विकास और पैसा ही सबकुछ नहीं! याद करिए विभाजन पूर्व के हिन्दुओं/सिक्खों को

मेरे घर से बमुश्किल 100 कदम पर एक मस्जिद थी… हरी मस्जिद कहते थे… मस्जिद के ठीक सामने एक काफी प्राचीन मंदिर था…

जैसा कि होता है मस्जिद लहीम-शहीम थी… मन्दिर बेचारा टूटा किवाड़ लिए, पुताई को तरसता था…

मस्जिद पर 4 बड़े कर्णभेदी लाऊड स्पीकर लगे थे… मंदिर की औकात ही नहीं थी कि लाउडस्पीकर लगवा पाए या पूर्णकालिक पंडितजी की नियुक्ति हो…

हम लोग भी जन्माष्टमी और दीवाली पर ही मन्दिर जाते थे… मग़र पास में आर्यसमाज मन्दिर, जगतपुर था… जहाँ सुबह शाम संध्या होती थी, प्रवचन होता था, रविवार को यज्ञ, प्रवचन और भजन होते थे.. आर्यसमाज मन्दिर में लाइब्रेरी, अखाड़े,बैडमिंटन कोर्ट और व्यायाम का सामान भी था…

आर्यसमाज मन्दिर में एक लाउडस्पीकर लगा था.. जिसके संचालन पर आस-पास के सभी मुसलमानों को कड़ी आपत्ति थी, कभी लाउडस्पीकर का तार चोरी हो जाता तो कभी साउंड पीस…

हर 4-6 माह पर लाउडस्पीकर न हटाने पर धमकियां मिलती थी, पुलिस आती थी… हम लोग 32 दांतों के बीच में थे, परंतु मुस्लिम कभी लाउडस्पीकर न हटवा पाए…

असल में असली जद्दो-जहद करना हमें आर्यसमाज ने ही सिखलाया… दंगों में जब लोग घर खाली कर भाग जाते थे… तब आर्यसमाज के प्रधान श्रीकृष्ण जी घर-घर जाकर हिम्मत बंधाते… ज़रूरी ‘समान’ भी मिलता था, आत्मरक्षा के लिए…

हिंदुओं के यहाँ बारातें आतीं थीं, मस्जिद के सामने गुज़रते समय बारात का लाउडस्पीकर और बैंड खामोश हो जाता था… सड़क पर डांस करने की हिम्मत किसके पास थी…

मस्जिद के सामने मन्दिर पर साल में 2 बार सजावट और लाउडस्पीकर को इस शर्त के साथ लगने दिया जाता था कि ‘अज़ान’ और नमाज़ के समय लाउडस्पीकर खामोश रहेगा…

उस वक्त हमारे पुराने शहर की आबादी एक-सवा लाख के ऊपर थी, जिसमें हिंदुओं की आबादी 15-20 हज़ार के आस-पास थी!

मगर पुराने शहर में जन्माष्टमी पर दधिकांधों का शस्त्रों के साथ जुलूस निकलता था(अभी भी निकलता है)… होली पर अपने क्षेत्र में खूब रंग चलता था, दीवाली पर पटाखे…

यूँ जानबूझकर पटाखे कुछ ज़्यादा चलाते थे… होली में भी रंग दिखा-दिखा खेला जाता था… अर्थात इतना हौसला था कि किसी दंगे वगैरह में पीठ दिखाने की बात कभी सोची तक नहीं…

यों ऊपरी रूप से इत्तेहाद का दिखावा तो चलता था… हमारे बाप-दादाओं ने 1947 के वक्त के किस्से हमें सुनाए थे… दूसरे पक्ष की व्यूह-रचना के वाकयात हमें बताए थे… हमें सुरक्षा और आक्रमण के तरीके समझाये थे… हमें बचपन से गज़वा ए हिन्द और निज़ाम ए मुस्तफा के बारे में बताया गया था…

शेष जो लोग, मुस्लिम इलाकों में रहते हैं… मौलानाओं की आग उगलती तकरीरें सोते-जागते सुनते हैं… वह कभी आसानी से हिन्दू-मुस्लिम भाई-भाई और सेकुलरिज़्म के झूठे – फरेबी नारों – झांसों में नहीं पड़ते…

दिल पर हाथ रख बताईये कि आपने अपनी संतानों, बेटियों को भारत में आने वाली भावी परिस्थितियों से जूझना सिखाया है?…

उन्हें बताईये कि भारत 2029 में सीरिया, इराक और कश्मीर, बंगाल जैसा होगा… 25% बन भी चुका… उन्हें कश्मीरी पंडितों, अफगानी बौद्धों और पाकिस्तानी हिंदुओं की वर्तमान दशा दिखाइए…

विकास और पैसा ही सब कुछ नहीं होता… वरना लाहौर, कराची, पेशावर और ढाका के तत्कालीन हिंदुओं/सिक्खों से ज़्यादा खुशहाल नहीं हैं हम…

जय श्री राम – जय हिन्दू राष्ट्र

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