गलत फैसले तो बदलने ही पड़ेंगे

काफी पुराना, जाना-पहचाना सा साधु और बिच्छु का किस्सा आपने भी सुना होगा.

कहानी में एक साधु होता है जो नदी में बहे जा रहे एक बिच्छु को बचाकर निकाल लेने का प्रयास कर रहा होता है. साधु बार-बार बिच्छु को उठाता और बिच्छु फ़ौरन साधु को डंक मार देता.

आस पास के कुछ लोगों ने जब साधु की हरकत देखी तो उनसे पूछा, क्या कर रहे हो महाराज? वो डंक मारे जा रहा है आप बचाने की कोशिश में लगे हो! अरे छोड़कर डूब जाने दो न!

साधु महाराज बोले, भाई जब डूबते-डूबते भी बिच्छु अपना डंक मारने का स्वभाव नहीं छोड़ रहा, तो फिर दो-चार डंक में मैं अपना साधु स्वभाव कैसे छोड़ दूं?

साधुओं ने जो भगवा वस्त्र धारण किये होते हैं वो यही त्याग की भावना प्रदर्शित करते हैं. उन्हें बदले में कुछ नहीं चाहिए, वो नि:स्वार्थ भाव से अपना काम करते हैं.

यही वजह है कि सेवा के बदले में धर्म-परिवर्तन का इरादा रखने वाले मिशनरी भी, धोखा देने के इरादे से, भगवा ही धारण कर लेते हैं. इवान्जेलिस्म और चैरिटी में अंतर होता है.

हिन्दुओं के धर्मशास्त्रों से सम्बंधित कई किताबें लिख चुके भारत के पहले राष्ट्रपति डॉ. एस. राधाकृष्णन ने भारत के झंडे के भगवा रंग के बारे में कहा था कि ये त्याग और अस्तेय-अपरिग्रह जैसी चीज़ों का प्रतिनिधित्व करता है.

भारत के नेताओं को भी अपने हितों का त्याग कर के काम करना चाहिए. अफ़सोस कि पुरुषों की रंगों में फर्क करने की क्षमता, जरा सीमित होती है. बेबी पिंक, पीच और फ्लेमिंगो में अंतर ना कर पाने के लिए नौजवानों ने उलाहने सुने होंगे.

युवाओं को ब्लड रेड और मैरून साड़ी में फर्क ना कर पाने पर शर्मिंदा किया गया होगा तो बैंगनी में भी मौव और मैजेंटा में अंतर ना कर पाने पर सबने कड़ी निंदा झेली होगी.

हमारे झंडे में भी भगवा रंग नहीं, केसरिया होता है और ये त्याग का नहीं, बलिदान का प्रतीक होता है. त्याग की तरह कुछ भी वापस ना आये ये भावना केसरिया में नहीं होती. केसरिया किसी बेहतर लक्ष्य के लिए, किसी छोटे लाभ का बलिदान दर्शाता है.

ये वैसा है जैसे परीक्षा के अच्छे नंबर के लिए नींद का बलिदान देना, कल सेहत ठीक रहे इसलिए सुबह जल्दी उठकर दौड़ने जाना, या फिर आज सिगरेट छोड़ देना. कई बार ये पता हो कि भविष्य में फायदा होगा, तो भी लोग ऐसे बलिदान नहीं कर पाते. सिगरेट-शराब छोड़ देना, सुबह जल्दी उठाना, या रोज़ पढ़ना, सबके बस की बात ही नहीं!

पिछले लोकसभा चुनावों में लोगों ने ऐसे ही बलिदान का निश्चय किया था. सबने तो किया भी नहीं था, जैसा कि जनता के स्वयंभू निष्पक्ष पत्रकार बताते हैं, 69% ने तो साफ़ इनकार ही कर दिया था! जिन्होंने बलिदान किया था उनके लिए रंग भगवा नहीं, केसरिया था.

कुछ राजनेता जिनकी आँख पर सत्ता के मद का चश्मा चढ़ गया है उन्हें ये अंतर भी समझना चाहिए. ‘जनता तो भूल जायेगी’ वाली ग़लतफ़हमी तो आपको पहले ही नहीं है, वरना पांच-दस साल पुराने घोटाले के किस्से अपने आई.टी. सेल से निकलवाने की मेहनत आप करते नहीं. तुष्टिकरण का जो अभियोग आप विपक्ष पर लगाते रहे हैं, वही आप पर भी है.

कल तक सुषमा स्वराज के पेज (Sushma Swaraj) की रैंकिंग 4.8 की थी और आज सुबह तक उनके पेज को 4.8 हज़ार लोग पांच सितारों में मात्र एक की रैंकिंग (यानी poor) दे चुके हैं. इसके चलते पेज की रैंकिंग 4.8 से गिरकर कर महज़ एक दिन में सिर्फ 4 रह गई है.

अपने प्रचार के लिए सोशल मीडिया का भरपूर इस्तेमाल करने वालों को ये नजर ना आये ऐसा ज्यादा देर तो होगा नहीं. रैंकिंग गिराना जारी रखिये, गलत फैसले तो बदलने ही पड़ेंगे. अगर ना बदलें तो नुकसान की जिम्मेदारी भी उनकी खुद की है!

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