कुएँ में नमक की बोरी डालने वाले हैं असली शत्रु

क्यों सुषमा स्वराज को लगता है कि उन्हें सादिया सिद्दीकी की मदद करनी चाहिए?

क्यों मोदी को लगता है मदरसे में कंप्यूटर लगवा देना चाहिए और रमजान में कश्मीर में सर्च ऑपरेशन्स सस्पेंड कर देना चाहिए?

ना… मुझे कतई यह नहीं लगता कि सुषमा स्वराज या प्रधानमंत्री मोदी देशद्रोहियों और आतंकियों के साथ हैं.

अगर होते तो आतंकियों के विरुद्ध ऑपरेशन सिर्फ रमजान में नहीं, सालों भर रोक दिए जाते… उन्हें पाला पोसा जाता, जैसा काँग्रेस के ज़माने में किया जाता था.

फिर भी कुछ है जो उन्हें ऐसे निर्णय लेने को मजबूर करता है. मोदी या सुषमा को ही नहीं मजबूर करता, टेरेसा मे और डोनाल्ड ट्रम्प तक के हाथ पकड़ता है.

सुषमाजी को लगा कि ये दुष्ट लोग एक बेचारी लड़की को सिर्फ इसलिए परेशान कर रहे हैं कि उसने एक मुस्लिम से शादी कर रखी है. और वे उसकी मदद करने चली आईं.

मोदीजी को लगता है कि ये मुस्लिम युवा भटके हुए लोग हैं जिन्हें प्यार से समझा बुझा के रास्ते पर लाया जा सकता है…

इन लोगों के दिमाग में यह बातें कैसे घुसीं, किसने भरीं? क्यों देश के ज्यादातर सामान्य सोच वाले लोग ऐसे ही सोचते हैं?

यह सिर्फ सुषमा स्वराज की नहीं, समाज की स्थापित सोच है. उस सोच का नियंत्रण कैसे होता है? कौन करता है? उन्हीं के हाथ में असली सत्ता है, वे ही हमारे शत्रु हैं…

कल बेटे को इंग्लैंड की राजनीतिक स्थिति के बारे में कुछ समझाते हुए मैंने कहा कि ये लोग नहीं चाहते कि राष्ट्रीयता और राष्ट्रवाद के मानक समाज में स्थापित और सम्मानित हों.

उसने प्रश्न किया – ‘ये लोग’ कौन से लोग हैं?

हम लोग घर में राजनीतिक सामाजिक चर्चाएँ करते रहते हैं और मेरा बेटा जो अब 18 साल का हो रहा है इसकी अच्छी इंस्टिंक्टिव समझ रखता है. फिर भी उसे ‘इन लोगों’ की पहचान पर शंका है.

मैंने पूछा, वे कौन से लोग हैं जिनकी बिलबिलाहट और झल्लाहट तुम्हें दिखाई दी थी जब ट्रम्प या मोदी के हाथ में सत्ता आई थी? क्या तब तुम्हें लगा था कि ‘ये लोग’ एक विशेष वर्ग हैं?

हाँ, लगा था… पर ‘ये लोग’ अगर हैं तो दिखते क्यों नहीं हैं?

हाँ. ‘ये लोग’ हैं और दिखते नहीं हैं. यही उनकी ताकत है. पानी में घुला नमक दिखाई नहीं देता. आप अगर खारे पानी वाले इलाके में रहते हैं तो आपको धीरे धीरे उसके स्वाद की आदत हो जाती है और आपको वह पानी ठीक ही लगने लगता है.

मुझे याद है, 2002 में हमने पूरा साल राजस्थान में श्रीगंगानगर, सूरतगढ़, बीकानेर, सरदारशहर के इलाके में बिताया था. पीने का पानी आसपास के गांव की टंकियों से आता था. खारा पानी पीते पीते उसकी आदत पड़ गयी थी.

वापस लौटते हुए जब अम्बाला स्टेशन पर नलके का पानी पिया तो एकाएक लगा कि पानी का स्वाद इतना मीठा क्यों लग रहा है? तब समझ में आया कि मीठे पानी को मीठा क्यों कहते हैं? उसमें शक्कर तो नहीं घुली होती. पर खारे पानी में जो नमक घुला होता है उसकी इतनी आदत हो जाती है कि सामान्य पानी मीठा लगता है.

मोदी और सुषमा स्वराज को इसी खारे पानी की आदत हो गई है. उन्हें लगता नहीं है कि वे कुछ गलत निर्णय ले रहे हैं. पर असली शत्रु वे नहीं हैं. असली शत्रु वे हैं जो पूरे कुएँ में नमक की बोरी डाल रहे हैं. उन्हें पहचानिए…

Comments

comments

loading...

LEAVE A REPLY