संजू : संजय दत्त की सिर्फ़ आत्मकथा नहीं, युवाओं के लिए भी बहुत बड़ा सन्देश

संजय दत्त के विवादस्पद जीवन पर उनके मित्र और फिल्म निर्देशक राजकुमार हीरानी बॉयोपिक बना रहें हैं, यह सुनकर सबसे पहला ख्याल यही आया था मन में कि ज्यादतर बॉलीवुड बॉयोपिक की तरह संजय दत्त के जीवन पर बनी “संजू” भी आत्म महिमामंडन से रचा गया एक सेल्फ असेस्टेड कैरेक्टर सर्टिफिकेट होगी, जिसमें संजय दत्त की गलतियों और अपराधों को परिस्थिति की मांग दिखाकर “उचित” साबित कर दिया गया होगा।

किंतु जब मैंने “संजू” देखी तो राजकुमार हीरानी के प्रति मेरा नज़रिया ही बदल गया। ऐसा लगा कि “लगे रहो मुन्नाभाई” में गांधी जी के जीवनमूल्यों को आज के जीवन से जोडने वाले राजकुमार हीरानी “संजू” बनाते समय भी महात्मा गांधी की सफागोई को ही आदर्श मान रहे थे, जिस तरह महात्मा गांधी ने अपनी आत्मकथा “सत्य के साथ मेरे प्रयोग” मे अपने जीवन के तमाम अच्छे – बुरे पहलुओं को खोलकर रख दिया है, जिसके आधार पर आज कई लोग महात्मा गांधी को व्याभिचारी तक कह देते हैं, वैसे ही फिल्म “संजू” में राजकुमार हीरानी ने संजय दत्त के जीवन को बगैर किसी लाग – लपेट के खोलकर रख दिया है।

फिल्म देखकर आप समझ पाते हैं कि अपने जमाने की सुपरस्टार नर्गिस और सुनील दत्त का बेटा संजय दत्त किशोरावस्था से ही बिगडैल था, शुरुआत से ही उसका रुझान गलत आदतों के तरफ ही ज्यादा था.

एक ही घर में रहते हुए संजय दत्त की बहनों में क्यों कभी वो हीनभावना नहीं जागी जो संजय दत्त के मन में जाग गई कि वो अपने मॉं – बाप के स्तर का अभिनेता नहीं बन पायेगा? और उसकी इस कुंठा ने उसे किस कदर उसके परिवार से ही काट दिया, कि वो अपने पिता को अपना सबसे बडा दुश्मन समझने लगा !

शराब और ड्रग्स की ऐसी लत लगी कि कैंसर से पीडित मॉं नर्गिस अस्पताल में मरणासन्न थी और संजय दत्त मरती हुई मॉ के कैबिन में बैठकर ड्र्ग्स के इंजेक्शन ले रहा था! पिता सुनील दत्त जो एक तरफ बीमार पत्नी को सम्हाल रहें थे ,वो ही दूसरी तरफ ड्रग एडिक्ट बन चुके इकलौते बेटे को भी बचाने की जुगत में लगे थे ,उसका कैरियर संवारने में लगे थे! उसपर भी बेटा अपने पिता को ही अपना दुश्मन मान बैठा हो तो उस पिता पर क्या गुजरती होगी?

शराब और ड्रग की लत अपने आप आपको बाकी व्याभिचारों और अपराधों की ओर धकेल देती है, और इसी लत ने संजय दत्त को औरतबाज बना दिया , अनगिनत वेशयाओं के अतिरिक्त करीबन 350 औरतों के साथ अपने जिस्मानी सम्बंध की बात स्वीकारना संजय दत्त की एक बडी आत्मस्वीकृति है! संजय ड्रग ओवर डोज़ के चलते अपनी पहली फिल्म “रॉकी” की रीलिज पर भी खुद को सम्हाल नहीं पाया और पिता के आगे गिडगिडाकर जान बचाने की गुहार लगाई, जिसके बाद पिता सुनील दत्त अपने बेटे को अमेरिका के एक अस्पताल ले गये.

