मुग़ालता न पालें कि धरती पर आप अकेली हैं जो कर सकें दूध का दूध और पानी का पानी

विकास मिश्रा पर हुई त्वरित कार्रवाई भले ही त्वरित दिख रही हो; पर यह त्वरित नहीं है. यह परिणाम है विगत 70 वर्षों से पिलाई जा रही फ़र्जी सेक्युलरिज़्म की घुट्टी का.

इस घुट्टी ने देश के पढ़े-लिखे तथाकथित बुद्धिजीवियों का मानसिक अनुकूलन कर दिया है, वे निष्पक्ष और न्यायपूर्ण रह ही नहीं पाते, क्योंकि वे मानकर चलते हैं कि अल्पसंख्यक हमेशा पीड़ित ही होता है और यदि वह मुसलमान हो तो वह और अधिक पीड़ित है!

और राजनेताओं की दृष्टि में तो वह मुल्क़ का बंटवारा वाले दिनों में भी पीड़ित था, आज़ादी के बाद के दिनों में भी और आज भी! उनका दिमाग़ तो वोट-बैंक से आगे की सोच ही नहीं पाता!

और इसी अनुकूलन का परिणाम है कि हमारी कूल-ड्यूड पीढ़ी को ट्रेनों-प्लेटफॉर्मों-बस स्टैंडों-पार्को या किसी भी सार्वजनिक स्थलों पर नमाज़ अता करने में कुछ भी आपत्तिजनक नहीं लगता-दीखता.

उल्टे वो उसमें सहयोग प्रदान करने की हर संभव कोशिश करने लगते हैं, स्वयं कष्ट उठाकर भी उन्हें कोई तकलीफ़ न हो इसकी हर संभव चेष्टा करते हैं, पर वहीं दूसरी ओर उन्हें हिंदुओं का पूजा-पाठ ढ़कोसला लगता है; किसी ने चोटी बढ़ा ली, तिलक लगा लिया, कंठी धारण कर ली, तो यह तो पक्का पाखंड है!

यहाँ उन्हें यह निजी मसला नहीं लगता; वे ज्ञान बघारना शुरू कर देंगे कि सच्ची पूजा इंसानियत है, कि सच्चा धर्म दुःख-सुख की साझेदारी है, कि किसी को कष्ट न पहुँचाना पुण्य और किसी को कष्ट पहुँचाना पाप; इसलिए क्या होगा घड़ी-घंट बजाने से, क्या होगा शंख फूँकने से, क्या होगा आरती उतारने से, क्या होगा मत्था टेकने से, क्या होगा तिलक लगाने और चोटी रखने से.

[पासपोर्ट विवाद : क्या इस देश में जांच अधिकारी किसी मुसलमान से सवाल भी नहीं कसर सकते?]

तो मेरे कूल-ड्यूड बेबियों, माना कि इन सबसे कुछ नहीं होगा, माना कि धर्म बहुत गहरी चीज़ है, माना कि धर्म आत्मोन्नयन का माध्यम है और (माना क्या, सच तो यह है कि धर्म का यह अर्थ हमने ही दुनिया को सिखाया है); पर मेरा सवाल आप ज्ञान-बघाडू दिव्यात्माओं से यह है कि कहाँ चला जाता है आपका यह ज्ञान जब आप मज़हब के नाम पर एक अच्छे-भले मानव-समूह को उन्मादियों की भीड़ में तब्दील होते देखते हैं; कहाँ चला जाता है आपका यह ज्ञान जब आप अपने नागरिक-अधिकारों का हनन देखकर भी सार्वजनिक-स्थलों पर कुकरमुत्तों की तरह उग आए मस्जिदों-मज़ारों को देखकर मौन रह जाते हैं, उसके बाहर सड़कों पर लगाए जाम पर मुँह नहीं खोलते, हर शुक्रवार को मस्जिदों से लौट रही भीड़ की बदतमीज़ी को भी शालीनता मान उन्हें ससम्मान पहले जाने की मिसाल पेश करने लगते हैं, ट्रेनों में आने-जाने के लिए छोड़ी गई जगह में रुमाल बिछाकर नमाज़ अता करने को धार्मिक प्रक्रिया मान उसमें सहयोग करना शुरू कर देते हैं?

हे कूल-ड्यूड बेबियों! आपसे इतिहास-बोध और यथार्थ-बोध की अपेक्षा करना तो मूर्खता ही होगी, पर थोड़ा तो तार्किक बनिए; चीज़ों को न्याय की तुला पर तौलकर सही को सही और ग़लत को ग़लत कहने की हिम्मत तो कीजिए!

पर दोष आपका नहीं है, दोष उसी मानसिक अनुकूलन का है, मेंटल कंडीशनिंग का है, जिसकी जड़ें लॉर्ड मैकाले से लेकर वामपंथी-ब्रिटिश-मुगल इतिहासकारों तक जाती हैं; रही-सही कसर उनके मानस-पुत्रों ने पूरी कर दी. जिसका परिणाम यह है कि बहुसंख्यक सदैव उत्पीड़क और अल्पसंख्यक (मुस्लिम/ईसाई) सदैव उत्पीड़ित ही नज़र आता है.

