तुष्टिकरण : राजनैतिक महत्वाकांक्षा का एक घिनौना चेहरा

सोशल मीडिया पर मुझे लिखते हुए अभी ज्यादा समय नहीं हुआ है और सोशल मीडिया के ज्ञान सागरों के समक्ष मैं एक अदने से तालाब की हैसियत रखता हूँ.

यहाँ मुझे हर विषय के दक्ष व्यक्ति मिले, या ये कहना ज्यादा उचित होगा कि हर विषय के विशेषज्ञ मिले, जिन्होंने तर्को तथ्यों से विरोधियों का शमन एक चक्रवर्ती सम्राट की तरह किया.

आज एक मुहिम में मैं चाहता हूँ कि आप सभी, चाहे वो मुझसे प्रत्यक्ष जुड़े हो या अप्रत्यक्ष, एक मंच पर आ जाइए.

इस लेख को यदि आप राजनैतिक चश्मे से देखने की सोच रहे हैं तो माफ कीजियेगा मैंने लगभग हर विषय को पढ़ा लिखा भी लेकिन एक विषय ऐसा भी रहा है जिससे हमेशा एक निश्चित दूरी बना कर रखी. वो विषय रहा – राजनीति.

ये पूर्णतया गैर राजनैतिक लेख है और यदि मेरे विचार आपको ठीक लगें तो इसपर लिखिए, अपने तरीके से विरोध कीजिये इस तुष्टिकरण का –

9 अगस्त, सन 1911 को तत्कालीन भारत सरकार के सचिव ए हर्ले ने गृह विभाग के द्वारा शिमला से एक प्रस्ताव का उल्लेख करते हुए कहा कि, “11 मार्च, सन 1911 को तत्कालीन सम्राट ने एक शाही फरमान जारी कर कहा है कि दिल्ली में राज्याभिषेक के लिए दरबार लगाया जाए.”

25 अगस्त, 1911 को राजधानी को कलकत्ता से दिल्ली स्थानांतरित करने हेतु गवर्नर ने भारत के लिए अपने साम्राज्य के सचिवों की परिषद को बताया कि भौगोलिक, ऐतिहासिक और राजनैतिक आधारों पर भारतीय साम्राज्य की राजधानी दिल्ली होनी चाहिए. 7 दिसंबर, 1911 महामहिम दिल्ली में प्रवेश करेंगे और मंगलवार 12 दिसंबर, 1911 को उनका राज्याभिषेक होगा.

कालांतर में यही हुआ 12 दिसंबर, 1911 को जार्ज पंचम ने दो घोषणाएं कीं. पहली घोषणा थी – बंगाल का विभाजन समाप्त किया जाता है तथा दूसरी घोषणा थी – कलकत्ता के स्थान पर दिल्ली को राजधानी बनाया जाएगा.

इस प्रकार दिल्ली एक राजधानी के रूप में अस्तित्व में आई और यहां के अधिकारियों के हाथ में समस्त भारत के शासन की बागडोर आ गई.

उस समय दिल्ली पंजाब प्रांत की तहसील थी और पंजाब के तत्कालीन राज्यपाल ने दिल्ली को राजधानी निर्मित करने हेतु भूमि अधिग्रहण एक्ट 1814 की धारा 6 और 7 के अंतर्गत दिल्ली तहसील के कलेक्टर को कई गांवों की भूमि अधिग्रहण करने का आदेश दिया.

पंजाब प्रांत के राजस्व एवं कृषि जनरल ने लाहौर से 21 दिसंबर, 1911 को गांवों की भूमि अधिग्रहण करने हेतु 1894 के एक्ट-1 की धारा 7-ए के अनुसार पत्र लिखा. उस समय भूमि अधिग्रहण के लिए मुआवजे की दर 150 रूपए प्रति एकड़ आंकी गई.

इस प्रकार दिल्ली को राजधानी के रूप में निर्मित किया गया और रविवार 15 फरवरी, 1931 को नई दिल्ली का राजधानी के रूप में विधिवत उद्घाटन किया गया.

नई दिल्ली के निर्माण का यह संक्षिप्त इतिहास इसलिए आज प्रासंगिक है क्योंकि नई दिल्ली को राजधानी बनाने हेतु तत्कालीन भारत सरकार ने वर्ष 1911 से 1915 के दौरान भूमि का अधिग्रहण किया था.

