सैनिकों की मौतें – प्रचार का अस्त्र

जब से मोदी सरकार आई है, सीमा पर और कश्मीर में होनेवाली सैनिकों की मौतों की खबरें काफी हाइलाइट हो रही हैं.

कहने को तो उनके लिए अच्छा मीडिया कवरेज मिल रहा है, सोशल मीडिया में भी भावभीनी श्रद्धांजलियाँ दी जा रही हैं.

लेकिन इसके साथ-साथ ही इन्हीं मौतों को ले कर सतह के ज़रा सा नीचे एक कथानक बुना जा रहा था जिसे अब टाइमिंग के हिसाब से सामने लाया जा रहा है.

क्या है वह कथानक?

वही पुराना, सरकार के विरुद्ध जनाक्रोश बनाने का. कैसी भी खबर हो, वामीडिया उसे सरकार के विरोध में नेरेटिव बनाने के लिए आसानी से इस्तेमाल कर सकता है. अमेरिका के सभी युद्धों के लिए इसी तरह सरकार विरोधी वातावरण बनाया था.

अपने यहाँ सरकारों से देश भी नहीं संभाला जाता था तो सुपर पावर बनकर वैश्विक डॉमिनेशन की बात ही समझे कौन?

लेकिन पश्चिम के देशों में ऐसा नहीं रहा. वे हमेशा सुपर पावर बनने की कोशिश करते रहे हैं. वही करते करते जर्मनी, जापान और इटली चौबे से दुबे भी नहीं रहे.

ब्रिटेन और फ्रांस की भी शक्ति खत्म हुई दूसरे विश्वयुद्ध में तो अमेरिका ने मोर्चा थामा. लेकिन शीघ्र ही रशिया और उसके बाद चाइना आ गए.

बहुत सारे देशों में जो युद्ध हुए उनमें अमेरिकन सेनाएँ वहाँ के लोकल सेना के अतिरिक्त रशियन या चाइनिज सेनाओं से भी आमने सामने लड़ी.

वहाँ हर जगह अमेरिकन जनता के द्वारा इन युद्धों का विरोध हो इसलिए वहाँ के वाम विचारधारा के मीडिया ने एक नेरेटिव बनाया.

हालांकि दूसरे विश्व युद्ध में लाखों अमेरिकन मारे गए, अमेरिका ने कुछ नहीं कहा था क्योंकि पर्ल हार्बर पर हमला होने से वह विश्वयुद्ध अमेरिकन्स का अपना युद्ध हो गया – no questions asked.

अब उसके लिए कितनी भी आहुतियाँ देनी पड़े, कोई परवाह नहीं, शत्रु के घर में घुसकर ही उसे खत्म करना था, और उसमें सामान्य अमेरिकन पूरी तरह से सेना और देश के नेतृत्व के साथ था.

लेकिन विश्व युद्ध खत्म होने के बाद कम्युनिस्ट सोवियत यूनियन ने अमेरिका के प्लान्स में अड़ंगे लगाना शुरू किए.

बेज़्मेनोव के इंटरव्यू में आप ने अगर देखा होगा, मीडिया और शिक्षा में इस कदर वामी हावी हो गए कि वहाँ भी गुरमेहर जैसी लड़कियां आम हुई – पिता- भाई -पति-पुत्र को युद्ध ने मारा कहने वाली.

एक दूसरा ट्रेंड चला कि (हमें) अमेरिका को क्या पड़ी है दूसरे देशों के फटे में टांग अड़ाने की, वो देश हम पर आक्रमण थोड़े ही कर सकते हैं?

इसके साथ साथ एक यह भी बात ट्रेंड हुई – जिसमें सत्य भी था – कि इन युद्धों का फायदा तो बड़े उद्योगों को होता है जो राष्ट्र के पैसे और जनता के प्राण खर्च कर दूसरे देशों में अपने निवेश संभालते हैं.

ग्लोबल सुपरपावर होने का अमेरिकनों को गर्व तो होता है. लेकिन आम अमेरिकन इसकी गतिविधियों से अनभिज्ञ है. ग्लोबल सुपरपावर बने रहने के लाभ लेने के लिए यह कीमत भी चुकानी पड़ती है यह बात आम अमेरिकन स्त्री पुरुष के समझ में आने से रही.

