सच से परहेज़ से काम नहीं चलेगा काँग्रेसियों-सपाइयों

उप्र में भाजपा के वयोवृद्ध वरिष्ठ नेता लालजी टण्डन के खिलाफ आजकल कांग्रेस और समाजवादी पार्टी जमकर आगबबूला हो रही है. उन पर इतिहास को तोड़ने मरोड़ने और विकृत करने का आरोप लगा रही है.

दरअसल अपनी हाल ही में प्रकाशित पुस्तक ‘अनकहा लखनऊ’ में लालजी टण्डन ने काकोरी काण्ड का जिक्र करते हुए यह लिखा है कि…

‘कांग्रेस के बड़े नेता गोविन्द बल्लभ पन्त ने काकोरी काण्ड के अमर क्रांतिकारियों का मुकदमा लड़ने से इसलिए मना कर दिया था क्योंकि उन क्रांतिकारियों का मुकदमा लड़ने के लिये सरकार 20 रूपए प्रतिदिन दे रही थी जबकि गोविन्द बल्लभ पन्त ने अपनी फीस 100 रूपए प्रतिदिन मांगी थी. जिसके नहीं मिलने पर उन्होंने मुकदमा लड़ने से मना कर दिया था.’

ध्यान रहे कि क्रांतिकारियों के पास पैसे नहीं थे इसलिए उन्हें सरकार की ही तरफ से वकील उपलब्ध कराया गया था. क्रांतिकारियों ने सरकार को गोविंद बल्लभ पन्त का ही नाम दिया था. लेकिन कम फीस होने के कारण गोविन्द वल्लभ पन्त ने मुकदमा लड़ने से मना कर दिया था.

टण्डन जी की किताब के उस तथ्य को ही कांग्रेस और सपा नेताओं की फौज सफेद झूठ बता रही है.

लेकिन सच क्या है?

यह जानने के लिए कांग्रेसी और सपाई फौज टण्डन जी की किताब नहीं बल्कि ‘रामप्रसाद वर्सेज़ एम्‍पेरर’ मुकदमे की पूरी कार्यवाही से सम्बन्धित दस्तावेज़ को ध्यान से पढ़ लें, जिसका तस्‍करा एआईआर-1927 अवध 369 (2) की संख्‍या पर रामप्रसाद एण्‍ड अदर्स एक्‍यूज्‍ड वर्सेज़ एम्‍पेरर अपोज़िट के नाम से है.

इस एआईआर के पन्‍नों पर दर्ज इस मामले में साफ लिखा है कि पन्‍त जी ने इस मुकदमे को नहीं लड़ने का जो आधार दिया था, उसका कारण था सरकार से इस मुकदमे के लिए प्रस्‍तावित अपर्याप्त फीस.

तो यह तो है वह सच्चाई जो लगभग 90 वर्ष पुराने विधिक दस्तावेज़ों में दर्ज है. जिसे कोई झुठला नहीं सकता.

लेकिन कई स्थानों पर विशेषकर लखनऊ में जिस इमारत (वर्तमान GPO) में उन क्रांतिकारियों पर मुकदमा चला था. वहां तत्कालीन कांग्रेस सरकार द्वारा बनवाए गए स्मृति स्तंभ तक पर उन क्रांतिकारियों का मुकदमा लड़ने वाले वकीलों के नामों की सूची में गोविन्द बल्लभ पन्त का भी नाम दर्ज है.

दरअसल यह नाखून कटा कर शहीद होने की कहावत चरितार्थ करने जैसा ही है.

क्योंकि काकोरी काण्ड में 14 वर्ष के कठोर कारावास की सज़ा पाए मन्मथनाथ गुप्त जी ने भी अपनी एक पुस्तक में इस प्रसंग का जिक्र किया है कि…

‘गोविन्द बल्लभ पन्त ने फीस कम होने के कारण मुकदमा लड़ने से मना कर दिया था. लेकिन जब मुकदमा शुरू हुआ तब हर पेशी पर क्रांतिकारियों के दर्शन करने के लिए जेल से रिक थियेटर (आज का GPO) तक सड़क के किनारे लोग खड़े होकर नारे लगाते थे.

रिक थियेटर पर 8 से 10 हज़ार की भीड़ जमा हो जाती थी जो क्रांतिकारियों के स्वागत में ज़ोरदार नारे लगाती थी. कुछ पेशियों तक यह नज़ारा देखकर हमारे वकील सीबी गुप्ता और अन्य की टीम का सहयोग करने के लिए गोविन्द बल्लभ पन्त भी अदालत आने लगे थे.’

अतः सच क्या है, झूठ क्या है? यह आप मित्र स्वयं तय करिये.

लालजी टण्डन की किताब में लिखे तथ्य पर आगबबूला हो रही कांग्रेसी और सपाई फौज को मेरा बस इतना सुझाव है कि… सच से मुंह चुराना बन्द करो, उसे स्वीकारना सीखो. क्योंकि 21वीं सदी की सूचना और संचार क्रांति के इस महादौर में कुछ भी छुपाना असम्भव हो चुका है.

“दे दी हमें आज़ादी बिना खड्ग बिना ढाल” का राग अलाप कर उन 7 लाख नौजवानों की शहादत को अपमानित करना अब असम्भव हो गया है जिन्होंमे फांसी के फंदे पर लटककर या बन्दूक की गोली सीने पर खाकर हमारी आज़ादी की महागाथा अपने रक्त से लिखी.

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