दरअसल 1970 में अचानक दिल्ली वक्फ़ बोर्ड ने एक तऱफा निर्णय लेते हुए इन सभी सम्पत्तियों को एक नोटिफिकेशन जारी कर वक्फ़ सम्पत्तियां घोषित कर दिया.

भारत सरकार ने इस मामले में तुरन्त हस्तक्षेप करते हुए इस निर्णय के विरुद्ध बोर्ड को प्रत्येक सम्पत्ति के लिए नोटिस जारी कर इन्हें वक्फ़ सम्पत्ति मानने से इन्कार कर दिया. इतना ही नहीं, सरकार ने बोर्ड के विरुद्ध न्यायालय का दरवाजा भी खटखटाया.

वर्ष 1974 में भारत सरकार ने एक हाई पावर कमेटी का गठन कर इन सम्पत्तियों से जुड़े मामले का अध्ययन कर उसे रिपोर्ट देने का निर्णय लिया. वक्फ़ बोर्ड के पूर्व अध्यक्ष एसएमएच बर्नी को इस कमेटी का अध्यक्ष बनाया गया.

अपनी रिपोर्ट में एसएमएच बर्नी ने स्वयं लिखा कि इस कमेटी को उप-राष्ट्रपति भवन और वायरलेस स्टेशन के अन्दर की संपत्तियों में घुसने नहीं दिया गया. अंततः इस कमेटी द्वारा सभी सम्पत्तियों को वक्फ़ सम्पत्तियां घोषित कर दिया.

भारत सरकार ने अपने वर्क्स व हाउसिंग मंत्रालय द्वारा 27 मार्च, 1984 को जारी ऑफिस आदेश संख्या 20011/4/74.1 के माध्यम से इन सभी संपत्तियों को एक रुपए प्रति एकड़ प्रति वर्ष के पट्टे पर वक्फ़ बोर्ड को दे दिया.

सरकार के इस फैसले के खिलाफ एक समाजसेवी संगठन ने जून 1984 में जनहित याचिका संख्या 1512/1984 के माध्यम से दिल्ली उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया.

मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए माननीय उच्च न्यायालय ने सरकारी आदेश पर रोक संबन्धी स्थगन आदेश पारित किया और सरकार से पूछा कि क्या सरकार की कोई ऐसी नीति भी है जिसके तहत वह किसी व्यक्ति या संस्था को, जिससे कोई संपत्ति अधिगृहित की हो, को उसी संपत्ति को पट्टे पर दे सके.

सरकार के पास ऐसी कोई नीति नहीं थी. 26 अगस्त, 2010 को भारत के तत्कालीन अतिरिक्त महाधिवक्ता पराग पी त्रिपाठी न्यायालय के समक्ष उपस्थित हुए और कहा कि सरकार चार सप्ताह के अन्दर इस संबन्ध में कोई नीतिगत निर्णय ले कर सूचित करेगी.

किन्तु, चार सप्ताह की बात तो दूर, पूरा वर्ष 2010 बीत जाने पर भी जब सरकार नहीं लौटी तो सत्ताइस वर्षों की कानूनी लड़ाई लड़ने के बाद 12 जनवरी, 2011 को समाजसेवी संगठन की याचिका का निस्तारण यह कह कर, कर दिया गया कि भारत सरकार इस मसले पर पुनर्विचार कर छः मास के अन्दर निर्णय ले और तब तक न्यायालय का स्थगन आदेश जारी रहेगा.

जब छः माह में भी सरकार कोई निर्णय न कर सकी तो न्यायालय ने और छः माह दे दिए. किन्तु, दो वर्ष और डेढ़ माह बीत जाने के बाद आनन-फ़ानन में केंद्रीय मंत्रिमण्डल की एक बैठक रविवार 2 मार्च, 2014 को बुलाई गई और यूपीए-2 सरकार द्वारा अन्तिम केबिनेट बैठक में आखिर निर्णीत कर सभी 123 सम्पत्तियों को दिल्ली वक्फ़ बोर्ड को देने का प्रस्ताव पारित कर दिया गया.

यूपीए-2 की सरकार ने जाते-जाते मुस्लिम मतदाताओं को लुभाने हेतु मुस्लिम तुष्टिकरण का परिचय देते हुए 5 मार्च, 2014 को चुनाव आयोग द्वारा मतदान की तिथि घोषित करने ठीक 3-4 घंटे पहले ही भारत सरकार के गृह मंत्रालय द्वारा एक राजपत्र – पत्र जारी कर दिया गया था.

