सेक्युलर : आठ सौ साल की गुलामी से पैदा हुई नस्ल

मनुष्य में सदैव से एक महामानव और सबसे अधिक ताकतवर प्राणी बनने का स्वप्न पलता रहा है. और ये कोई अभी आधुनिक मशीनों के उद्गम से नहीं हुआ कि हाथ में मशीनगन लिए कमज़ोरों पर गोलियां चलाकर या मिस्टर इण्डिया की तरह एक गैजेट बनाकर गायब हो जाने की प्रवृत्ति जागी हो…

ये सपना भी सनातन काल से चला आ रहा है… ऋषि मुनि, तांत्रिक और ऐसे बहुत से लोग कुछ दैवीय शक्तियों को प्राप्त करने का दावा भी कर चुके हैं… राम, कृष्ण जैसे मानवों का ईश्वरीय सत्ता द्वारा देवों के रूप में अवतरित करना और कंस और रावण जैसे विध्वंसक आसुरी अतिमानव शक्तियों का उनके हाथ से विनाश होना इस बात का प्रमाण है….

चाहे वास्तविक हो या काल्पनिक हर कहानी के अंत में हम दैवीय शक्तियों की विजय और आसुरी शक्तियों की पराजय होते बताते हैं…

दैवीय शक्तियां आज भी आपको मानव से एक स्तर ऊपर ले जाकर महामानव होने का सौभाग्य देती हैं.. लेकिन आपका अस्तित्व पूरी तरह से इस बात पर निर्भर करता है कि आपने उस शक्ति का उपयोग किस तरह से किया…

बहुत पहले एक अंग्रेज़ी फिल्म देखी थी THE FLY. उस फिल्म की कहानी कुछ यूं थी कि एक महान वैज्ञानिक सुपर पॉवर पाने यानी वही महामानव सी शक्ति पाने के लिए एक मशीन तैयार करता है…

सबसे पहले वह एक बन्दर के साथ उस मशीन का प्रयोग करता है और एक साधारण बन्दर को शक्तिशाली बन्दर में बदलने में सफल हो जाता है. फिर वह महामानव बनने के सपने के साथ खुद उस मशीन में जाकर बैठ जाता है. प्रयोग पूरा होने के बाद वो खुद में अद्भुत परिवर्तन पाता है… उसे लगता है वो एक साधारण-सामान्य मनुष्य से शक्तिशाली महामानव में तब्दील हो चुका है…

लेकिन … लेकिन … लेकिन… जो हम सोचते हैं वैसा कहाँ हो पाता है.. हमारी योजना कुछ और होती है और अस्तित्व कुछ और ही योजना बना रहा होता है… तो ऐसे में उस प्रयोग के दौरान उसे पता नहीं चलता कि मशीन में उसके साथ एक मक्खी भी घुस गयी थी…

फिर क्या था… एक ऐसी मशीन जिसमें एक मनुष्य के जींस में कुछ ऐसे परिवर्तन होने वाले हैं जिससे वह एक महामानव बन जाए, उसमें एक मक्खी भी घुस जाए तो एक मनुष्य के जींस के साथ एक मक्खी के जींस भी उसमें सम्मिलत हो जाते हैं… और उसके बाद उसके गुणसूत्रों में ऐसे परिवर्तन आते हैं कि मनुष्य की असाधारण शक्तियों के साथ मक्खी की असाधारण शक्तियां मिलकर एक अजीब सा मानव तैयार होता है… जिससे उसके शरीर में मक्खियों से लक्षण प्रकट होने लगते हैं… और वैसा ही उसका स्वभाव होने लगता है…

ऐसे में वो अपनी प्रेमिका के साथ सम्भोग करता है और उसकी प्रेमिका गर्भवती हो जाती है… अब एक महामक्खी के गुणों वाले महामानव का एक साधारण स्त्री के साथ सम्भोग से जो बच्चा पैदा होता है सोचिये वो कैसा होगा…

तो बस… उस औरत के गर्भ से एक अजीब सा जंतु पैदा होता है जो लिजलिजा और घृणित ही नहीं विध्वंसक भी है… जो जन्म लेते-लेते ही अपनी माँ को मारने पर उतारू हो जाता है… ऐसे अजीब प्रयोग के विध्वंसक परिणाम का जो अंत होना होता है वही होता है…

आपको क्या लगता है इतनी लम्बी कहानी आपको THE FLY फिल्म की समीक्षा पढ़ाने या फिल्म देखने के लिए प्रेरित करने के लिए लिखी है… नहीं…

ये कहानी मेरे दिमाग में तब उपजी जब कल रात स्वामी ध्यान विनय के साथ यह संवाद हुआ…

‘ये तो मानना पड़ेगा कि उर्दू ज़बान में जो बात है वो और किसी भाषा में नहीं.’

‘ग़लत… हिंदी से अपरिचित व्यक्ति ही ये बात कह सकता है.’

प्रतिवाद में एक शे’र सुनाया गया और उसका हिन्दी अनुवाद करने की कोशिश.

‘आपका ये प्रयास निरर्थक है, श्रृंगार रस के कवियों को पढ़िए… भ्रम दूर हो जाएंगे.’

‘पर वो तो अत्यंत क्लिष्ट भाषा में हैं, अधिकतर शब्द अपरिचित हैं.’

