अकारण नहीं है अपने भारतीय और हिन्दू होने का गर्व

2015 की बात है. जर्मनी से लौट रहा था. बर्लिन का वर्तमान एयरपोर्ट शहर और देश के नाम के हिसाब से छोटा ही है. सुना है मुख्य एयरपोर्ट अभी बन रहा है.

सुबह सुबह एयरपोर्ट पर भीड़ ना के बराबर थी. चेक इन में वक्त बिलकुल भी नहीं लगा था जबकि मैं हिन्दुस्तान के हिसाब से जल्दी पहुंच गया था.

घड़ी में देखा तो अभी फ्लाइट में बहुत वक्त था. कांच की दीवार से बाहर झाँका तो पाया कि हल्की बरसात अब भी हो रही थी.

वो एक खुशनुमा सुबह थी और मैं बेहद खुश था. और क्यों नहीं होता, मेरी बर्लिन यात्रा बेहद सफल थी.

मैंने पूरे दो दिन बर्लिन की दीवार पर बिता दिए थे. दीवार ने मुझे अपनी ओर आकर्षित कर लिया था. अब मैं इसके बारे में अधिक से अधिक जानना चाहता हूँ.

और इसका कारणन था. ऐसी ऐसी कहानियां पढ़ी और सुनी, जिसे पढ़-सुन कर कोई भी विचलित हुए बिना नहीं रह सकता.

जिन देशों ने इस दीवार को खड़ा किया उनकी अमानवीयता और जिस देश पर इसको खड़ा किया गया उसका दर्द. जर्मनी के लोगो की पीड़ा को समझ पाना आसान नहीं. कुछ एक घटनाएं तो ऐसी हैं जिन्हे सुन कर रोंगटे खड़े हो जाते हैं.

मैंने बर्लिन की दीवार से सम्बंधित दसियों किताब खरीद ली थी और पूरा मन बना लिया कि इस पर एक किताब लिखूंगा. जो अब भी लिखने की योजना है जिसे ‘मैं आर्यपुत्र हूँ’ पुस्तक के लेखन समाप्त हो जाने के बाद प्रारम्भ करूंगा.

बहरहाल, उन्ही में से एक किताब मैंने हाथ में ले रखी थी, यह सोच कर कि फ्लाइट में समय मिलेगा तो पन्ने पलटूँगा. साथ ही आई पैड भी रख लिया था जिससे आवश्यकता पड़ने पर नोट लिख सकूँ. बाकी का सारा सामान चेक इन कर दिया था, जिससे मैं फिर खाली हाथ आराम से एयरपोर्ट में घूम सकूँ.

मैंने कॉफी शॉप से गरम गरम कॉफी ली और एक ऊँचे स्टूल पर बैठ कर कांच से दूसरी तरफ बाहर पुनः झांकने लगा. इस बार निगाह शहर के भीतर तक पहुंच रही थी.

शहर आँखों के सामने से तैरने लगा था. यह शहर मुझे विशिष्ट लगा था. कुछ अलग. यह पेरिस से ठीक उलट है. दोनों में 180 डिग्री का फर्क है.

यह बेहद शांत शहर है तो दूसरी तरफ पेरिस भागता नज़र आता है. पेरिस में वैभव का प्रदर्शन है तो यहां सादगी है. क्या यह पुराने कम्युनिस्ट शासन का असर है?

अगर यह सच है तो फिर यह भी ऐतिहासिक सच है कि आधे बर्लिन पर पश्चिम का शासन था. जहां पश्चिमी संस्कृति हावी थी. यह ठीक है कि आज भी दोनों जर्मनी के इलाकों में फर्क महसूस किया जा सकता है मगर एकीकृत बर्लिन को संपूर्णता में देखें तो शहर में तड़क भड़क नज़र नहीं आती.

होटल के कमरे से लेकर बाज़ार के शोरूम तक में कोई अनावश्यक ग्लैमर नहीं मिलेगा. जो कुछ भी है सब कुछ आवश्यकतानुसार है और उसी के अनुरूप व्यवस्था मिलेगी.

द्वितीय विश्वयुद्ध में तबाह हो चुके बर्लिन के पास इतिहास के नाम पर कुछ विशेष नहीं बचा. जो कुछ है एक दीवार है. उसे भी एकीकरण के समय ढहा दिया गया. बहुत थोड़ा सा कुछ भाग को बचा कर रखा गया है. यह शायद एक आम जर्मन को याद दिलाता रहता है. अब यह इसके कारण ही है या फिर यह एक जर्मन का मूल स्वभाव है कि वो अमूमन गंभीर मिलेंगे.