लम्बे इलाज़ के बाद किसी तरह ड्र्ग्स की लत छूटी लेकिन अपराधियों से उसका सम्बंध अभी भी बना रहा, यह उसने खुद स्वीकारा है कि मुम्बई बम धमाकों के बाद माफिया सरगना अबू सलेम उसके घर आया था , जिससे उसने तीन एके 47 राईफल ली।

लेकिन यह कहना कि एके 47 लेने के पीछे परिवार की सुरक्षा मुख्य वजह थी, कोई बहनों की ईज्ज्त लूटने की धमकी दे रहा था, इसी डर से मैं माफिया से मिल गया , इस तर्क को गले से नही उतारा जा सकता. सुपरस्टार सुनिल दत्त जो कि तब सांसद भी थे, उनकी बेटियों को कोई नुकसान पहुंचा सकता है क्या? और फिर इनलोगो के घर पर तो तमाम तरह की सिक्योरिटी रहती ही है, ऐसे में अपनी कार में एके 47 जैसा गैरकानूनी हथियार रखने का क्या औचित्य?

पर क्योंकि संजय दत्त का रुझान शुरुवात से ही अनैतिक कार्यों की ओर था , अत: माफिया सरगना अबू सलेम से उसकी दोस्ती पर कोई हैरानी नहीं होती। पूरा जीवन तो सुनील दत्त अपने बेटे को बचाने में ही लगा रहा, पहले ड्र्ग्स से और फिर आतंकी होने के आरोप से …और इसी तरह लडते – लडते सुनील दत्त भी चल बसे .. पिता के देहांत पर संजय दत्त की आत्मस्वीकृति है “पापा आप मुझसे कहीं बेहतर बेटा डीज़र्व करते थे, मैं कभी आपकी ताकत न बन सका , हमेशा आप पर बोझ ही बना रहा.”

पिता की मृत्यु के बाद जेल की दुश्कर ज़िंदगी , बुरे कर्मो का बुरा नतीजा बनकर सामने आयी…. कुलमिलाकर “संजू” फिल्म सिर्फ संजय दत्त की आत्मकथा नहीं है, बल्कि इसमे युवाओं के लिये भी बहुत बडा मैसेज है…. ड्र्ग्स और नशे की लत से होने वाले दुष्परिणामों का ऐसा चित्रण पहले कभी नहीं देखा … जीवन में सबकुछ होते हुए भी कोई इंसान कैसे अपनी की हीनभावना में डूबकर खुद को बर्बाद कर सकता है यह फिल्म बताती है.

अभिनय के हिसाब से यह रणबीर कपूर के जीवन की सर्वश्रेष्ठ फिल्म है, उनका अभिनय इतना दमदार है कि आप भूल जाते हैं कि ये संजय दत्त नहीं बल्कि रणबीर कपूर है! सुनील दत्त के रूप में परेश रावल ने पिता के किरदार को बिल्कुल जीवित कर दिया है, उनकी मृत्यु पर कई दर्शक भावुक हो गये थे… हम भी! सजंय दत्त के दोस्त के रूप में विक्की कौशल अपने बेहतरीन अभिनय से पूरी फिल्म पर अपना दबदबा बनाये रखतें हैं।

फिल्म मीडिया की भूमिका पर भी एक प्रश्नचिह्न लगाती है, और यह तो हम सब जानते ही हैं कि किस तरह मीडिया भी एक ड्रग की तरह हम सबकी लत बन चुका है, अखबार वाले, न्यूज़ चैनल वाले जो चाहें हमारे दिमाग में भर देते हैं, खुद ही वकील और जज बनकर फैसला सुना देते है ,अपने निज़ी फायदे के लिये किसी भी व्यक्ति की आपाराधिक छवि बना देते है, फिर भले ही कानून की नज़र में वो व्यक्ति अपराधी न हो.

अभिव्यक्ति की इस आज़ादी ने बहुतों की ज़िंदगी बर्बाद की है, पर संजू बाबा हर कोई खुद पर फिल्म बनाकर दुनियां के सामने अपना पक्ष नहीं रख सकता.. हमारे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इसके सबसे बडे उदाहरण हैं! कुल मिलाकर कई मायनों मे फिल्म “संजू” एक मास्टरपीस है!

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