माँ कामाख्या : सृष्टि फिर तैयार है सद्यस्नाता-सी

ऋतु परिवर्तन, पुष्टि है जीवन की निरंतरता की… धरती पर सदैव एक ही मौसम नहीं रहता… हर मौसम की अपनी सुगंध है, अपनी उपादेयता है…

ग्रीष्म काल से उकताई धरती वर्षा होने के पहले ही बादलों की आहट सुन लेती है और तैयारी कर लेती है पानी की बूंदों से अपनी सूख चुकी मिट्टी के एक बार फिर भीग जाने की…

अपनी देह पर चढ़ी मेल की पर्त से भी जो पुत्र बना लें, ऐसी मातृशक्ति जब अपने सुहाग रूप में आती है तो देह को पूरी सृष्टि भी बना सकती है…

ऐसे ही वर्षा ऋतु के प्रारम्भ होते ही सुहागन सृष्टि ने हरियाली सी हरी चूड़ियाँ पहन ली है हाथों में, पांवों में बारिश की बूंदों की छमछम पहने निकल आई है सांसारिक आँगन में, गले में पहन लिया है नए फलों का हरा और कानों में नए फूलों की लटकन…

नाक में धुंधले आसमान में चमकते तारे की बना ली है नथनी.. देह पर नदी लपेटे माथे पर रख लिया है सूर्य…

माँ कामाख्या के रजस्वला पर्व का पूर्ण होना… यानी प्रकृति का फिर से श्रृंगारित होना है अपने पुरुष के लिए… हाँ पर्व… रजस्वला होना नारी देह का चार दिनी पर्व है… जिसके बाद प्रकृति में आप एक नई ऊर्जा को अनुभव कर सकते हो…

लेकिन इसे अनुभव करने की शक्ति पाने के लिए आपको प्रकृति से एकसार होना पड़ता है… हवा में घुली उसकी सुगंध, नीरवता का संवाद, फलों का स्वाद, अदृश्य तरंगों को देख पाने की क्षमता और आत्मा तक पहुँचने वाले स्पर्श को जानने के लिए आपको अपनी सारी इन्द्रियों पर एकाग्रचित्त होना होता है…

उतार फेंकना यन्त्र, तंत्र, मंत्र रूपी चरण पादुकाओं को जिसमें आपने अपने पैर जकड़ लिए हैं… और पार करना मान लेने के पुल को, ताकि जान लेने की मखमली धरती का आपके पैरों को स्पर्श मिल सके…

ये सिर्फ योनी पूजन का दोबारा प्रारम्भ होना नहीं है, माँ कामाख्या के रजस्वला पर्व के समापन पर जीवन हर बार नया हो जाता है… इस नएपन को अंगीकार कीजिये… क्योंकि ऋतु रोज़ नहीं बदलती… ना ही प्रकृति रोज़ ऐसे श्रृंगारित होती है अपने पुरुष के लिए…

माँ कामाख्या भी होती हैं रजस्वला

 

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