समाचार एजेंसी पीटीआई के अनुसार यह राजपत्र पत्र जारी करने से 2-3 दिन पहले केंद्रीय सूचना एवं प्रसारण मंत्री मनीष तिवारी ने इस विषय के बारे में पत्रकारों को बताया भी था.

इस राजपत्र पत्र के अनुसार दिल्ली के 123 अति महत्त्वपूर्ण स्थानों पर स्थित 123 भू-सम्पत्तियों को अब दिल्ली विकास प्राधिकरण (डीडीए) व सरकार के लैण्ड एण्ड डेवलपमेंट ऑफिस (एलएनडीओ) के कब्जे से छुड़ा कर दिल्ली वक्फ़ बोर्ड को सौंपा जाएगा.

इनमें से अधिकांश दिल्ली के कनाट प्लेस, मथुरा रोड, लोधी कालोनी, मान सिंह रोड, पण्डारा रोड, अशोक रोड, जनपथ, संसद मार्ग, करोल बाग, सदर बाजार, दरिया गंज व जंग पुरा में स्थित हैं, जिनका मूल्य व महत्त्व आसानी से समझा जा सकता है.

सरकार की इस घोषणा की टाईमिंग ने कई सवाल खडे कर दिए क्योंकि सरकार के इस फैसले से संदेश यही गया था कि सरकार ने मुस्लिम-मतदाताओं को खुश करने हेतु ही ऐसा मुस्लिम-तुष्टीकरण करने वाला फैसला लिया था.

सन 1985 में शाह बानों प्रकरण में जब राजीव गाँधी सरकार ने मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के मौलवी साहबों से डर कर एक बेसहारा ग़रीब औरत के पक्ष में लिए गए अदालती फैसले को खारिज कर दिया, ओबैदुल्ला खाँ आजमी और सैयद शहाबुद्दीन जैसे कठमुल्लों ने तत्काल All India Muslim Personal Law Board का गठन कर डाला और ‘इस्लाम बचाने’ के कार्य में जुट गये.

पूर्ण बहुमत प्राप्त राजीव गांधी की सरकार उस समय दोनों सदनों मे ‘पूर्ण बहुमत’ में थी. राजीव गांधी की सरकार मुस्लिम वोट बैंक हड़पने के लिये इतना गिर गई कि उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के आदेश को पलटने के लिये संविधान मे ही परिवर्तन करने का फैसला किया.

इस बेहद विवादित मामले में राजीव गांधी की तत्कालीन केंद्र सरकार ने मुस्लिम महिला (तलाक अधिकार संरक्षण) अधिनियम पारित कर मोहम्मद खान बनाम शाहबानो मामले में सर्वोच्च अदालत द्वारा 23 अप्रैल, 1985 को दिए फैसले को पलट दिया था.

1986 में राजीव गांधी की सरकार ने मुस्लिम धर्मगुरुओं के दबाव में आकर मुस्लिम महिला (तलाक पर अधिकार संरक्षण) अधिनियम, 1986 पारित किया. राजीव गांधी ने इस केस का फैसला शाहबानो के पक्ष में आने के बाद संसद में वो कानून ही बदलवा दिया था, मुस्लिमों को खुश करने के लिए. और शाहबानो को मिला हुआ इन्साफ नहीं मिल सका.

सन 2009 में यूपीए सरकार दोबारा सत्ता में आयी, तो दिनांक 8 दिसंबर 2009 को मुसलमानों के लिए सरकारी नौकरी में जाति के आधार पर 10% आरक्षण करा दिया जो उनकी संख्या के अनुपात से अधिक था. (The Stateman 19 Dec 2009)

मुसलमानों के लिए 5% आरक्षण दिया था और पढाई के लिए सस्ती दरों पर ब्याज देने का आदेश बैंकों को दिया था. (Times of India 8 Jan 2009)

भारत सरकार ने 2009-2010 के दौरान मुसलमानों के लिए दी जाने वाले अनुदान की राशि को 2007 (Indian Express 18 Dec 2007) की तुलना में 74% बढ़ा दिया.

