अस्सी घाट और अंतर्मन की पुकार…

माँ, तुम्हारी गोद की समीपता में जीवन की सारी तपन खो जाती है. जब भी तुम्हारे तट पर आता हूँ जीवन की निरंतरता का, जीवन की व्यापकता का, जीवन के सत्य का गहरा बोध होने लगता है. चरैवेति-चरैवेति की प्रत्यक्ष अनुभूति होने लगती है. मन में एक हूक-सी उठती है, भारत की सदियों पुरानी संस्कृति, सदियों पुरानी वेदना आँखों के सामने साकार होने लगती है.

हे चिर पुरातन, हे चिर नवीन! अपने करोड़ों पुत्रों को जीवन देती हुई तुम न जाने कब से प्रवहमान हो! माँ, तुम्हारी संततियों ने भले ही कभी तुम्हारा ध्यान नहीं रखा, पर तुमने तो सदैव उसके सुख-दुःख का ध्यान रखा, न केवल उसके जीते-जी बल्कि उस अंतिम वेला में भी जबकि सारा संसार उसे विदा दे रहा होता है, तुम उसे अपनी गोद में जगह दे रही होती हो.

माँ, तुमने ही भारत की सांस्कृतिक धारा को अक्षुण्ण बनाए रखा है. जब भी तुम्हारे पुरुषार्थी पुत्रों ने प्रयास किया, तुमने उसे निराश नहीं किया, उसके पसीने की एक-एक बूँद को तुमने सोना बनाकर वापस किया.

माँ, तुम्हारे स्पर्श मात्र में ऐसा ज़ादू है कि छूते ही मन का पाप-ताप कटने-छँटने लगता है. माँ, कहाँ-से लाती हो इतना धैर्य, इतनी सहनशीलता, इतनी करुणा, इतनी ममता; अपने इन महानतम मूल्यों का शतांश भी हमें दे दो तो हमारा केवल इहलोक ही नहीं परलोक भी सध जाए.

माँ, मुझे विश्वास है कि जब तक तुम प्रवाहित हो, भारत के गाँवों-कस्बों, कूलों-कछारों में, भारत की शिराओं में जीवन-रस प्रवाहित रहेगा. माँ, तुम सही मायने में भारत की जीवन-रेखा हो. माँ, दुआ करूँगा कि एक दिन तुम्हारे बच्चे भी तुम्हारी सुध लें, जैसे तुम उनका लालन-पालन करती हो, ख़्याल रखती हो, वे भी तुम्हारा ख़्याल रखें.

माँ, अमूर्त्त भावों को शब्द दे पाना हम जैसे सहज बुद्धि बालक के लिए संभव नहीं, बस इतना जानो कि मैं जब भी तुम्हारे तट पर आया, अभिभूत हो बस तुम्हें ही निहारता रहा. माँ, तुम न जाने कितने युगों, कितने जन्मों से धरती और मानव-जीवन की आस और साध पूरी करती आयी हो!

माँ, तुम्हारे जल से ही धरती का तृण-तृण मुस्काता है, यह शस्य-श्यामला धरती तुमसे ही तो जीवन पाती है, संपूर्ण भारत नहीं तो कम-से-कम उत्तर भारत का कोना-कोना तुमसे ही तो आबाद है, सुख-समृद्धि, धन-धान्य सब तुमसे ही तो है, तुम्हारे संस्पर्श मात्र से पतित भी पावन हो उठता है, तुमने ही हमारी सुसुप्त संवेदनाओं को स्वर दिया है, सामूहिक चेतना को बल दिया है!

माँ, तमाम आक्रांताओं के भयावह अत्याचार के बावजूद तुमने भारत की सांस्कृतिक-धारा को सूखने नहीं दिया, न जाने कितने जन्मों से तुम हमारी अकर्मण्यता और भीरुता के भार ढो रही हो!

माँ, हमारे कुकर्मों का पाप धोते-धोते तुमने अपने अस्तित्व तक को दाँव पर लगा दिया!कोटि-कोटि संतानों की जीवनदायिनी माँ, तुम्हारा यह पुत्र तुम्हारी इस दशा के लिए भी और भारत की संततियों की आत्म-विस्मृति के लिए भी बहुत शर्मिंदा है. हो सके तो अपने नकारे पुत्रों को क्षमा करना माते!

