फूँक दो इस सड़ चुकी लाश को

nirbhaya shriddhanjali poem making india

क्या लिखूँ? क्यों लिखूँ? लोग लिख रहे हैं, मेरे लिखने से कुछ और फर्क नहीं पड़ेगा। हर रोज़ इतने हो हल्ले के बाद, इतने आंदोलन होने के बावजूद क्या बदल गया? बलात्कार कल भी होते थे आज भी हो रहे हैं।

इसे एंगल दिया जा रहा है। लोग बलात्कारों की भी श्रेणियाँ बना रहे हैं। दोगली मीडिया पहले हर अपराध में हिन्दू-मुसलमान, सवर्ण-पिछड़ा-दलित ढूंढती है फिर अपने हिसाब से उसपर हल्ला मचाती है। हर आदमी मेन-स्ट्रीम मीडिया का पत्रकार नहीं बन सकता, उसके पास सोशल मीडिया का अपना हथियार है, वह यहाँ हल्ला मचा कर मेन-स्ट्रीम मीडिया के दोगले नैरेटिव को बदल देना चाहता है।

सब कुछ एक जुनून, एक पागलपन की तरह हो रहा है। लोगों का गुस्सा बढ़ रहा है, जायज़ है, लेकिन इस गुस्से से हल क्या निकल रहा है? ‘सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं, मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए।’ सूरतें बदलने के लिए आपको जमीन पर आना होगा। उठ खड़ा होना होगा, नींद से जागकर, आरामतलब कमरों से बाहर निकल कर।

बलात्कारी बनने के लिए किसी को ‘परमानेंटली एब्नार्मल’ होने की ज़रूरत नहीं है। ‘क्षणिक अब्नॉर्मलिटी’ किसी को भी बलात्कारी बना सकती है। ‘हीट ऑफ द मोमेंट’। यह बात समझनी होगी कि ‘हीट ऑफ द मोमेंट’ की ‘प्रोबेबिलिटी’ बढ़ती कब है? क्या इसकी कोई खास ‘कलर-कोडिंग’, कोई ‘पैटर्न’ है? जहां यह पैटर्न मिलता भी है वहां मूल में अशिक्षा, जनसंख्या पर ठीकरा फोड़ लोग किनारे हो जाते हैं, सरकारों को दोषी बना कर किनारे हो जाते हैं, क्योंकि यह आसान है। मूल चीज़ छोड़ दी जाती है जैसे अपने आप खत्म हो जाएगी।

इसे खत्म करना, अगर आप, चाहते हैं तो आपको हर मुद्दे पर बात करनी होगी। हर वो मुद्दा जो बलात्कार का कारण हो सकता है। लोग कहते हैं अशिक्षा, गरीबी इत्यादि अपराध दर ज्यादा होने का कारण होते हैं। मैं नहीं मानता कोई ऐसा कारण ‘मूल-कारण’ होना चाहिए। यह सतही बातें हैं। मूल बात यह है कि ये कारण क्यों पनप रहे हैं?

मेन स्ट्रीम मीडिया जिस तरह बहस करवाती है वह पूरी बहस ही दोगलाई है। MSM जिस तरह एक पक्ष चुन कर उसके साथ सहृदय होती है, वह उस पक्ष की हिम्मत बढ़ाता है। उनसे तीखी बातें नहीं पूछी जातीं, ऐसी तीखी बातें जो वास्तव में मूल हैं।

अफसोस यह है कि ये सवाल नहीं पूछे जाएंगे क्योंकि इन्हें ‘ग्लोबल एक्सेप्टेंस’ चाहिए, लेकिन इन अजेंडाबाज़ों के उलट आपको अपनी बेटी सुरक्षित चाहिए। आपकी बेटी इनके लिए ‘मसाला’ है, जब वह जल जाएगी तो इन्हें स्वाद मिलेगा।

आपको इन सब पर रोक चाहिए तो मारिए दौड़ा कर हर उस आदमी को जो जरा सी सीटी बजा कर किसी लड़की को छेड़ता हो, चाहे वह आपकी लड़की हो या किसी और की।

‘बेटी पढ़ाओ, बेटी बचाओ’ से कुछ नहीं होगा। अगर वह पढाई, अगर वह लिखाई उसे मजबूत नहीं बनाती है तो छोड़ दीजिए अपनी लड़कियों पर ये झूठा गर्व करना। नहीं बचा सकते उन्हें तो आपको कोई हक नहीं है कि आप ‘सेल्फी विथ बिट्टी’ कैम्पेन चलाएँ।

