेते हैं। उन आंटी जी से जब भी मुलाकात होती है वो अपनी “माता रानी” का गुणगान छेड़ देती है। उन्हें दृढ़ विश्वास है कि उनके आस – पास जो कुछ भी होता है वो उनकी “माता रानी” की कृपा से होता है।उनकी “माता रानी” एक कम पढ़ी – लिखी महिला है जिसका दावा है कि उस पर माता आती है! जो हर शुक्रवार अपनी चौकी लगाती है!

बताइये क्या इलाज़ है ऐसे लोगों का? क्या आप इन्हें हिन्दू कहेंगे? धार्मिक कहेंगे? नहीं ये अंधविश्वास हैं …. ऐसे ही किसी अंधविश्वास ने बुराड़ी परिवार के 11 सदस्यों की बलि ले ली…यह धर्म या मोक्ष के नाम पर हुई सामूहिक आत्महत्या नहीं हो सकती…

काश की हमारा मीडिया “मोक्ष” का अर्थ समझता …. आत्महत्या करके या जान देकर कभी “मोक्ष” नहीं मिलता, हमारे ऋषि – मुनि तो अपनी तपस्या से जीते- जी मोक्ष पाते थे.. यह अंधविश्वास “धर्म” नहीं “अधर्म’है. बुराडी कांड अंधविश्वास से उपजा अधर्म है, हत्याकांड है। ऐसे पापों की आड़ में सनातन धर्म को बदनाम मत कीजिये। ऐसे अन्धविश्वासी “ईश्वर के उपासक नहीं बल्कि “मानसिक रोगी” होते हैं। अपने आस – पास मौजूद ऐसे “मानसिक रोगियों” को पहचानिये…अपनी और अपनों की सुरक्षा कीजिये।

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