खत्म होता छद्म-लिबरलिज़्म : वैश्विक परिदृश्य

एक तरफ जहां भारत में रोहिंग्या घुसपैठियों के समर्थन में देश के तमाम मानवता के ठेकेदार तथा बुद्धिजीवी आवाज़ उठा रहे हैं कि रोहिंग्याओं को भारत की नागरिकता दी जाये.

देश से बांग्लादेशी घुसपैठियों के समर्थन में आवाज़ उठती रही हैं. लेकिन अब इटली से घुसपैठियों को लेकर एक ऐसी खबर सामने आ रही है जो राष्ट्र की सुरक्षा तथा संप्रभुता के प्रति इटली की मज़बूत प्रतिबद्धता को दर्शाता है.

इटली का ये कदम आईना है हिंदुस्तान के उन तथाकथित बुद्धिजीवियों के लिए भी जो रोहिंग्या मुस्लिमों के प्रति हमदर्दी दिखा रहे हैं.

इटली सरकार ने ऐलान कर दिया है वह अपने देश में दूसरे देश (सीरिया, माल्टा आदि) से आये घुसपैठियों व शरणार्थियों को कोई जगह नहीं देगा. शायद इटली जाग गया है तथा इनके खतरे के प्रति सजग है.

आपको बता दें कि इटली ने माल्टा के एक बन्दरगाह से 600 से ज्यादा शरणार्थियों को लेकर आये हुए जहाज़ के दरवाज़े अपने बन्दरगाह पर नहीं खोले तथा कह दिया कि इटली में इनको स्थायित्व नहीं मिल सकता है.

इटली सरकार के एक वरिष्ठ मंत्री मेत्टो सल्विनी ने कहा है कि इटली की जनता ने उन्हें इसी के लिए चुना है तथा देश की सत्ता सौंपी है.

सल्विनी ने कहा है कि वह देश की सुरक्षा के साथ समझौता नहीं कर सकते हैं तथा जनभावनाओं के खिलाफ जाकर कोई कार्य नहीं करेंगे. उन्होंने कहा कि जो इटली की जनता चाहती है हमारी सरकार वही करेगी.

इटली में मुसलमानों की संख्या 2 हज़ार से बढ़कर बीस लाख हो गई है. प्राप्त रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 1970 में इटली में मुसलमानों की संख्या मात्र दो हज़ार थी जो 2015 में बढ़ कर बीस लाख हो गई.

विशेषज्ञों का कहना है कि मध्यपूर्व और उत्तरी अफ़्रीक़ा से आने वाले शरणार्थियों के दृष्टिगत इटली में मुसलमानों की संख्या में इसी प्रकार वृद्धि होती रहेगी.

इटली के समाजशास्त्री और धर्म अध्ययन केंद्र के प्रमुख मेसिमो ईन्त्रोवीने का कहना है कि मुसलमानों की बढ़ती जनसंख्या आश्चर्यजनक है क्योंकि वर्ष 1970 में इटली में केवल दो से तीन हज़ार के बीच मुसलमान रहते थे. उन्होंने कहा कि इटली में मुसलमानों की संख्या निरंतर बढ़ती जा रही है.

ज्ञात रहे कि इटली में कैथोलिक ईसाइयत के बाद इस्लाम दूसरा बढ़ा धर्म है. अलबत्ता इस देश में अब तक सिर्फ़ चार पंजीकृत मस्जिदें हैं और दो हज़ार स्थानों को उपासना के लिए पंजीकृत कराया गया है.

इटली ने मुसलमानों के साथ देश के अधिकारियों के संबंधों को सरल बनाने के लिए इस्लामी परिषद का गठन किया है. इटली में अभी भी इस्लाम को औपचारिक धर्म के रूप में मान्यता नहीं दी गई है.

इटली सरकार के इस कदम की कई देशों ने आलोचना भी की है लेकिन इटली ने साफ कर दिया है कि वह इन आलोचनाओं की परवाह नहीं करता.

इटली के मंत्री मेत्टो सल्विनी ने कहा कि वह मानवाधिकारों का समर्थन करते हैं लेकिन इसकी आड़ में देश की संप्रभुता तथा सुरक्षा के साथ खिलवाड़ नहीं कर सकते. उन्होंने कहा कि अब इटली पहले से देश में रह रहे शरणार्थियों को भी बाहर करेगा क्योंकि उनके लिए इटली की सुरक्षा सर्वोपरि है.