ना जाने क्यों मुझे लगा कि बर्लिन शहर के अंदर एक आक्रोश है. आमजन में एक ज्वालमुखी है, जो भीतर ही भीतर धधक रहा है और कभी भी फूट सकता है. ठीक है कि हिटलर ने गलतियां की थीं. लेकिन अगर वो हारा ना होता तो वो आज विश्व का नेता होता और उसकी जगह विश्व खलनायक कोई और होते.

आज जर्मनी हिटलर का नाम भी नहीं लेता. मगर क्या उसे माफ़ नहीं किया गया या फिर किसी कारणवश उसे याद नहीं किया जाता? इस पर बहस करना इस लेख का उद्देश्य नहीं. लेकिन यह तय हैं कि आज जर्मनी में उन घटनाक्रमों को लेकर अंतरद्वंद्व है जिसके द्वारा उनका देश-समाज-घर दो भागों में बाँट दिया गया था.

शायद यह विश्व इतिहास की अपने ढंग की अनोखी घटना होगी. यह कोरिया से भिन्न और विशिष्ट इसलिए मानी जानी चाहिए क्योंकि दोनों जर्मनी फिर से एक हुए. उनका एक होना ही मेरे इस मत को प्रमाणित करता है कि वे भावना के स्तर पर बहुत उद्वेलित हैं और जाग्रत भी.

उनके अंदर की आग ने ही उनके आक्रोश को ज़िंदा रखा और एक होने के लिए मजबूर किया. मैं उनमें अपने पूर्वजों, आर्यों की छाया को देखता हूँ. और अब तक के अध्ययन से यह मानता हूँ कि आर्य भारत से चल कर ईरान होते हुए पहले ग्रीस पहुंचे थे और फिर जर्मनी पहुंच कर उन्होंने स्थानीय कबीलाई संस्कृति को गहरे तक प्रभावित किया था. शायद इस विषय पर भी अपनी किताब में कुछ विस्तार से लिखूं.

अपने वैदिक इतिहास को याद कर मैं मन ही मन गौरवान्वित महसूस कर रहा था. और इन्ही सब तथ्यों के मकड़जाल से उलझ कर अपनी कल्पनाओं को बुनता हुआ मैं धीरे धीरे सिक्योरिटी चेक की ओर आगे बढ़ा था.

वहां कोई लम्बी लाइन नहीं थी. मेरे आगे तीन चार यात्री ही थे. अपनी बारी आने पर सिक्योरिटी चेक करवा कर अभी मैं अपना दोनों सामान लेकर आगे एयरपोर्ट के भीतर बढ़ता तभी एक सिपाही ने मुझे अलग आने का इशारा किया था.

उसने मेरे दोनों सामान (किताब और आई पैड) को एक मशीन में रखने के लिए कहा था. मैं बिना कुछ बुद्धि लगाए उसके इशारे में कहे अनुसार करता चला गया. तभी देखता हूँ कि मशीन में से लाल बल्ब जला और एक अलार्म बजा था. उसने एक बार फिर से आई पैड को उस मशीन में रखा, फिर वही लाल बत्ती और अलार्म बजा था.

उसने अबकी बार मेरी ओर घूर कर देखा था. उसका यह व्यवहार मुझे अटपटा लगा था. उसके चेहरे पर कठोरता थी. अब तक मैं समझ नहीं पाया था कि यह सब क्या हो रहा है. इस तरह का कोई चेक मैंने इसके पहले कभी किसी एयरपोर्ट पर नहीं देखा था.

इसके पहले मैं कुछ समझ पाता उसने मुझे एक तरफ खड़ा कर दिया और वायरलेस पर किसी से कुछ कहने लगा. वो अपनी भाषा में बात कर रहा था. यह जर्मन होनी चाहिए. मैं अब उसके चेहरे के भाव से शब्दों को पकड़ने का प्रयास कर रहा.

वो दूसरे जर्मन की तरह ही चेहरे से गंभीर लग रहा था. मैंने उससे पूछा भी “व्हाट हैप्पंड?” मगर उसने कोई जवाब नहीं दिया था. उलटे मुझे गहरी नज़र से देखता रहा.

अब तक भी मैं कुछ विशेष नहीं समझ पाया था, लेकिन जब दो पुलिस वाले आकर मुझे घेर कर खड़े हो गए और एक ऑफिसर मेरे दोनों सामान को उलटपलट कर चेक कर ने लगा तो मुझे समझ आया कि कुछ गड़बड़ है.

