कबीर का वास्तविक स्वरूप देखकर बेहोश ही हो जाएंगे वामपंथी

रामानंद जी ने प्रत्येक वर्ग में गुरु बनाया, सभी वर्गों की धर्मास्था को सुरक्षित किया, स्त्रियाँ भी गुरु बनाई गई।

उनकी लीला अद्भुत थी। देशी विदेशी मुसलमान भी उनके शरणागत थे।

मौलवी विरोध करने आए। उन्होंने कहा- यहाँ क्यों आए? मस्जिद में जाओ और सुनो वहाँ शंख बज रहा है।

मौलवी भागे भागे मस्जिद गए, पाया कि सचमुच शंख की आवाज गूँज रही है, रुकने का नाम नहीं ले रही। सब परेशान होकर रामानंद जी के पास आए, क्षमा माँगी।

रामानंद जी ने पूछा- भगवान विष्णु सर्वत्र हैं, यह समझ गए हो? मौलवियों ने कहा- हाँ।

किसी से बैर विरोध नहीं करना, प्रेम भाव से मिल जुलकर रहना- रामानंद जी का उपदेश पाकर मौलवी लौट गए। उनका एक भक्त अफगानी मुस्लमान भी था।

ये सब घटनाएँ 13वीं शताब्दी की है।

तब इब्राहिम लोदी का राज्य था। इब्राहिम लोदी कबीर को फूटी आँखों देखना नहीं चाहता था। क्योंकि कबीर इस्लाम के विस्तार में सबसे बड़े बाधक थे।

उन्हें काबू में करने के लिए ईरान और अफगान से बड़े बड़े तांत्रिक ज्ञानी मुल्ले मौलवी आए। कबीर ने दरवाजे पर सूअर बँधवा लिया। मौलवी चीख पड़े- तौबा तौबा।

कबीर ने कहा – जब ज़र्रे ज़र्रे में खुदा है तो सूअर में क्यों नहीं? तुम से अच्छे तो हिन्दू हैं जिनका एक भगवान सूअर भी है।

कबीर की ऐसी हरकतों से आजिज़ आकर इब्राहिम लोदी ने कबीर को हाथी के पैरों तले डलवाया। हाथी पीछे हट गया। उन्हें संदूक में बंद करके गंगा में डुबवा दिया। कबीर सुरक्षित बच गए।

आप इन चमत्कारों को नहीं मानना चाहते तो सच जानिए कि हाथी का महावत कबीर का भक्त था और जब संदूक में बंद करके कबीर को गंगा में डुबाया गया, कछुओ ने संदूक काटकर कबीर को बाहर निकाला, कछुआ मतलब गोताखोर।

कबीर इतने लोक प्रिय थे कि वे पंडा पुजारी मूर्ति मंदिर जिसे चाहें खरी खोटी सुना दें। उनकी बातों को कोई बुरा नहीं मानता था-

पाहन पूजै हरि मिले तो मैं पूजूँ पहाड़।
वाते तो चक्की भली जो पीस खाए संसार।।

पत्थर की मूर्ति पूजने वालों ने कबीर का विरोध नहीं किया। उनके आगे सबने सिर झुकाया। क्योंकि कबीर हिन्दुओं के रक्षक थे, पथ प्रदर्शक थे। आपसीपन के प्रतीक थे, राम के अनन्य भक्त थे।

ध्यान रहे कि तब अयोध्या में रामजन्मभूमि पर मंदिर विद्यमान था। सूफी भी राम लला के दर्शन के लिए जाते थे और धन्य होते थे।

जलाल नाम का एक फकीर भी राम लला का मुरीद था, वह दर्शन पाकर धन्य हुआ और राम जन्मभूमि पर कब्जा करने के लिए बावला हो उठा।

बाबर लोदी को परास्त कर चुका था। जलाल ने बाबर से विनय की कि उसे रामजन्म भूमि दी जाए। बाबर के इशारे पर मीर बाँकी के सहयोग से जलाल रामजन्म भूमि पर काबिज़ हुआ।

कबीर के 300 वर्ष बाद गोस्वामी तुलसीदास का आविर्भाव हुआ। तब तक सैकड़ों मंदिर तोड़े जा चुके थे।

मंदिरों मूर्तियों के तोड़े जाने की पीड़ा तुलसी बाबा की रचनाओं में है। तुलसी अकबर कालीन राम भक्त कवि है जिस काल में शासन का दुसह्य अनाचार शिखर पर था-

खेती न किसान को बनिज न बनिक को चाकर को न चाकरी… पूछत एक एक से “काहाँ जाई का करीं”।

वामपंथी इतिहासकार इरफान हबीब जिस अकबरी मोगल काल को स्वर्ण काल कहते हैं उसी काल को प्रत्यक्षदर्शी तुलसी ने कलिकाल कहा- कासी कामधेनु कलि कुहत कसाई है।

इसलिए तुलसी को रामराज्य चाहिए, तुलसी को मंदिर चाहिए, उन्हें हिन्दुओं की सनातन सांस्कृतिक अस्मिता का सृजन और संवर्धन चाहिए। बाबा तुलसी की यह इच्छा आज भी संघर्षशील है।

जिस प्रकार कबीर अपने काल में हिन्दू अस्मिता के रक्षा कवच थे और इब्राहिम लोदी की आँखों की किरकिरी बने, लोदी की यातनाएँ झेली और अडिग रहकर हिन्दुओं के अस्तित्व की रक्षा की।

कबीर के 300 वर्ष बाद तुलसी भी अपने काल की ऐतिहासिक परिस्थिति में हिन्दू अस्मिता के रक्षा कवच बने और अकबर की आँखों की किरकिरी बने, उन्हें भी अकबर ने आगरा के किले में बंदी बनाया, यातना दी।

जब बंदरों के बड़े झुँड ने किले पर उत्पात मचाया, जन विद्रोह फैलने लगा, तब विवश होकर अकबर ने तुलसी को मुक्त कर दिया।

वामपंथियों को कबीर का वास्तविक स्वरूप देखकर बेहोशी आ जाएगी।

राम पर कबीर का कितना बड़ा भरोसा है देखिए-
“जो कबीरा कासी मरे, रामहि कौन निहोरा।”
काशी में जो भी मरता है मुक्त हो जाता, कबीर भी मरेंगे, मुक्त हो जाएँगे। फिर राम की उपासना की जरुरत क्या है ?

कबीर जानते हैं कि राम महादेव के उपास्य है। काशी प्रकाशित हुई है तो इसलिए कि महादेव निरंतर राम नाम के जप करते है। राम नाम तारक अग्नि है।

यही राम कबीर के पास भी है। राम के निहोरा से कबीर जहाँ चाहें काशी प्रकाशी बना सकते। यही है- कबीर की सनातन निष्ठा!

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