यत पिंडे तत ब्रह्माण्डे

समस्त शरीर में फैले हुए स्वसंचालित नाड़ीमंडल ऑटोनामस सिस्टम एवं ऐच्छिक नाड़ीमंडल वालेंटरी मोटर नर्व्स दोनो पर मस्तिष्कीय नाड़ीमंडल सेन्सरी नर्व्स का नियंत्रण है.

यों ये दोनों धाराएँ अलग है, किन्तु नाड़ी गुच्छकों (प्लेक्सस) के माध्यम से एकदूसरे के साथ पूरी तरह गुँथी हुई हैं. अस्तु एकदूसरे पर अपनी क्रिया की प्रतिक्रिया छोड़ती हैं.

हमारा केंद्रीय नाड़ीमंडल मस्तिष्क और मेरूदंड को मिलाकर बना है. इन दोनों को जोड़ने वाला एक वाल्व है, जिसे मेडुला ऑब्लांगेटा कहते हैं. इस संस्थान का श्वास प्रश्वास की स्व-संचालित प्रक्रिया से सीधा संबंध और नियंत्रण है.

मेरूदंड के भीतर पाई जाने वाली भूरी और सफेद मज्जा (ग्रे एंड वाइट मैटर) में भी वही तत्व पाए जाते है, जो मस्तिष्क में है. इस पदार्थ का अस्थि-संबंध ठीक वैसा ही है, जैसा मस्तिष्क के क्रेनियल कैविटी में, मस्तिष्क और मेरूदंड दोनो में ही सेरेब्रो स्पाइनल द्रव्य पदार्थ तैरते रहते है. मेरूदंड के पोले भाग ‘केनालिस सेंट्रेलिस’ में होकर ब्रह्मनाड़ी मूलाधार से लेकर सहस्त्रार तक पहुँचती है.

शरीरगत महत्वपूर्ण गतिविधियाँ मेरूदंड से निकल कर सर्वत्र फैलने वाले स्नायुमण्डल से संचालित होती है. उनके संचालक सूत्र सुषुम्ना में अवस्थित है, मस्तिष्क में नहीं, मेरूदंड अवस्थित ऑटोमैटिक नर्वस सिस्टम स्वतः स्वसंचालित स्नायुमण्डल यद्यपि मस्तिष्क के साथ भी जुड़ा हुआ है, पर उसकी गतिविधियाँ स्वसंचालित है.

इसलिए प्रकारांतर से मेरूदंड को भी मस्तिष्क मानना पड़ता है और उसे मेरु धुरी, स्ट्रेब्रो स्पाइनल एक्सिस कहकर समाधान करना होता है.

इस श्रृंखला का वाम पार्श्व इड़ा, दाहिना पार्श्व पिंगला और मध्यवर्ती समन्वित भाग सुषुम्ना कहा जाता है. तीनों परस्पर घनिष्ठतापूर्वक संबद्ध है. उनके भीतर चलने वाले विद्युत-प्रवाह के आरोह-अवरोह को देखते हुए ही यह वर्गीकरण किया गया है.

स्वतः संचालित स्नायुमण्डल को मुख्यतः दो भागों में विभक्त किया जाता है, प्रथम को थौरेसको लंबर सिस्टम और दूसरे को क्रेनियो सैक्रल सिस्टम कहते है. इन्ही से निकल कर स्नायुमण्डल समस्त शरीर में फैलता है.

नाड़ी-समूह को योगशास्त्र में ७२ हजार माना गया है। किंतु सूक्ष्मदर्शक यंत्रों में उन्हें इससे कहीं अधिक पाया गया है।इतने पर भी उनमें से प्रधान थोड़ी सी ही हैं।

इन्हें आधुनिक शरीरशास्त्र में त्रिक जालक (सैक्रल प्लेक्सस), ग्रीवा जालक (सर्वाइकल प्लेक्सस), गृध्रसी तंत्रिका (सिएटिक नर्व), अधोजिह्व तंत्रिका (हाइपोग्लोसले नर्व), अलिंद (आरिक्युलर), कटी जालक (लम्बर प्लेक्सस), अनुत्रिक (कॉक्सीजिकल), कशेरुका (सैक्रल वर्टिब्रा) नाम दिए गए हैं.

योगशास्त्र में उनके नाम दूसरे हैं. दर्शनोपनिषद में इन प्रधान नाड़ियों को सरस्वती, कुहू, गंधारा, हस्ति, जिह्वा, पूषा, यशस्विनी, विश्वोदरा, वरुणा, शंखिनी, अलंबुषा आदि नाम दिए गए हैं और उनके भीतर काम करने वाली शक्ति धाराओं को ब्रह्मा, विष्णु, शिव, पुषत्, वायु, वरुण, सूर्य, चन्द्रमा, अग्नि आदि देवताओं के नाम से संबोधित किया गया है.

उपर्युक्त वर्गीकरण के अतिरिक्त इनका विभाजन दूसरे ढंग से किया गया. दृष्टि नाड़ियाँ (ऑप्टिक नर्व्स), श्रवण नाड़ियाँ (ऑडोटरी नर्व्स), घ्राण नाड़ियाँ (ऑल्फेक्ट्री नर्व्स) इनमें प्रधान है।

यों उनके हाइपोग्लोसल आदि और भी कतिपय विभाजन हो सकता है. ब्रह्मग्रंथि, विष्णुग्रंथि, शिवग्रंथि के नामों से इन्ही गुच्छकों की चर्चा साधना विज्ञान के अंतर्गत की गई है.

सूक्ष्म शरीर में प्राण-संचारिणी नाड़ियों में 14 प्रमुख हैं. इनके नाम इस प्रकार हैं― (१)सुषुम्ना (२) इड़ा (३)पिंगला (४)गांधारी (५)हस्ति जिह्वा (६)कुहू(७) सरस्वती (८)पूषा (९)शंखनी (१०)पयस्विनी (११)वारुणी (१२) अलंबुषा (१३)विश्वोधरा (१४)यशस्विनी.

इनमें भी सर्वोपरि तीन हैं―(१)इड़ा (२)पिंगला (३)सुषुम्ना. इन्हें तीन शरीर का, तीन लोकों का प्रतिनिधि बताया गया है.

समुद्र मंथन से उपलब्ध १४ रत्नों की चर्चा सभी ने सुनी है. इन १४ नाड़ियों को उसी स्तर के अनुदानों के लिए सूक्ष्मजगत में संबद्ध सूत्र का काम करने वाली विद्युत धाराएँ कहा जा सकता है.

समुद्र में, वायुमंडल में, धरती में अनेक परतें पाई जाती है. नाड़ीधाराओं की उपमा इन परतों से भी दी जा सकती है. मनुष्य के अंदर जो चमत्कारी अतींद्रिय क्षमताएँ है, वे मस्तिष्क की प्रसुप्त दिव्य प्रवृत्तियाँ हैं. इन्हें सुपर सेन्सरी नर्व्स कहा जा सकता है.

शुद्धिमेति यदा सर्वनाडीचक्रं मलाकुलम्।
तदैव जायते योगी प्राणसंग्रहणे क्षम:॥
– गोरक्षपद्धति

निशा द्विवेदी की फेसबुक वाल से साभार जिन्होंने विभिन्न पुस्तक, पत्र, पत्रिकाओं का उपयोग कर इसे संकलित किया है

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