इसके पहले मनमोहन सिंह ने मुसलमानों के लिए 7780 करोड़ का एक खास पैकेज देते हुए कहा था कि – ‘भारत के संसाधनों पर प्रथम अधिकार मुस्लिमों का और उन्हें देय यह राशि बढ़ाई जा सकती है.’ (Anand Bazar Patrika 9 Nov 2007)

कांग्रेस ने उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश के चुनावों को ध्यान में रखकर आजमाया हुआ तुष्टिकरण का कार्ड खेला था. जुमे की नमाज के लिए 90 मिनट का अवकाश देकर कांग्रेस की नज़र मुसलमानों के 14 फ़ीसदी वोटबैंक पर थी.

कांग्रेस वर्षों से इसी प्रकार मुसलमानों को लुभाकर अपने राजनीतिक हित साधती रही है. नरसिम्हाराव के प्रधानमंत्रित्व काल में मस्जिदों के मुल्लाओं का वेतन सरकारी कोष से दिये जाने की घोषणा. सन 1993 ई. में हज के लिए सरकारी सहायता की घोषणा.

आंध्र प्रदेश की सरकार ने मुस्लिमों को पांच प्रतिशत आरक्षण प्रदान करने की घोषणा कर की थी तो वहीं रामविलास पासवान बिहार के अंदर सत्ता में आने पर इसे दस प्रतिशत करना चाहते हैं.

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने वर्ष 2011 में सत्ता में आने के कुछ ही दिन बाद मस्जिदों के इमाम और मोअज्जिन को क्रमशः 2500 रुपए व 3500 रुपए प्रतिमाह भत्ता देने की घोषणा की थी.

हालांकि, सरकार के इस फैसले को कोर्ट ने असंवैधानिक करार दिया. कोर्ट के फैसले से नाखुश ममता बनर्जी ने एक दूसरा रास्ता निकाला. अब इमामों और मुअज्जिनों का भत्ता वक्फ बोर्ड के माध्यम से दिया जा रहा है लेकिन जाता किसकी जेब से है, कभी सोचियेगा.

पिछले विधानसभा चुनावों में तृणमूल कांग्रेस के निर्वाचित 211 विधायकों में 32 मुसलमान हैं. वर्ष 2011 में ममता बनर्जी के मुख्यमंत्री बनने के बाद राज्य सरकार ने मुस्लिमों के विकास के लिए आवंटित होने वाले बजट में चार गुना बढ़ोत्तरी की है. चालू वित्त वर्ष में मुसलमानों पर 2400 करोड़ रुपए खर्च किए जा रहे हैं.

ममता बनर्जी ने हाल में पश्चिम बंगाल में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की तरफ से संचालित 125 स्कूलों को बंद करने का फरमान सुनाया था. इतना ही नहीं जल्द ही ऐसे 370 और स्कूलों को भी बंद करने पर विचार किया जा रहा है. ममता बनर्जी सरकार का कहना है कि इन स्कूलों में धार्मिक प्रशिक्षण दिया जाता है.

मुस्लिम वोटों की चाहत में बसपा भी पूरी ताकत के साथ मैदान में उतर पड़ी है. मिशन – 2017 फतह करने के लिए दलित-मुस्लिम गठजोड़ बनाने में लगी बसपा ने ‘मुस्लिम समाज का सच्चा हितैषी कौन? फैसला आप करें’ नाम से एक बुकलेट जारी की थी.

इसमें बताया गया था कि किस तरह सपा की प्रदेश में सरकारें आई हैं तब-तब भाजपा पहले से और मजबूत हुई है. जबकि बसपा के शासनकाल में भाजपा कमजोर हुई है. इस पुस्तिका में चुनाव के बाद भाजपा से किसी प्रकार के गठबंधन से साफ इंकार किया गया था.

इसमें कहा गया कि सपा ने मुस्लिमों के साथ वादाखिलाफी की है. सपा ने न तो आरक्षण का वादा पूरा किया और न ही जेलों में बंद बेकसूर मुसलमानों को रिहा करने का. सभी वादे खोखले निकले. सपा सरकार में कुल मिलाकर 400 दंगे हुए. साथ ही मुज़फ्फरनगर दंगों के लिए कभी सपा को माफ नहीं किया जायेगा.