घुसपैठियों तथा शरणार्थियों के वेश में छिपे आक्रान्ताओं के खतरे से इटली तो सतर्क हो गया है लेकिन हिंदुस्तान नहीं. हिन्दुस्तान की सरकार जब रोहिंग्याओं को बाहर करने की बात करती है तो देश के अंदर से ही तमाम आवाज़ें इन आक्रान्ताओं के समर्थन में उठने लगती हैं.

फ्रांस के पड़ोसी देश जॉर्डन, तुर्की और लेबनान के अलावा समुद्र पार कर लगभग 2 लाख लोग अब तक यूरोपीय देशों में शरण ले चुके हैं. इन में केवल सीरियाई नहीं हैं बल्कि इराकी और अफगानिस्तानी भी शामिल हैं.

दूसरे विश्वयुद्ध के बाद यूरोप इस समय भयंकर शरणार्थी समस्या से जूझ रहा है और यूरोपीय देशों की विभिन्न सरकार सीरिया के शरणार्थियों को अपने यहां समायोजित करने की दिशा में काम कर रही थीं पर शरणार्थियों के खिलाफ यहां जनमत भी तैयार हो रहा था.

ऐसे में पेरिस पर हमले के बाद शरणार्थियों के लिए संकट तो गहराएगा ही, साथ में यूरोपीय देशों की सरकार के लिए भी अपनी जनता को नाराज़ कर के इस समस्या का समाधान ढूंढ़ पाना कठिन हो जाएगा.

इस बीच पोलैंड शरणार्थियों को आश्रय देने में पीछे हट चुका है. वहीं शरणार्थियों के लिए अपने द्वार खोल देने के लिए जरमनी की चांसलर एंजेला मर्केल की समालोचना की जा रही है.

बावरिया के मिनिस्टर प्रैसिडैंट हौर्स्ट सीहोफर ने जरमनी की ‘ओपन बॉर्डर’ नीति की समालोचना की है. और तो और, स्वीडन भी शरणार्थियों के खिलाफ होने लगा है.

दुनियाभर में जिहादी आतंकवाद के मद्देनजर निशाने पर मुसलिम आबादी है. 13 नवंबर को इस्लामिक आतंकवादी हमले के बाद पेरिस की जनता प्रभावित लोगों की मदद के लिए बड़े पैमाने पर आगे आई है.

इसके बाद फ्रांस के मुसलमानों को शक की नज़र से देखा जाने लगा है. यूरोप में सबसे ज़्यादा मुसलमान फ्रांस में रहते हैं जो क़रीब 50 लाख हैं, जर्मनी में मुसलमानों की संख्या 40 लाख या पांच फ़ीसदी, जबकि ब्रिटेन में 30 लाख या पांच फ़ीसदी है.

अब जर्मनी में इसके खिलाफ खुल कर आवाज़ उठने लगी है. वह अपनी नीतियों में परिवर्तन करने जा रहा है.

ध्यान देने योग्य है कि फ्रांस की 8 प्रतिशत आबादी मुसलिम है लेकिन इसमें अभी उन शरणार्थियों की गिनती नहीं है जो बेहद सोची समझी रणनीति के चलते यूरोप के देश में घुस गए हैं और वहां फैला रहे हैं आतंकवाद.

असल में आतंकवाद की जड़ें धर्म की अंधशिक्षा से जुड़ी हैं. जिहाद के नाम पर ही आतंकवादी बरगलाए जाते हैं जो खुद को बम से उड़ा कर यह समझते हैं कि उन्होंने अपने मजहब का भला किया है.

इस बीच फ्रांस के एक अख़बार के दावे ने दुनिया भर के उन लोगों को हैरत में डाल दिया है कि पेरिस में बढ़ रही मुसलमानों की संख्या के चलते वहां के यहूदी खुद को असुरक्षित महसूस कर रहे हैं और वहां से धीरे धीरे सुरक्षित स्थान की तरफ पलायन कर रहे हैं.