वो केवल इतना समझते हैं कि इसमें हमारे लोग मर रहे हैं. मीडिया तथा अमेरिकन, वामियों के बहकावे में आ कर आक्रोशित होते हैं कि हम सेना में हमारे बेटों को भेजते हैं अपने देश की सीमाओं की रक्षा करने के लिए. देश पर हमला हो और उससे लड़ते हमारे बेटे काम आए, उफ़्फ़ तक नहीं करेंगे, और बेटे हैं तो उन्हें भी भेजेंगे. लेकिन ये दूसरे देशों में ले जा कर हमारे बेटों को क्यों खर्च कर रहे हो?

किसी को यह समझ में नहीं आता कि वहाँ उनके बेटों से लड़ने रशियन या चाइनीज़ वहाँ कैसे और क्यों आते हैं? कोई यह समझना नहीं चाहता कि चूंकि वे रशियन या चाइनीज़ वहाँ हैं इसीलिए अमेरिकन सेना भी वहाँ है ताकि रशिया या चाइना उस देश पर कब्जा न करे.

आजकल रशिया, चाइना के साथ ISIS या समय समय पर और कोई मुस्लिम नाम भी आते रहता है. यह सभी ग्लोबल सुपरपावर बने रहने की कीमत है.

क्या आप ने कभी ये सोचा भी है कि ढेर सारे जासूसी उपन्यास, फिल्में, युद्ध कथाएँ, वॉर फिल्म्स तथा एंटी वॉर कथाएँ, फिल्में, सामाजिक असंतुलन, असमानता आदि पर ढेर सारे उपन्यास, फिल्में ये जनता का मूड अपनी तरफ रखने की कोशिशें हैं?

यहाँ भी ढेर सारे पुरस्कार आदि जिसका पलड़ा भारी हो उसके अनुरूप मूड बनाने की कवायद होते हैं ताकि जनता बढ़ चढ़ कर देखे और उसका उस तरह का मूड बने.

वैसे हॉलीवुड फिल्मों के शौकीन एक बात तो दावे से कहेंगे कि वहाँ जिसको भी पुरस्कार मिलता है वो कोई भी कलाकार दूसरों से कम नहीं होता. एक के फैन किसी दूसरे को अपने फेवरिट से कम नहीं समझेंगे, पसंद नहीं करें तो क्या हुआ. यहाँ चाहे तो थोड़ा रुक कर यह परिच्छेद दुबारा पढ़ें, बात को डायजेस्ट करें.

अब तक आप को लगता है कि मैं मूल मुद्दे से भटक गया हूँ – अपने सैनिकों की मौतें, सरकार विरोधी प्रचार का अस्त्र कैसे हैं… तो नहीं, यह सारा बैकग्राउंड संक्षेप में समझाना जरूरी था. ताकि अगर किसी वामी से भिड़ जाएँ तो आप को पता हो उनकी सोच का.

अमेरिका में सेना में भर्ती होना एक जमाने में कंपलसरी था. उसे ड्राफ्ट कहते थे. तब जिन लोगों ने बहाने बनाकर सेना में सेवा टाल दी उनको वहाँ ड्राफ्ट डॉजर्स कहते हैं. या फिर जिन बड़े बापों के बेटों ने विएतनाम, कोरिया जैसे युद्ध से बचकर अमेरिका में ही कहीं सेफ खानापूर्ति कर ली, उन्हें चिकनहॉक कहा जाता था. खास कर उनको जिन्होंने इराक से युद्ध का निर्णय लिया था. उस सरकार में काफी लोग इस कैटेगरी में आते थे.

अपने यहाँ सेना में भर्ती होने के बारे में क्या स्थिति है आप को शायद पता ही होगा. उसके ऊपर जनता को सेना से विमुख करनेवाले विडियो भी काफी आए. उनके निर्माता और स्पॉन्सर कौन थे यह भी आ गया था.