कुछ आम आदमी पार्टी के कारनामे भी सुनते चलते हैं, नहीं तो जिल्लेइलाही बुरा मान जायेंगे –

“अफजल गुरु की फांसी से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देश की बदनामी हुई है.”
“भारतीय आर्मी कश्मीरी लोगों को मारती है.”
“हिन्दू आतंकवाद आज चरम पर है.”
“कश्मीर को भारत से अलग कर दिया जाये.”

बुखारी ने कहा अन्ना के आन्दोलन से वन्दे मातरम बंद कर दीजिये क्यूंकि मुस्लिमों में वन्दे मातरम नहीं बोला जाता है, अरविंद केजरीवाल ने बंद किया वन्दे मातरम और बाद में इसी बुखारी के पास मिलने भी गये चुनाव में मदद मांगने.

इसके अलावा सभी पार्टियों के केंद्र में अल्पसंख्यक, दलित और समाज तोड़ो का एजेंडा ही है.

पार्टी कोई भी हो, राजनेता कोई भी हो, वो विकास, सुशासन, किसान, सैनिक, राष्ट्र उन्नति, परिवहन, पोषण, शिक्षा और चिकित्सा जैसे मुद्दों की बजाय समुदाय विशेष की जी-हुज़ूरी क्यों करना चाहते हैं?

भारतीय संविधान में स्पष्ट लिखा है कि पंथ, मज़हब के आधार पर किसी प्रकार का आरक्षण नहीं दिया जा सकता. फिर भी मण्डल कमिशन के प्रावधानों का दुरूपयोग कर पिछड़े वर्ग के 27 प्रतिशत कोटे में से 4.5 प्रतिशत कोटा अल्पसंख्यकों के लिये निर्धारित करने का निर्णय केन्द्रीय मंत्री परिषद ने उप्र चुनावों की घोषणा से एक दिन पूर्व ही लिया था. क्या यह पंथ पर आधारित भेदभाव नहीं है?

अल्पसंख्यकों को मुख्यधारा में लाना है, यही बोलते रहते हैं ना… तो अनेक लाभकारी योजनाओं द्वारा अल्पसंख्यकों के नाम पर अरबों-खरबों की धनराशि मुसलमानों पर पिछले 65 वर्षों से लुटाई जाती आ रही है. समस्त संवैधानिक अधिकारों के अतिरिक्त बहुसंख्यक हिंदुओं से अधिक विशेषाधिकार होने पर भी मुख्य धारा से अलग कैसे?

अब केंद्र ही भाजपा सरकार पच्चीस लाख अल्पसंख्यक परिवार को अपने साथ जोड़ने के लिए उनकी रुचि के अनुसार रोजगार देना चाहती है. इसके लिए ड्राइविंग और कारों की सर्विसिंग से जुड़े रोजगार पर सबसे ज्यादा ध्यान होगा.

सूत्र बताते हैं कि अल्पसंख्यक मंत्रालय और मारुति और टोयटा के साथ एक ऐसे समझौते पर विचार हुआ है जिसके तहत वह चुने हुए युवाओं को पांच से छह महीने का प्रशिक्षण देंगे. इस दौरान प्रशिक्षण का सारा खर्च सरकार उठाएगी.

ऐसे युवाओं के लिए होस्टल भी बनाये जायेंगे. ध्यान रहे कि कुछ दिन पहले ही अल्पसंख्यक मामलों के राज्य मंत्री मुख्तार अब्बास नकवी ने मेवात में ‘प्रोग्रेस पंचायत’ लगाई थी और आने वाले पांच-छह महीनों में ऐसी सौ पंचायत और भी होनी है.

सोचने का विषय यह है कि क्या हिन्दुओं में बेरोजगार नहीं?

क्या हिंदुओं को प्रशिक्षित करके रोजगार देने की आवश्यकता नहीं?

आंकड़ो के अनुसार आज भी अल्पसंख्यकों की कुल जनसंख्या से अधिक हिन्दू गरीबी रेखा के नीचे जीने को विवश है. जब वर्तमान सरकार ‘सबका साथ-सबका विकास’ के सिद्धांत पर कार्य कर रही है तो यह भेदभाव क्यों?

साथ ही भारत के धर्मनिरपेक्ष स्वरुप में ‘अल्पसंख्यक मंत्रालय’ (जिसका गठन 2004 में यूपीए सरकार ने किया था) का कोई औचित्य है?