यह सब इतना जल्दी हुआ कि अब तक मुझे घबराने की मौका भी नहीं मिला था. लेकिन अब मेरे दिमाग ने काम करना शुरू कर दिया और इतना भर समझ पाया था कि इन्हे मेरे ऊपर कोई शक है.

मैं उनके सैंपल टेस्ट में फेल हूँ. मगर यह सैंपल टेस्ट किस चीज का है, नहीं जान पा रहा था. मैंने उस अधिकारी से भी पूछा,” व्हाट हैप्पंड?” वो या तो मेरी अंगरेजी नहीं समझ रहे थे या फिर उनके लिए मेरे सवाल का जवाब देना जरूरी नहीं था.

उस ऑफिसर ने मुझसे मेरा बोर्डिंग पास मांगा था. कन्फर्म करने के उद्देश्य से पूछा भी कि मैं कहाँ जा रहा हूँ? दिल्ली बताने के बाद उसने मुझ से मेरा पासपोर्ट मांगा था.

वो मेरे पासपोर्ट के पन्ने पलट ही रहा था कि मैंने अपने से ही कह दिया “आई एम एन इंडियन…” और फिर बिना किसी सवाल के आगे भी कह गया “… ए हिन्दू”. यह मेरे द्वारा जानबूझ कर कहा गया था. दुनिया की ख़बरों को पढ़ने सुनने के बाद यह मेरी स्वाभाविक प्रतिक्रिया थी, अपने बचाव में.

“इंडू!” उसने उच्चारण करने के प्रयास किया था.

“नॉट इंडू, हिन्दू.” मैंने तुरंत कहा था. और मैं एक बार फिर विस्तार में बोल गया, बिना उसके पूछे, “माय नेम इज़ मनोज सिंह, आई एम एन इंडियन एंड ए हिन्दू.”

” हिन्दू…” इस बार उसने ठीक उच्चारण किया था. फिर उसने मुझे ऊपर से नीचे तक देखा. अब तक मेरा गला सूखने लगा था मगर फिर भी मैंने मुस्कुराने का प्रयास किया था.

इस बार उसने मेरे आई पैड को एक बार फिर से मशीन में रखा, इस बार मशीन ने हरा बल्ब जलाया. उसने मेरी ओर देखा और मुस्कुराते हुए पूछने लगा “डू यू स्मोक?”

मुझे कुछ समझ नहीं आया, फिर भी झूठ क्यों कहना और मैंने उसे ना में इंकार किया. उसने अचरज में आँख फैलाई और फिर मेरे आई पैड के कवर को सूंघा. उसने मेरे पासपोर्ट को एक बार फिर से उलट पलट कर देखा-पढ़ा और अंत में “सॉरी मि. सिंह” कह कर मुझे मेरा आई पैड और पासपोर्ट लौटाते हुए जाने के लिए कहा था.

मेरी जान में जान आयी थी. मैंने ना जाने कितनी बार उसे थैंक यू कहा था. वहाँ से निकलकर मैं यह पूरे रास्ते सोच सोच कर सिहर जाता था कि अगर उन्होंने मुझे रोक लिया होता तो पता नहीं मेरे साथ क्या होता. एक अनजान देश में मैं एकदम अकेला. किसी को जानता भी तो नहीं था.

आज भी मैं यह नहीं जान पाया कि कहाँ और कैसे मेरा आई पैड किसी बारुद के सम्पर्क में आया. यह यकीनन कहीं किसी माचिस के डब्बे के कारण हुआ होगा. अब उस माचिस को याद कर के ढूंढ निकालना मेरे लिए महत्वपूर्ण तब भी नहीं था आज भी नहीं है. मगर मेरे पासपोर्ट का रंग और मेरे नाम का धर्म कितना महत्वपूर्ण है यह उस अनुभव ने प्रमाणित किया था.

उपरोक्त घटनाक्रम मैं कभी भूल नहीं सकता, पिछले दिनों इसकी याद ताजा हुई थी. आपके इंडियन और हिन्दू होने की क्या वैल्यू है, यह विदेश जाने वाला कोई भी यात्री बता सकता है. आप की पहचान कितनी महत्वपूर्ण है यह विदेश की धरती पर समझ आता है. और जहाँ आप को कोई नहीं जानता वहाँ आप का पासपोर्ट और उसमें लिखा नाम ही आप की पहचान बनता है.

मुझे गर्व है कि मैं एक भारतीय और हिन्दू हूँ. और मेरा यह गर्व अकारण नहीं.

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