हासिल से ज़्यादा की इच्छा बुरी नहीं, पर हासिल में भी तो रहें खुश

कभी अरुणाचल प्रदेश के नक्शे में म्यांमार साइड को ध्यान से देखिए. आप पाएंगे कि अरुणाचल प्रदेश का एक उंगली सदृश हिस्सा म्यामार में घुसा हुआ है.

ये क्षेत्र भारत के सबसे दुर्गम स्थानों में एक होगा. हालांकि आधिकारिक रूप से हो सकता है कि डेटा कुछ और कहे क्यों कि यहां तो सर्वे करने की टीम भी मुश्किल से ही जा पाती होगी.

इस जगह का नाम है विजयनगर और ये अरुणाचल के चांगलांग ज़िले में है. भूगोल के विद्यार्थी “फोर्थ वर्ल्ड पीपल” और “ज्योग्राफिकल प्रिजन” जैसे शब्दों से अवश्य परिचित होंगे. ये उसका एक जीवंत उदाहरण है.

क्यों कहा जाता है इसे ज्योग्राफिकल प्रिजन? उत्तर निम्न लिखित है.

• पूर्वी हिमालय के पहाड़ में ढलान काफी तेज होती है… सेडीमेंट्री रॉक होने की वजह से, पहाडों में पानी के स्रोत होने, सदाहरित वर्षा वन होने जैसे कई कारण होने के कारण लैंड स्लाइड काफी ज्यादा होती है. इससे रोड निर्माण बाधित होता है. ऊपर से आबादी इतनी कम है कि सरकार खुद कई बार नजरअंदाज़ करती है.

• विजयनगर नाम के पीछे एक कहानी है. सन 1962 की लड़ाई में पेट्रोलिंग के दौरान आर्मी मेजर जनरल ए एस गुरया ने नीचे से धुँआ उठते हुए देखा. तो वे इस जगह को देखने के लिए उत्सुक हुए. फिर उन्होंने यहां कैम्प बिठाया और इसी जगह उनके बेटे का जन्म हुआ. उसका नाम उन्होंने विजय रखा. विजय के नाम पर इस दुर्गम जगह का नाम विजयनगर रख दिया गया.

• मियाओ तक बस जाती है जो नजदीकी शहर (कह सकते हैं) जागून, असम से जुड़ती है. मतलब जागून से मियाओ बस द्वारा, फिर वहां से विजय नगर पैदल. वो भी पूरे पांच दिन तक. उष्ण कटिबंधीय सदाहरित वर्षा वाले वन जिसमें घुसने के बाद आपको 5 मीटर भी नहीं दिखाई दे सकता. हालांकि पैदल जाने लायक रोड है. फिर भी जो सबसे ज्यादा खतरे हैं वे हैं जानवर और जोंक और जरूरी सामानों की रास्ते में अनुपलब्धता.

• आर्मी का एयरोप्लेन आवागमन में मदद करता है लेकिन महीने में सिर्फ दो बार. इसलिए यहाँ के लोग ज्यादातर कारवां बनाकर चलते हैं. वे विजयनगर से असम के जागून आते हैं. और यहां से तेल, नमक आदि ज़रूरत की चीज़ें ले जाते हैं, जो वहां मिलती ही नहीं.

• लाइट नहीं है. हाल फिलहाल का तो पता नहीं, लेकिन कुछ समय पहले यहां के विधायक ने जनरेटर की व्यवस्था की थी. एक समय कुछ दिन पहले फोन कॉल 50 रुपये प्रति कॉल थी.

• यहां रहने वाले ज्यादातर नेपाली हैं. शिक्षा के लिए जहां असम के बच्चे दिल्ली, गुवाहाटी आदि शहरों में जाते हैं वहीं ये अपने बच्चों को सीमावर्ती असम के छोटे छोटे से गुमनाम कस्बे जैसे जागुन, डिगबोई, लेखपानी आदि जगहों पर किराये के मकानों में रहकर पढ़ाते हैं. कुछ लोग यहां आस पास में नौकरियां भी करते हैं.

• फिर पढ़ाई और जॉब खत्म होने के बाद फिर से चले जाते हैं ये लोग उसी पांच दिन की पैदल यात्रा में… विजय नगर में अपनों से मिलने के लिए.

• फिलहाल अब अरूणाचल के मियाओ शहर से दो हेलिकॉप्टरों की दैनिक उड़ान शुरू हो चुकी है. इस जगह चावल और आलू की पैदावर बहुत ज्यादा होती है और आजकल यहाँ पर बड़ी इलायची की खेती की शुरूवात बड़े पैमाने पर हो चुकी है.

• इस जगह पर पुरूष से ज्यादा स्त्रियाँ रहती हैं और प्राय: खेती-बाड़ी का काम औरतें ही निबटाती है, कारण यहाँ के पुरूष ज्यादातर भारतीय सेना में भरती होते हैं. प्रत्येक घर से दो या तीन लोग सेना में होते हैं और गाँव में रह जाते है उम्रदराज बूढ़े लोग और स्त्रियां.

आज के समय में पांच दिन में आप अमेरिका जाकर वापस आ सकते हैं. पांच दिन में आप देश के किसी भी जगह पर जाकर ट्रेन द्वारा वापस आ सकते हैं. ऐसे में विजयनगर जाने के लिए, सिर्फ वहां पहुंचने में ही पांच दिन लगते हैं.

इसमे व्यवस्था का उतना दोष भी नहीं. क्योंकि प्रकृति ही खिलाफ है. सड़कें लैंड स्लाइड में टूट जाती हैं. रसद कैसे पहुंचे? बिजली कैसे पहुंचाई जाए इन तक, आदि समस्याएं पैदा हो जाती हैं.

अतः आपको जितना मिला है, जितनी सुविधाएं आपको हासिल हुई हैं उससे ज्यादा की इच्छा करना बुरा नहीं है लेकिन उसमें खुश ज़रूर रहें. उनका सदुपयोग करें.

और हाँ, प्रकृति को धन्यवाद कहना न भूलें. क्यों कि प्रकृति कब रेगिस्तान को समंदर और पहाड़ों को मैदान में तब्दील कर दे… ये कोई नही जानता.

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