विशेष

780 सालों तक इस्लामिक शासन के बाद 1609 ई० में स्पेन आजाद हुआ… जिस दिन स्पेन को आजादी मिली उसी दिन स्पेन ने घोषणा की… कि जो मुसलमान स्पेन में बचे हैं या तो वो स्पेन की संस्कृति अपना लें… या फिर 3 दिनों के भीतर अपना बोरिया-बिस्तर बाँध लें और स्पेन से बाहर निकल जाएँ… स्पेन की इस सख्त घोषणा ने स्पेन में अल्पसंख्यक तुष्टिकरण का त्वरित समाधान कर दिया.

बीसवीं शताब्दी में संयुक्त राज्य अमरीका में यूरोप के अलग-अलग देशों से लोग आकर बसने लगे, अलग देशों की संस्कृति अलग-अलग थी, उनके मत और व्यवहार अलग अलग थे.

जब औद्योगिक विकास में इन अलग-अलग देशों से आने वालों के कारण समस्या उत्पन्न हुई तब अमेरिका के सेक्रेट्री ऑफ़ स्टेट्स जान क्विंसी एडम्स ने कहा कि जिन लोगों की वजह से हमारा देश पिछड़ रहा है ऐसे लोगों को अपना यूरोपियन चोला हमेशा-हमेशा के लिए उतार के फेक देना चाहिए और वो यदि ऐसा नहीं कर सकते वो ऐसे लोगों के लिए यूरोप जाने का रास्ता एटलान्टिक महासागर सदा खुला रहेगा.

उनकी इस घोषणा का असर ये हुआ कि अमेरिका में रहने वाले यूरोपीय लोग आज खुद को गर्व के साथ अमेरिकी बताते हैं.

मंचूरिया के मंचुवो का चीन पर शासन था, चीन में जब साम्यवादी सत्ता स्थापित हुई तब पर्याप्त संख्या में चीनियों को मंचूरिया में बसा दिया गया, और आज मंचूरिया में ममंचू जो कि वहाँ के मूल निवासी थे, वो अल्पसंख्यक हो गए. इसी तरह चीन ने योजनाबद्ध तरीके से तिब्बत में चीनियों को बसाकर तिब्बतियों को वहाँ अल्पसंख्यक बना दिया.

पचास के दशक में इज़राइल ने करीब 20 हज़ार से ज्यादा मुसलमानों को इज़राइल से बाहर निकाल दिया, वो भी एक ही दिन में, और जो मुसलमान इज़राइल में बच गए, उनकी जमीन जायदाद को इज़राइली सरकार ने यहूदियों में बाँट दिया.

आज इज़राइल दुनिया का एकलौता ऐसा देश है, जहाँ मुसलमानों के आतंकी कृत्यों को लेकर सरकार जीरो परसेंट टॉलरेंस नीति अपनाती है, यानी इज़राइल में मुसलमान होना ही गुनाह है. इज़राइल के इस एक कदम ने इज़राइल में मुस्लिम तुष्टिकरण को जड़ से उखाड़ कर फेक दिया.

अब भारत में आइये… यहाँ धर्म के नाम पर पहले आपके देश के तीन टुकड़े किये जाते हैं, इसके बाद मुसलमानों को योजनाबद्ध तरीके से भारत में बसाया जाता है, मुसलमानों को विशेष सुविधाएं दी जाती हैं, चार शादी करने की अनुमति मिलती है, हज पर सब्सिडी मिलती है…

मुस्लिम बाहुल्य कश्मीर को विशेष राज्य का दर्जा मिलता है, सेना पर पत्थर फेंकने के लिए मुसलमानों को भरपूर अवसर मिलता है, गोहत्या करने की छूट मिलती है, जबरन धर्म-परिवर्तन कराने के लिए बाकायदा मदरसों का गठन किया जाता है, यहाँ मुसलमान जबरन मंदिरों पर कब्ज़ा करते हैं, हिन्दू औरतों को जबरन या बहला फुसलाकर धर्मांतरण कराया जाता है लेकिन भारत सरकार चुप रहती है!

और बड़े-बड़े मंच से मुस्लिम तुष्टिकरण खत्म करने की बात की जाती हैं, लेकिन सत्ता प्राप्ति के बाद इनके मुँह और हाथ में दही जम जाता है और मुसलमानों के खिलाफ कुछ बोल या ना कर पाने की अपनी नपुंसकता को ये संविधान के चोले से ढक लेते हैं और कहते हैं कि अब हम संवैधानिक पद पर हैं.

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