औरंगज़ेब के पिता : कश्मीर घाटी और वृहत्तर भारत की बीमारी की कुंजी

कल औरंगज़ेब के पिता के बयान की तरफ मैंने इंगित किया. लोगों ने बहुत ध्यान नहीं दिया.

रट्टामार शिक्षा ने सतह के नीचे देख सकने की हमारी सम्भावित स्वाभाविक क्षमता का कत्ल कर दिया है.

मेरी टिप्पणी टेलिविज़न पर देखी खबरों पर आधारित थी.

युवा पुत्र के मारे जाने पर पिता का दुख और क्रोध स्वाभाविक है – इसमें किसी आश्चर्य की बात नहीं. पर जो बात दिलचस्प है वह है उनका यह कहना कि यह सब कश्मीर के ‘पॉलिटिशियन्स’ का किया है.

फ़ौरी तौर पर तो यह बहुत मामूली सी और शायद सही बात लगती है, तमाम लोगों ने ‘कौवा कान ले गया’ के तर्क के आधार पर तुरंत सहमति भी जताई.

पिता को शायद स्वयं नहीं पता कि उनकी इस बात के क्या मायने हैं. उन्हें इसलिए नहीं पता क्योंकि यह बात मानस में बहुत गहरे गड़ी deeply embedded भावना से जुड़ी है.

यह उसी तरह की बात है जैसे भोलेभाले और शातिर लोगों का यह कहना कि भारत पाकिस्तान की शत्रुता दोनों देशों के नेताओं के कारण है. दोनों देशों की भोली भाली जनता तो अमन चैन और भाईचारा चाहती है पर सरकारें बेचारी जनता को बरगला कर आपस में लड़वाती हैं.

आपको क्या लगता है – कश्मीर की समस्या पॉलिटिशियन्स के कारण है?

जब आप ऐसा कहते हैं तो आप समस्या की जड़ से ही ध्यान हटा देते हैं. समस्या की जड़ में है – इस्लामी फासीवाद.

ऐसे बयान कई बार बिना सोचे समझे यूँ ही दे दिए जाते हैं और कई बार उसी फासीवाद के प्रति सचेत या अचेत सहानुभूति से उपजते हैं जिसके कारण हुई हत्या का आप शोक मना रहे हैं.

आप ऐसा कह कर क़ातिलों के हाथ मज़बूत करते हैं, उन्हीं कातिलों के जिनके कुकर्म के कारण आज आप दुख और गुस्से में हैं. You provide the murderers with much needed diversion.

और उससे भी महत्वपूर्ण बात यह कि जिस विचारधारा ने इन दरिन्दों को जन्म दिया, दरिन्दगी की पौध जिस जमीन से उगी, उससे ध्यान हटाने में मदद करते हैं, आप जाने अनजाने इस क़ातिलाना धंधे में सहभागी (collaborator) बन जाते हैं.

और मज़ेदार बात यह कि ऐसा कहने के लिए भोले भाले, दिमाग से पैदल लोग तालियाँ बजाते हैं, आपकी तारीफ करते हैं और अपनी गर्दनें क़ातिलों के और करीब ले जाते हैं ताकि उन्हें मेहनत कम करनी पड़े.

यह बात कुछ वैसे ही है जैसे अक्सर खाए पिए, अघाए, पढ़े लिखे लोग अपने सजे धजे ड्राइंग रूमों में व्हिस्की के गिलास हाथों में धरे देश की दुर्दशा के कारण का निदान तुरंत एक वाक्य में करते है :

“भारत को नेताओं ने बर्बाद किया”.

ऐसा करने के बहुत सारे फ़ायदे हैं. उनका सीना सस्ती, लिजलिजी बौद्धिकता और आत्मसंतोष के गौरव से फूल जाता है। चेहरे पर चमक छा जाती है. अपनी स्वयं की ज़िम्मेदारियों से मुक्ति मिल जाती है.

जब दोष सब नेताओं का है तो मेरे घूस लेने में क्या ख़राबी है? और मैं टैक्स क्यों दूं? और यही नहीं, जैसे ही वे यह कहते हैं कि सब नेता चोर हैं, वे लालू यादव और नरेन्द्र मोदी को एक जगह खड़ा कर देते हैं और इस तरह लालू जैसे लोगों को ख़ूबसूरत alibi – चोरी करने की छूट देते हैं.

ऐसे बयानों के कई कारण हैं. पहला तो शायद बौद्धिक दिवालियापन या आलस्य. दूसरा शायद कहीं चोरों लुटेरों के प्रति समानधर्मा होने के कारण गहरे में दबी अचेत या सचेत सहानुभूति.

ऐसी बातों में सुविधा बहुत है. कुछ सोचना नहीं पड़ता, कुछ करना नहीं पड़ता. कातिलों, चोरों लुटेरों को मदद मिल जाती है. मूल समस्या से ध्यान हट जाता है. संतोष और गर्व का दिया दिल में भकभकाने लगता है.

और देश तेज़ी से रसातल की तरफ अग्रसर होता है.

Comments

comments

loading...

LEAVE A REPLY