‘तो ये उर्दू क्या आपकी मातृभाषा है? ये भी तो आपने अपनी रूचि से ही सीखी… ये और कुछ नहीं आपके जीन्ज़ में बस गई ग़ुलामी है…’

‘ग़ुलामी?… कैसे?’

‘लगभग 800 साल के मुसलमानी राज में कम से कम चार-पांच बार तो आपका जन्म हुआ ही होगा… तब जो बातें-गुण (दुर्गुण)-संस्कार आपने अपनाए, वही प्रकट हो रहे हैं… उर्दू मुझे भी पसंद है, पर हिन्दी को उससे हीन बताकर नहीं.’

पुनश्च : जो इस विमर्श में कहने से रह गया था वो ये कि मनुष्य के स्वभाव पर बहुत कुछ निर्भर करता है… एक ग़ुलाम, अपनी ग़ुलामी को इस तरह स्वीकार कर लेता है कि उसे अपना मालिक ही अपना सर्वस्व प्रतीत होता है. वो इसे अपनी नियति ही नहीं वरन नव-जीवन, नई जीवन शैली मान अपनाकर उसी रंग में रंग जाता है.

वहीं भिन्न स्वभाव का एक अन्य ग़ुलाम, अपने को संजो कर रखता है और ग़ुलामी से स्वतंत्र होने के प्रयास करता है. ऐसा होने पर वह विवशतावश ओढ़े गए व्यवहार को त्याग अपने मूल स्वरुप में लौट आता है.

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आठ सौ साल की गुलामी…. कितना छोटा सा शब्द लगता है ना ये ‘आठ सौ साल’ उन सनातनियों के लिए जो हज़ारों साल पहले की अपनी उत्पत्ति के प्रमाण देते फिरते हैं.

‘आठ सौ साल’… वो काल जब मुग़ल आक्रान्ताओं ने न जाने कितनी हिन्दू नारियों का बलात्कार किया होगा… न जाने कितनी ही संतानें ऐसी पैदा हुई होंगी जिनकी माताएं हिन्दू थी पिता मुस्लिम…

‘आठ सौ साल’… कर्म चक्रों के परिणाम स्वरूप न जाने कितनी ही आत्माओं ने मुस्लिम परिवार में जन्म लिया होगा… इन आठ सौ साल में कम से कम चार बार तो जन्म हुआ ही होगा…

और ये बातें कोई काल्पनिक नहीं, अपने ही अनुभव से कहती आई हूँ कि इस्लाम के प्रति मेरे खुद के हृदय में जो बीज छुपा है वो जब तब अंकुरित होने को कुलबुलाता है… कुछ पिछले जन्म की स्वप्न झलकियाँ भी इसमें खाद पानी का काम करती हैं…

लेकिन मेरे वास्तविक जन्म की मिट्टी ने मुझे इस तरह से जड़ों से पकड़ रखा है कि ऐसे समय में मेरा सनातन धर्म, हिन्दू जीवन शैली का प्रबल सूर्य मुझे थामे हुए रखता है और मुझे जड़ों से उखड़ने नहीं देता…

लेकिन यहाँ कुछ ऐसे भी लोग हैं जिनकी जड़ें सेक्युलेरिज्म का दीमक खा गयी हैं… ये उस असफल प्रयोग की नस्लें हैं जो सर्वधर्म समभाव का अर्थ न समझ पाए कि धर्म तो एक ही है…. पंथ समुदाय जीवन शैली अलग हैं… खुद को महामानव समझने के भ्रम के साथ अपनी शक्तियों का अनुचित प्रयोग कर रहे हैं…

बहुत विकृत हो जाएगी ये भाषा फिर भी कहूंगी कि इनसे उपजी संतानें अपनी ही भारत माँ को मारने पर उतारू हैं… ये ऐसी विध्वंसक शक्ति हो गयी है जो अपने अस्तित्व को अपने ही हाथों से मिटाने पर तुली है….

जैसे ऊपर कहा कि हमारी योजना तो कुछ और होती है लेकिन अस्तित्व की योजना के आगे हम मानव तो क्या महामानव भी उसके हाथ की कठपुतली हैं..

और अंत में … सेक्युलर नाम की इस नस्ल को पैदा करने में जैसे आठ सौ साल की गुलामी की भूमिका रही है… वैसे ही इस नस्ल को ख़त्म करने के लिए ये जो हिंदुत्व की लहर प्रभंजन बनकर उभर रही है… ये उस अस्तित्व की योजना के तहत ही है… तो धैर्य रखिये जिसे पैदा करने में आठ सौ साल लगे, उसे ख़त्म करने में भी तो उतना ही समय लगेगा…

शुरुआत तो मई 2014 में हो ही गयी है… दूसरा कदम पूरे पांच साल बाद 2019 में उठाना है… तो आइये हम सब मिलकर इस कदम को इतनी धमक के साथ उठाये कि ये आठ सौ साल पुरानी गुलामी के बीज ज़मीन से उखड़ जाए….

अंग्रेज़ी फिल्म पर आधारित एक कहानी यह भी पढ़ें –

अभी इनको समझने में सालों लगेंगे आपको, बदलते नियमों में नहीं बदलती हवा में लगाइए अपना दिमाग

रे फकीरा मान जा….

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