2016 में वॉशिंगटन आधारित प्यू रिसर्च सेंटर ने एक ऐसा सर्वे प्रकाशित किया था जिसमें उसने करीब आधे यूरोपीय लोगों में शरणार्थियों के आने से देश में आतंकवाद बढ़ने का डर पाया.

सर्वे में शामिल यूरोप के दस में से आठ देशों की आधी से ज्यादा यानि यूरोप की करीब 80 फीसदी आबादी ऐसा मानती है.

शरणार्थियों के खिलाफ सबसे कठोर विचार रखने वाले 76 प्रतिशत लोग हंगरी और करीब 71 प्रतिशत पोलैंड में मिले. जर्मनी में भी सर्वे में शामिल किए गए करीब 61 फीसदी लोगों का यही मानना था, और ब्रिटेन के 52 प्रतिशत लोगों ने भी ऐसी ही आशंका जताई.

थोड़े हैरान करने वाले आंकड़े फ्रांस से मिले, जो बीते साल कई बार आतंकी हमलों का शिकार बनाया गया है. फ्रांस के 46 फीसदी लोगों का ही ऐसा मानना था कि शरणार्थियों के कारण आतंकवाद की संभावना बढ़ती है.

सर्वे में लिखा है, “यूरोप में हाल ही में रिफ्यूजी आबादी में आई भारी बढ़ोत्तरी के कारण पूरे महाद्वीप में दक्षिणपंथी पार्टियों के प्रवासी-विरोधी नारों में तेजी आई है और ब्रिटेन के यूरोपीय संघ से बाहर निकलने के फैसले को लेकर बहस और गर्माई है.”

2015 में यूरोप में करीब 10 लाख अवैध प्रवासी पहुंचे. मध्यपूर्व, एशिया और अफ्रीका के संकटग्रस्त इलाकों से जान बचाकर भागे कई लोग यूरोप में शरण लेना चाहते हैं.

सर्वे के नतीजों के बारे में बताते हुए लिखा गया है, “यह समझना जरूरी है कि रिफ्यूजी को लेकर चिंताएं देश में प्रवेश कर रहे प्रवासियों की संख्या से पूरी तरह जुड़ी नहीं मानी जानी चाहिए.”

ऐसे कई देश हैं जहां यूरोपीय देशों से कहीं अधिक संख्या में शरणार्थी मौजूद हैं, लेकिन उनके बारे में ऐसे विचार नहीं हैं. जर्मनी और स्वीडन में भी पोलैंड और हंगरी के मुकाबले कहीं ज्यादा प्रवासी पहुंचे हैं.

इस सर्वे से एक और बात साफ दिखती है कि शरणार्थियों के बारे में राय इस कारण और भी नकारात्मक बन जाती है क्योंकि उनमें से ज्यादातर मुसलमान हैं. यूरोप में पहले से रह रहे मुसलमानों के बारे में जैसा नज़रिया बना हुआ है, वही शरणार्थियों के बारे में राय पर भी असर डालता है.

हंगरी, पोलैंड, इटली और ग्रीस के हर 10 में 6 लोगों की अपने देश में रह रहे मुसलमानों के बारे में अच्छी राय नहीं थी. जर्मनी की अति दक्षिणपंथी एएफडी पार्टी के ज्यादातर समर्थकों में मुस्लिम आबादी के बारे में नकारात्मक सोच पाई गई.

इस सर्वे में जर्मनी, स्वीडन, ब्रिटेन, फ्रांस, स्पेन, इटली, ग्रीस, नीदरलैंड्स, पोलैंड और हंगरी जैसे कई यूरोपीय देशों को शामिल किया गया.

इस तरह का सर्वे हमारे देश में प्रकाशित कर देने से लिबरांडो और सेकुलारियो को चुन्ना काटने लगता है.

उनकी संख्या भारत में बहुत ही कम है, उंगलियों पर गिनी जा सकती है पर संचार माध्यमो पर कब्ज़े और लम्बे समय तक सत्ता में बने रहने के कारण वे प्रभावी हो गये थे.

धीरे-धीरे उनका असर कम हो रहा है क्योंकि जनता अब वास्तविक सूचनाओं को ज्यादा महत्त्व देने लगी है. जल्द ही आप देखेंगे कि वे इसी भारत में कौड़ियों के महंगे हो जायेंगे.

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