GST : और यहाँ फ़ेल हो जाती है फ़ाइनैन्स मिनिस्ट्री

GST की इनपुट टैक्स क्रेडिट की व्यवस्था एक रेशनल बिज़नस मैन को GST रिजीम के अंदर आने को बाध्य करती है, क्योंकि उसे GST रिजीम में आना सस्ता व बेहतर लगता है। जबकि टैक्समैन को घूस खिलाना ज़्यादा महँगा व रिस्की हो जाता है। अतः वह GST compliant बनना पसंद करता है।

लेकिन ये सैद्धांतिक बात है। असल बात ये है क्या वाक़ई टैक्स मैन को घूस खिलाना GST फ़ाइल करने से ज़्यादा महँगा हो गया है?

दूसरे क्या वाक़ई सारे बिज़नस मैन रेशनल है, उन्हें GST के फ़ायदे समझ आ रहे हैं? इस बात को थोड़ा विस्तार से विचारते हैं।

वास्तविक बात ये है कि GST से जितना राजस्व प्रत्याशित था आया नहीं। GST compliance बहुत कम हुआ।

इसका एक बड़ा कारण ये है कि रेशनल बिज़नस मैन को GST में तो फ़ायदा दिख रहा है लेकिन इनकम एक्स्पोज़ होने से इनकम टैक्स भरने में पसीने छूट रहे हैं।

10 लाख से ज़्यादा कमाई पे 30% इंकम टैक्स देना है, जो बड़ी रक़म है। अतः 30-40 लाख रुपए सालाना कमाने वाला बिज़नस मैन जब गुणा गणित करता हैं तो उसे 12-13 लाख इनकम टैक्स भरने के बजाए घूस खिलाना ज़्यादा फ़ायदे मंद लगता है।

वो कुछ माल एक नम्बर से और ज़्यादातर दो नम्बर से निकालता है। और GST का बेसिक सिद्धांत यहीं फ़ेल हो जाता है अर्थात फ़ाइनैन्स मिनिस्ट्री फ़ेल हो जाती है।

ऐसे में जब 30-40 लाख सालाना या उससे ज़्यादा कमाने वाला बिज़नस मैन अपने से जुड़े छोटे छोटे बिज़नस के साथ डील करता है (जिनके ऊपर इनकम टैक्स का बोझ ज़्यादा नहीं होता और जो GST कम्प्लाइयंट होना चाहते हैं), तो उनसे बिना बिल पुर्ज़ा धंधा करना चाहता है।

उन्हें इसके लिए बाध्य करता है, नतीजा बिना बिल पुर्ज़ा का ट्रान्सपोर्ट होने वाला माल GST रिज़िम में पकड़ जाता है और धंधा चौपट हो जाता है।

बड़ा व्यापारी तब भी गुज़र बसर कर लेता है लेकिन छोटा दाने दाने को मोहताज हो जाता है। जब तक फ़ाइनैन्स मिनिस्ट्री इसे नहीं सुलझा लेती GST सफल नहीं माना जा सकता।

ऐसा देखा गया है कि प्रत्यक्ष कर (इनकम टैक्स) में कटौती करने से अप्रत्यक्ष कर (GST) इतना बढ़ता है कि प्रत्यक्ष कर में की गई कटौती से कई गुना ज़्यादा राजस्व मिलता है।

प्रत्यक्ष कर में कटौती से कुल राजस्व एक समय तक बढ़ता जाता है और एक बिंदु पर अधिकतम होकर पुनः घटता है।

जिस बिंदु पर ये अधिकतम पहुँचता है, उसे ही optimal point कहते है जिसे निर्धारित करना फ़ाइनैन्स मिनिस्ट्री का काम था, जिसमें वो पूर्णत: विफल हुई है। जिससे व्यापार में नुकसान तो हो ही रहा है, GST complinance भी प्रत्याशा से कहीं कम हो रहा है।

इसके अलावा GST compliance में कमी होने एक दूसरा कारण भी है।

माइक्रो व स्मॉल सेगमेंट में बहुत से ऐसे भी बिज़नस मैन हैं जिन्हें बिज़नस में प्रॉफिट होगा या लॉस, ये तक ठीक ठीक कैल्क्युलेट नहीं कर पाते और वो स्पर्धा में (या कहें भेड़ चाल में) इतने सस्ते में उधार माल बेच देते है, वो भी ख़रीदने वाले की फ़ायनैन्शल पोज़ीशन को बिना जाने, कि कुछ समय बाद दिवालिया होने के बाद उन्हें इसका अहसास होता है, कि हम तो बर्बाद गए।

इन्हें इरेशनल बिज़नस मैन कह सकते हैं। जिन्हें रोज़मर्रा के बिज़नस में भी अपना नफ़ा नुक़सान तक नहीं समझ आता है। ऐसे में GST कम्प्लाइयंट होने का फ़ायदा भी उन्हें समझ नहीं आएगा और वो नुक़सान उठाकर भी डिफ़ॉल्ट करेंगे। ये भी एक कारण है, लेकिन ये समय के साथ ही बदलेगा।

बहरहाल, अभी गेंद फ़ाइनैन्स मिनिस्ट्री के पाले में है, इनकम टैक्स दरों को रैशनलाइज़ करना, मंदी की मार झेल रहे सेक्टर को बाहर लाना, GST कम्प्लाइयन्स बढ़ाना, ये सारी चुनौतियाँ अभी बाक़ी है।

GST रोल आउट किया, बढ़िया है, बहुत सारी अड़चनों को सुलझाया, वो भी बढ़िया है लेकिन अभी अभीष्ट सफलता मिली नहीं है जिसका गुणगान किया जाए।

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