कोई यूटोपिया नहीं होता, झूठोपिया ही है बस

UTOPIA (यूटोपिया) क्या होता है?

डिक्शनरी में उसका अर्थ होता है ‘आदर्शलोक’ – एक ऐसी काल्पनिक जगह जहां सब कुछ आदर्श हो.

काल्पनिक जगह.

लेकिन क्या आप को पता नहीं कि वाकई (वा+क+ई) गिरोह आप को यूटोपिया ही बेच रहा होता है?

वे सब से पहले आप की समस्याओं की बातें करेंगे.

अब समस्याएँ किसे नहीं होती? लेकिन एक बात समझिए, अधिकतर लोगों को यह सुनना अच्छा लगता है कि उनकी समस्या जो है, या फिर वे अपना सपना पूरा कर नहीं पा रहे, तो किसी और की वजह से.

कोई यह नहीं सुनना चाहता कि अपनी समस्या की जड़ वो खुद है. कई तो ऐसे भी मिलेंगे जो नाराज़गी से आप से कहेंगे कि आप समझ ही नहीं रहे हैं.

लेकिन यही आप उनकी समस्याओं को बहुत बड़ी समस्या बताकर उनसे ये कहें कि “सचमुच आप बड़े ही धैर्यशील व्यक्ति हैं जो इतने बड़े प्रॉब्लम से टक्कर ले रहे हैं – आसान नहीं है यह, मेरे से तो ना होता, पता नहीं मैं आप की जगह होता तो आप के _ _ _ को क्या जवाब देता.”

खाली जगह परिस्थिति अनुसार भरे जाये.

लेकिन यहाँ व्यक्ति बहुत खुश होता / होती है, आप एक स्पेशल व्यक्ति बन जाते हैं कि एक व्यक्ति ये है जो मुझे सही अर्थ में समझता है.

कई औरतों का हर तरह का फायदा इसी तरह से उठाया जाता है. मर्दों का भी. क्योंकि ज़िम्मेदारी से बरी करते बोल सब को अच्छे लगते हैं और कई लोग अगले का इरादा जान कर भी उनकी बड़ी कीमत चुकाते हैं.

अस्तु, हम बात यूटोपिया की कर रहे थे.

गिरोह के लोग आप की समस्याओं का कारण आप के समाज या समाज व्यवस्था बताएँगे.

उनका फॉर्मूला यही होगा कि आप को इस समाज को ध्वस्त करना होगा तभी यूटोपिया का निर्माण हो पाएगा.

इनके जाल में आ कर लोग करने की सोचते भी हैं. जहां कम्युनिस्ट राज्य आया या जहां इस्लामी हुकूमत आई वहाँ क्या हुआ?

बंगाल कंगाल हो गया. समाजवाद की सत्ता लाकर मुल्लालु जोड़ी ने यूपी-बिहार के जो हाल किए उससे दिल रोता है.

वामपंथ हो या इस्लाम, समस्याएँ सुलझने से रही. लेकिन तब अगर आप सवाल करो कि जो बातें आप ने कही वे हो क्यों नहीं रही तो आप को संशोधनवादी, बुर्जुआ, या बिद’अति बताया जाता है और आप की आवाज को बंद किया जाता है.

इसाई जब चर्च से संचालित थे तो तानाशाही उनकी भी कम न थी, गोवा में उनके ज़ुल्म शर्मनाक हैं, और दुनिया भर में चर्च के ज़ुल्मों के लिए माफी मांगने वाले पोप ने उन ज़ुल्मों के लिए कभी माफी नहीं मांगी है.

कुल मिलाकर जब इनकी बातों की नाव वास्तविकता की चट्टानों से टकराकर चकनाचूर होती है तब डूबने वालों को पता चलता है कि इनका कोई यूटोपिया नहीं होता, झूठोपिया ही है.

लेकिन ये शातिर तैराक पहले ही कूदकर नए शिकार की खोज में आगे निकल गए होते हैं.

Comments

comments

loading...

LEAVE A REPLY