किसी आदेश के कारण ‘हाथ बंधे’ होने से कितने सुरक्षाकर्मी मारे गए, कोई बताएगा ज़रा!

अब एक पोस्ट घूम रही है कि कश्मीर में भाजपा-पीडीपी सरकार के तीन साल के कार्यकाल में 600+ सैनिक मारे गए.

चलिये इस बात का ज़रा पोस्ट मॉर्टेम ही करते हैं.

पहली बात तो यह है कि इस आरोप की कहीं भी तथ्यों के साथ पुष्टि नहीं की गयी.

दूसरी बात है कि यह आरोप क्या कहना चाहता है? क्या यह केवल सैनिकों की मौतों की खबर दे रहा है?

मेरा कहना है : नहीं, यह आरोप एक अत्यंत गिरी हुई हरकत है और जिसने भी लगाया हो वो सबूतों के साथ मिले तो उस पर देशद्रोह का केस होना चाहिए.

यह वाक्य पूरी ज़िम्मेदारी के साथ कह रहा हूँ और इसके पुष्टि के लिए तर्क भी दे रहा हूँ. हवाई बात नहीं.

पहली बात, यह आरोप का ध्वनित अर्थ यह होता है कि भाजपा और पीडीपी सरकार ने भारतीय सेना के सैनिकों को लड़ने से मना कर दिया इसलिए वे पत्थरबाज़ों के हाथो मारे जा सके.

क्या यही अर्थ नहीं हो रहा इस घिनौने आरोप का? चलिये, इसका तफसील से खंडन करते हैं.

दूसरी बात, लोग यह नहीं समझते कि जो मारे गए वे कौन थे, वे कहाँ और किस तरह से मारे गए?

आप को यह समझना होगा कि सीमा पर पहरा देता सैनिक कभी भी सामने से अचानक आई गोली का शिकार हो सकता है. अंधेरे में भी इन्फ्रा रेड स्कोप से मूवमेंट दिखती है.

उसके साथी उसका बदला लेते ही है लेकिन पाकिस्तान इसके बारे में नहीं बोलता कि हमने उनके कितने मारे. सीमा पर हमारे सैनिकों के हाथ कभी भी बंधे नहीं होते क्रॉस बॉर्डर फायरिंग का जवाब देने को.

फिर अचानक हुई शेलिंग में भी मारे जा सकते हैं, जिसका कोई इलाज नहीं. ये खतरा इस सेवा में होता ही है. वैसे जवाबी

शेलिंग अपनी भी जोरदार होती है, जिससे पाकिस्तान की भी हानि होती ही है.

तीसरी बात, CICT Ops (Counter Intelligence Counter Terrorism Operations) में जहां सशस्त्र आतंकियों की खबर मिलती है और सेना को बुलाया जाता है वहाँ भी दोनों तरफ से गोलाबारी होती ही है. कभी ठीक से यह आइडिया न होने से कि कहाँ कौन छुपा है, घेरती सेना का कोई सैनिक मारा जा सकता है. वो कोई चारा नहीं बनाया जाता, लेकिन यह चीजें हो सकती हैं, आखिर शत्रु भी मूर्ख नहीं होता.

चौथी बात ambush की हो सकती है. रास्ते में घात. यह भी occupational hazard ही है.

पाँचवी बात एक्सीडेंट की है. वहाँ की भौगोलिक स्थिति कैसी है यह तो सभी को पता है. अधिक क्या कहें.

लेकिन इनमें कहीं भी उनके हाथ हुक्म से बांधने की बात नहीं आती. और पत्थरबाज़ों के हाथों निरीह मौत तो हरगिज़ नहीं.

मेजर गोगोई को भी गोली चलाने से रोक नहीं थी, उन्होंने दिमाग का अधिक बेहतर इस्तेमाल किया. अगर कश्मीरी अपने साथी को पत्थरों से मारते तो गोगोई अपने लोगों के साथ फायरिंग अवश्य करते, इसमें कोई शक नहीं.

अस्तु, कश्मीर में पत्थरबाज़ों के हाथों अन्य सुरक्षा दलों के कितने सुरक्षाकर्मी हुक्म से हाथ बंधे होने के कारण जान से मारे गए ज़रा कोई बताएगा डिटेल्स के साथ?

और हाँ, पाकिस्तान जैसा खुराफाती पड़ोसी हो तो सीमा पर तीन सालों की अवधि में याने लगभग 1100 दिनों में 600 की वीरगति बहुत अधिक नहीं.

पुनश्च : अभी एक मित्र ने यह जानकारी दी है – South Asian terrorism portal पर पिछले बीस सालों का डाटा मौजूद है… पूरे देश में भारतीय सेना की पिछले तीन सालों की कैज़ुअल्टीज़ का आंकड़ा बामुश्किल 222 है. 600 वाली बात निरा झूठ है.

इस पोर्टल का लिंक है – http://www.satp.org/satporgtp/countries/india/database/indiafatalities.htm 

कृपया 2010-2013 का भी डाटा चैक कीजिए उपर दिये लिंक पर… आप पायेंगे कि पहले जवानों की कैज़ुअल्टीज़ ज्यादा थी, जबकि वर्तमान सरकार के समय में कैज़ुअल्टीज़ मे कमी आई है.

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