विश्व योग दिवस पर विशेष : योगः कर्मसु कौशलम्

क्या है योग?

“योगः कर्मसु कौशलम्”

यह गीता जी के दूसरे अध्याय के पचासवें श्लोक से लिया गया है. इसका अर्थ है: कर्मों को कुशलता पूर्वक करना ही योग है. अर्थात् आप जो भी काम करते हैं (चोरी चकारी हो या दान पुण्य) यदि उसे पूरी निष्ठा से करते हैं… if you give your best… then it is योग…

अब प्रश्न है कि पूर्ण निष्ठा कैसे आवेगी? स्वामी श्री अखण्डानन्द जी महाराज ने बड़ी सुंदर बात कही है कि कर्म वही है जो अनुशासनपूर्वक किया जाये. बिना अनुशासन किया गया कर्म फलित नहीं होता.

अब सवाल ये है कि कर्मों में अनुशासन किस प्रकार आयेगा? अनुशासन के लिए आवश्यक है कि आप जब भी कोई काम करें तो उसे एकाग्र होकर करें. एकाग्रता concentration बहुत जरूरी है क्योंकि आपके कर्मों से ध्यान भटकाने हेतु दुनिया सदैव तत्पर रहती है.

एकाग्रता कैसे आएगी? एकाग्रता के लिए ज़रूरी है कि चित्त की वृत्तियों पर नियंत्रण हो. इसके लिए महर्षि पतंजलि ने सूत्र दिया: योगश्चित्तवृत्ति निरोधः.. अर्थात् योग चित्त (यानि मन) की वृत्तियाँ (यानि भटकाव) का निरोध (यानि कंट्रोल) करना है. मन को भटकने से रोकने का नाम योग है.

गीता जी में श्रीकृष्ण बार बार कहते हैं कि जो मुझे पूरे मनोयोग से पूजता है अर्थात् अपना मन मुझमें लगाता है उसके योग और क्षेम का भार मैं स्वयं वहन करता हूँ: (योगक्षेम वहाम्यहम्).

पूरा सार समझिये. जब व्यक्ति परमात्मा की आराधना में लीन होकर मन के भटकाव पर नियंत्रण पाकर एकाग्र होकर अपने कर्मों का कुशलतापूर्वक निष्पादन करता है तब उसे योग कहते हैं.

शास्त्रों में 6 प्रकार के दर्शन बताये गए हैं: न्याय, सांख्य, वैशेषिक, मीमांसा, वेदांत और योग. इस प्रकार योग दर्शनशास्त्र की एक शाखा भी है. श्रीकृष्ण को योगेश्वर और भगवान् शिव को योगीश्वर कहा गया है. शिव योगियों में श्रेष्ठ हैं और कृष्ण योग करने वालों में श्रेष्ठ हैं. यह कठिन विषय है इसकी व्याख्या कई प्रकार से हो सकती है. समझने की चेष्टा करें तो शिव योग की थ्योरी हैं और कृष्ण उसके प्रैक्टिकल. दोनों ही एक दूसरे के पूरक.

अब इसे सत्ता प्रतिष्ठान और नागरिक के मध्य सम्बन्धों के परिप्रेक्ष्य में समझिये. सत्ता प्रतिष्ठान शिव के रूप में सैद्धांतिक रूप से ऐसा इकोसिस्टम दे सकता है जहाँ जनता कृष्ण होकर एक योगी के रूप में देशहित में कर्म करे.

नरेन्द्र मोदी भी यही कर रहे हैं. उन्होंने योग को विश्वभर में आधिकारिक मान्यता दिलवा दी अब देश के लोगों को अपना शरीर और मन स्वस्थ रखते हुए देश की प्रगति में योगदान देना है.

देखिये यहाँ भी योग आ गया. सत्ता प्रतिष्ठान पर विश्वास रखते हुए कुशलतापूर्वक किये गए अपने कर्मों अथवा योग का दान कर देना ही परम नागरिक कर्तव्य है.

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