आपको रोकना है नैतिक पतन तो फूंक दीजिए वह टीवी जो दिन रात विषैले धारावाहिक दिखा दिखा कर आपके पारिवारिक मूल्यों का क्षय कर रहा है। रोकने हैं बलात्कार तो बेटियों को हिंसक बनाइये। इतना हिंसक कि आपकी पांच साल की बच्ची को भी आत्मरक्षा में अचेतन रूप से ही हथियार चलाना आना चाहिए। इतना हिंसक कि प्रेम में झांसा देकर कोई उसे फँसाना भी चाहे तो एक बारगी डरे। डरे कि वह धोखा देकर ज़िंदा नहीं बचेगा। कानून का मुँह मत देखिए क्योंकि कानून को भी कई-कई नाटकों का सूत्रधार बनना होता है। वह भाँट है, स्वांग भरता है। वह नहीं कर सकता न्याय क्योंकि न्याय बिकता है सड़कों पर मजबूत लोगों के चरणों में लोटता हुआ, पैसों के सामने नाचता हुआ और गलत की लाठी के भय से सिर झुकाता हुआ।

लड़कियां यहां फब्तियां झेलती निकल जाती हैं, कुछ दोगले उनके अंगों को सहला कर निकल जाते हैं। चुप…..कुछ नहीं बोलना है। कुछ नहीं बोलतीं लडकियाँ क्योंकि घर में ही उनके मन में भय भर दिया गया है। चार लोग क्या कहेंगे? इज़्ज़त इज्जत इज्जत चुप रह कर तब तक बचाने की कोशिशें होती हैं जब तक वही इज़्ज़त सरेराह लूट न ली जाय। ऐसे समाज से अगर बलात्कार हटाना चाहते हैं तो पहले सोच बदलिए। छेड़ा जाना स्वीकारने को मजबूर लड़की किसी समाज से बलात्कार खत्म नहीं करवा सकती।

मेरी एक बात याद रखिएगा। इस देश को एक विध्वंसक सम्पूर्ण क्रांति की जरूरत है। यही अंतिम विकल्प है। इससे आप भाग कर छुप नहीं सकते। हर गलत के खिलाफ आवाज़ उठाइये। कुछ लोग मरेंगे, मैं, आप या कोई और मर सकता है, लेकिन मरना पड़ेगा। हमीं को जल कर उजाला करना पड़ेगा, कोई दूसरा खुद को जला कर आपको रौशनी नहीं देगा, अगर आपको रौशनी चाहिए तो पहले खुद जल कर दूसरों को रौशनी दीजिए।

कोई नेता कुछ नहीं बदल सकेगा अगर आप खुद को नहीं बदलते। नेताओं के पिट्ठू आपकी बेटी को बचाने नहीं आएंगे। नेताओं के पिट्ठू आपको गरिया कर, समझा कर कहने आएंगे कि सब उत्तम हो रहा है, लेकिन नेता आपके लिए नहीं खड़े होंगे। अंतिम लड़ाई आपकी है। अपने हथियारों से लड़नी है। कैसे लड़ेंगे आप जानिए। मुझसे पूछेंगे तो यही कहूंगा, निर्भय बन कर गलत के खिलाफ खड़े हो जाइए। कोई पार्टी, कोई नेता आपके साथ तभी खड़ा होगा जब आप अपने साथ खड़े होंगे।

अगर नहीं हो सकता तो कम से कम आवाज़ उठाइये कि ‘प्रसव पूर्व लिंग जांच को वैध बनाया जाए’ ताकि आप बच्ची को कोख में मार कर उसे बलात्कार के दंश से बचा सकें। यह आदर्श समाज, सभ्य समाज कहने से, रटने से कुछ नहीं होगा, इस सिस्टम को जोर का झटका चाहिए। उठा कर पटक दीजिए इस कमजर्फ, भयातुर, जर्जर, सड़ चुके समाज को। पटकिए कि यह मर ही जाय। विध्वंस करके एक नया समाज बनाइये। नहीं तो देखते रहिए बच्चियों की, लड़कियों की, औरतों की, बुढियों की लुटी-पिटी लाशें, नोचे गए जिस्म और जलाइए मोमबत्तियां।

– विवेक कान्त मिश्र (उजबक देहाती)

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