माँ, तुम तो वरदायिनी, मुक्तिदायिनी, बलदायिनी हो! एक आशीर्वाद दो माते! भारत की सामूहिक चेतना को एक बार फिर स्वर दो, इसे जाग्रत कर दो! सदियों की पराधीनता ने इसे सांस्कृतिक शून्यता से भर दिया है. यह केवल तन से आज़ाद हुआ है, मन से आज भी इसके पोर-पोर में गुलामी की ग्रन्थियाँ गहरे पैठी हैं.

भारत के सांस्कृतिक सूर्य को डूबने से बचा लो माँ! सभ्यता के जिस सूरज को तुमने परवान चढ़ते देखा, दिग-दिगन्तर को प्रकाशित करते देखा, उसका ही अस्त कैसे देख और सह सकोगी, माँ!

माँ, इसे एक बार फिर गौरवशाली, संकल्पधर्मी, संस्कृतिनिष्ठ राष्ट्र बना दो! एक बार फिर इस आलोकधर्मी संस्कृति को चमकने के लिए विस्तृत-वैश्विक आकाश दो!

शताब्दियों बाद तुम्हारा एक पुत्र संपूर्ण ईमानदारी, समर्पण और आस्था से इसके खोए गौरव को वापस लाने की भरपूर कोशिश कर रहा है, उसे बल दो, विश्वास दो, तमाम झंझावातों के बीच दृढ़ रहकर कार्य करने की शक्ति दो!

माँ, तुम्हारी पुकार पर ही तो वह दौड़ा चला आया था. माँ, तुम तो जानती हो, कोटि-कोटि जनों की आँखों में दशकों से पल रहे सपनों का भार उसने अकेले अपने कंधों पर लाद रखा है, बिना थके, बिना रुके, बिना झुके वह आगे ही आगे बढ़ता जा रहा है, परायों के अनाप-शनाप हमलों को सहर्ष झेलने वाला उसका विशाल-उदार मन आज अपनों के उलीचे गरल को भी नीलकंठ बन धारण कर रहा है; उसे शक्ति दो माते कि वह टूटे नहीं, बिखरे नहीं, सब प्रकार के व्यूहों-षड्यंत्रों के बीच भी दृढ़ता से खड़ा रहे, डटा रहे, अमृत-पुत्र बन जग का कल्याण करता रहे.

माते, मेरा विश्वास कहता है कि जब तक तुम प्रवाहित हो, भारत की धमनियों में राष्ट्रवाद और संस्कृति की रसधारा भी प्रवाहित रहेगी, तुम्हारे अस्तित्व में ही हमारा सामूहिक जीवन है, बल है, संकल्प है, आगत है, अनागत है, भूत-भविष्य-वर्तमान है.

माँ, राम-कृष्ण-बुद्ध-महावीर-नानक-कबीर-सूर-तुलसी की इस धरती को पहले ही आक्रांताओं ने बहुत रौंदा, बहुत लूटा, बहुत कलंकित किया, अब और अत्याचार यह भारत-भूमि नहीं सह सकेगा.

तुम तो वीर-प्रसूता हो, रत्नगर्भा हो, संकल्पधर्मा हो, कुछ ऐसा चमत्कार करो कि भीरुता त्याग तुम्हारे पुत्र वीरता का वरण करे! कुछ ऐसा करो कि एक बार फिर हमारा सामूहिक बल अंगड़ाई ले उठ खड़ा हो, कुछ ऐसा करो कि जातियों-संप्रदायों में खंड-खंड बंटा हमारा समाज दिव्य राष्ट्रीय चेतना से मुखरित-झंकृत हो उठे! कुछ ऐसा करो कि भारत का सांस्कृतिक सूर्य फिर से चमके और ऐसा चमके कि सहमी-भटकी मानव-जाति पर फैलता-पसरता अँधेरा छँटे; कुछ ऐसा चमके कि विश्व-मानवता का पथ प्रशस्त हो!

अच्छा विदा दो माते और आशीर्वाद दो कि चाहे कहीं भी रहूँ, अपनी आख़िरी साँस तुम्हारी गोद में ही लूँ! बहुत सुकून है, तुम्हारी गोद में माँ! पर पराए राग-रंग में डूबे लोग शायद ही उसे महसूस कर सके!

जीवन ने यदि अवसर दिया तो पुनः तुम्हारे तट पर दौड़ा आऊँगा, इस आस में भी कि व्यक्ति की मुक्ति भले ही अकेले संभव हो, पर समष्टि की मुक्ति तो सामूहिक ही होती है और भारत की समष्टिगत चेतना का जीवंत-जाग्रत स्वरूप तो तुम्हीं हो माते, केवल तुम्हीं. . . . . . . !!!

जय माँ गंगे!जय माँ भारती !

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