हे, मेरे पीड़ित भाइयों-बहनों! यह क्या बात हुई कि आपको जब सुविधा हुई आपने ख़ुद को अल्पसंख्यक बता सरकार और तंत्र से तमाम सुविधाएँ झटक लीं; जब सुविधा हुई स्वयं को पीड़ित बता सहानुभूति बटोर ली, जब सुविधा हुई अपने लिए संविधान में दी गईं तमाम सहूलियतों का हवाला देना शुरु कर दिया!

क़ानून सबके लिए एक होता है, आपको ही क़ानूनी या वैधानिक प्रक्रिया से गुज़रने से इतना परहेज़ क्यों है, क्या आपकी नवाबी मानसिकता, शासक वाली मनोवृत्ति आज भी यथावत है, क्या आपका अल्पसंख्यकवाद, क्या आपकी जातीय अस्मिता राष्ट्रीय सुरक्षा एवं हितों से भी ऊपर है?

अजी मोहतरमा, यदि संबंधित अधिकारी ने आपके दस्तावेज़ों की छान-बीन कर दी तो यह आपकी शान के ख़िलाफ़ कैसे हो गया? क्या आप अमेरिका में भी यही दलील देतीं?ज़रा, एक बार अपने गिरेबान में झाँककर ख़ुद से यह भी तो सवाल कीजिए कि क्यों पूरी दुनिया आपको शको-शुबह से देख रहा है?

दिमाग़ पर ज़्यादा ज़ोर डालना पड़ रहा हो तो हमीं बताए देते हैं, आपकी इसी दोगली मानसिकता पर कि मुल्क़ के सारे ऐशो-आराम का लुत्फ़ लेते हुए भी आपको चंद पल नहीं लगते वफ़ा बदलने में, कि आपको चंद पल नहीं लगते मुल्क़ की तस्वीर बदरंग करने में; कि आपको चंद पल नहीं लगते मुख्यधारा छोड़ मज़हबी राह पकड़ने में!

अरे, मुँह खोलने से पहले एक बार तो सोचिए कि इस मुल्क के बच्चे-बूढ़े-जवान, सबने मिल-जुलकर कलाम और हमीद जैसों को सिर-माथे बिठाया है? समस्या केवल उन्हें है, जो अलग विधान, अलग निशान को दिलों से निकाल नहीं पाए हैं. समस्या केवल उन्हें है जो चंद रुटीन सवालों को भी मज़हबी मसला बना डालते हैं.

और शर्म आती है, राजनीतिज्ञों की इस पक्षपातपूर्ण मानसिकता पर; इस ताड़का-पूतना पोषित सोच पर, आनन-फ़ानन में बिना किसी जाँच-पड़ताल के फ़ैसले सुना डालने वाली इस मानसिकता पर; ऐसा निर्णय लेने के बाद शायद आपको यह भी गुमान हो कि आप इस धरा-धाम पर अकेली ऐसी हैं जो दूध का दूध और पानी का पानी करने का सामर्थ्य रखती हैं, तो सचमुच मुग़ालते में हैं आप!

आप भयानक भूल कर रही हैं. आप तो ऐसी न थीं! आपको तो समझना चाहिए कि इस तरह के निर्णयों के बड़े दूरगामी व राष्ट्रघाती परिणाम होते हैं. अब हर कोई अल्पसंख्यक-कार्ड खेल संस्थाओं-व्यक्तियों का अवमूल्यन करेगा; कि हर कोई इस कार्ड को खेल नियमों-क़ानूनों से मनमानी छूट लेना चाहेगा; कि अब कर्तव्यनिष्ठ और निडर अधिकारी भी छान-बीन करते हुए डरेंगे; कि अब ईमानदारी एवं तत्परता से कोई क्यों कर कर्त्तव्य-पालन करना चाहेगा?

अभी भी वक्त है, आपसे अपील है कि एक स्वतंत्र जाँच-समिति बना दोनों पक्षों के तर्कों-दलीलों-साक्ष्यों की गहन जाँच-पड़ताल करवाइए और ग़लती हुई हो तो दोषी को सज़ा और निर्दोष को सम्मानित करने में कोई कसर न रखिए.

इससे आपको सस्ती लोकप्रियता भले न मिले, पर जनता में आपका मान बढ़ेगा, आप पर विश्वास बढ़ेगा, आपकी जीवन भर की पूँजी पल में नहीं छीजेगी. आप सचमुच एक न्यायप्रिय शासिका के रूप में याद की जाएँगीं.

वैसे भी प्रश्न जब राष्ट्रीय हित एवं सुरक्षा का हो तो व्यक्तिगत छवि-अछवि मायने नहीं रखता, न ही वोट-बैंक देखा जाता! क़ानून को अपना काम करने दीजिए, और सभ्य समाज में वही क़ानून काम करेगा जो सभी नागरिकों के लिए एक हो, जो जाति-पंथ-क्षेत्र-लिंग आदि के आधार पर भेद-भाव न करता हो!

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