फिर भी जनता में सेना के प्रति आदर बना रहा है यह देश के लिए अच्छी बात है. अब मौतों की बात करें तो पाकिस्तान और कश्मीर में सेना या सुरक्षा दलों के जो जवान या अफसर मारे जा रहे हैं वो आज या मोदी सरकार में ही मारे जा रहे हैं ऐसी बात नहीं. सेना या सरकार से अधिकृत आंकड़े मिले तो देखिएगा. लेकिन पहले मीडिया कवरेज द्वारा आक्रोश पैदा नहीं करवाया जाता था.

वैसे आप ने देखा होगा, पहले कश्मीरियों को मासूम बताकर सेना द्वारा कुटाई के फोटो लगाए जाते थे. उसमें से कई फर्जी भी साबित हुए. फिर जैसे जैसे बातें बाहर आने लगी तो आतंक का सड़ियल हरा चेहरा दिखाई देने लगा.

सेना के साथ क्या हो रहा है, हमारे परिजन सुरक्षा कर्मियों के साथ क्या हो रहा है यह जनता ने कई विडियो में देख लिया तो इनके प्रचार के मोहरे पिट गए. यह भी एक साइलेंट वॉर था जो देश ने, जनता के उतावलेपन के बावजूद जीता. उसपर विस्तार में फिर कभी.

इनकी असलियत आप को समझ में आए तो जानिए कि गिरोह दो तरफ से सक्रिय है. आतंकी मारे तो उनको मासूम बताकर छाती पीटने वाला एक सेक्शन. और सेना – सुरक्षा बलों के जवान मरे तो उसको सरकार की नाकामी बतानेवाला दूसरा सेक्शन.

ये दूसरे वाला सेक्शन बीच बीच में हुतात्माओं को उनकी ‘जाति के कारण पूरा सम्मान नहीं मिलता’ टाइप की कहानियाँ भी फैलाता रहता है. पहले सेक्शन की जनता में शिनाख्त हो चुकी, वो केवल इंटरनेशनल लेवल पर रेकॉर्ड बनाने का अपना काम करते रहता है, भारतीय जनता से अब कट चुका है.

दूसरे सेक्शन की शिनाख्त होनी मुश्किल है इतनी सफलता से वे हमारे बीच घुल गए हैं. आप सेना और सरकार के साथ डटे रहेंगे तो इनको तकलीफ होनी लगेगी. खास कर अगर आप इनकी बातों का तर्कपूर्ण विरोध करेंगे और लोग आप को सुनते होंगे. तब ये कर्कश हो सकते हैं, जो पहचान का एक लक्षण है. बाकी लक्षण जैसे जैसे समझ आएंगे, लिखते जाएंगे.

और ये दोनों सेक्शन, मारने वालों के धर्म की बात नहीं करते. कश्मीर में आतंकियों के कमांडर कितने भी खुलकर कहें कि हम आज़ादी के लिए नहीं, इस्लाम की सत्ता लाने के लिए लड़ रहे हैं – ये उस बात का कहीं उल्लेख न करेंगे, न करने देंगे.

वैसे क्राइम और इस्लाम का चोली दामन का साथ है लोकतन्त्र में. और दोनों, सुरक्षा दलों को आज़ादी देने से कंट्रोल में रखे जा सकते हैं, लोकतन्त्र के चलते इनका निर्मूलन संभव नहीं. हाँ, इस्लामी हुकूमत आए तो आप के निर्मूलन के लिए उन्हें कोई समस्या नहीं होगी लेकिन यह बात भी ये गिरोही नहीं करेंगे. वो पंद्रह मिनट की बात कभी ‘जाति कुमार’ के श्रीमुख से या उस गिरोह के किसी सदस्य से कभी सुनी देखी भी है?

इसलिए चिल मारिए और इनको चिल्लाते रहने दीजिये. सेना और सुरक्षा बलों को अपना काम करने दीजिये. वैसे भी अब मात्र कड़ी निंदा के दिन खत्म हुए हैं तो सूरह 9 आया 5 पढ़कर कश्मीरी तलाक हुआ ही है, इनशाल्लाह सूरह 17 आया 81 भी पढ़ी जाएगी अपनी तरफ से.

बाकी अल्लाह सब जानता है!

Comments

comments

loading...

LEAVE A REPLY