व्यंग्य : जब ‘समझने’ भर से काम चले तो ‘होने’ की मेहनत क्यों करना

मैं समझता हूं किसी देश में पैदा होने बाद किसी मनुष्य को जो कुछ एक मौलिक अधिकार स्वतः प्राप्त हो जाते हैं, उन सब अधिकारों में उसे एक अधिकार और मिलना चाहिए, ख़ुद को कुछ समझने का मौलिक अधिकार… क्योंकि मैं मानता हूँ कि हम सब घोषित या अघोषित तौर पर ख़ुद को कुछ ना कुछ तो समझते ही हैं.

यहाँ वास्विकता में कुछ ‘होने’ की बात नहीं हो रही, यहाँ ‘समझने’ की बात हो रही है. और यहाँ ‘समझना’ ‘होने’ से ज़्यादा महत्वपूर्ण है. जैसे कि मैं ‘समझता’ हूँ कि मैं एक अच्छा गायक हूँ… नहीं हूँ ये एक अलग विषय है, नहीं भी हूँ तो भी मैं क्यों मानूँ कि मैं नहीं हूँ, क्योंकि यहाँ भी ‘समझना’ ‘होने’ से ज़्यादा महत्वपूर्ण है, मेरे लिए अच्छा गायक होना कभी महत्वपूर्ण नहीं रहा..

क्योंकि मैं समझता हूँ कि मैं अच्छा गायक हूँ, जैसे कुछ लोग समझते हैं कि वो अच्छे नेता हैं…

कुछ समझते हैं कि वो अच्छे अभिनेता हैं, कुछ समझते हैं कि वो अच्छे साहित्यकार हैं और कुछ समझते हैं कि वो अच्छे पक्ष-कार हैं… मतलब अच्छे पत्रकार हैं.

बहरहाल ये एक शाश्वत सत्य है कि धरती पर जन्म लेने के साथ ही हम ख़ुद को कुछ ना कुछ समझने ही लगते हैं, और किसी कारण से अगर हमने ख़ुद को कुछ ना समझा, तो दूसरे लोग हम को येन-केन-प्रकारेण ये विश्वास दिला ही देते हैं कि तुम कुछ हो.

कल्पना कीजिए जन्म लेकर नवजात शिशु अस्पताल के झूले में पड़ा, छत पर लगे 4 नॉटिकल की स्पीड से चल रहे सरकारी पंखे को देख कर कुछ समझने की कोशिश कर ही रहा होता है कि उसे देखने आए रिश्तेदार उसे बताते है कि उसका नाम झिंकु है और उसकी शक्ल सॉरी सकल.. बरम्हान घाट में रहने वाले फलां-फलां कक्का जी से मिलती है, और जो आदमी सुबह से पाँच सौ पच्चीस एंगल से उसकी फ़ोटो खींच-खींच कर फेसबुक में उपलोड कर रहा है वो उसका बाप है, और बगल के पलंग पर भरी गर्मी में कानों में स्कार्फ़ बाँधे जो औरत हरीरा पी रही है वो उसकी मां है. तो वो जन्म लेने के साथ ही ख़ुद को ‘झिंकु’ और इन दोनों की ‘संतान’ समझने लगता है.

फिर स्कूल में एडमिशन के साथ ही, भले विद्या से उसका कोई सीधा संपर्क ना हो पर वो ख़ुद को ‘विद्यार्थी’ समझने लगता है. बड़ा होकर जब वो आठवें अटेम्प्ट में एग्जाम पास करके, नगर निगम में क्लर्क की कुर्सी पर बैठकर सामने खड़े आदमी से कहता है ‘लंच के बाद आना’…. सामने से एक कातर स्वर उभरता है साहबsss… वो अपनी अर्धनिमीलित आँखे खोल कर सामने खड़े आदमी को देखकर मुस्कुराता है, और उस दिन के साथ ही ख़ुद को ‘साहब’ समझने लगता है.

फिर बच्चों की शादी के बाद ‘ससुर’, फिर बच्चों के बच्चे पैदा होने पर ‘दादा’, फिर परदादा.. फिर ये.. फिर वो और इसी तरह ख़ुद को कुछ समझते-समझते एक दिन ऊपर वाला उसे समझ लेता है और फिर भूत बनकर भटकते हुए अपनी तेरहवीं के दिन, अपने ही घर की मुंडेर पर बैठ कर काले कौवे के साथ ख़ुद को लगाए गए भोजन को शेयर करते हुए सोचता है, कि उम्र भर वो अपने आपको पता नहीं क्या-क्या समझता रहा, पर असलियत में वो अपनी फ़ोटो के सामने रखे कलश में बंद डेढ़ सौ ग्राम हड्डियों और सौ ग्राम राख़ से ज़्यादा कुछ नहीं था.

रुकिए-रुकिए लगता है गाड़ी कुछ ट्रेक से उतर रही है, यूँ भी व्यंग्य विधा के पुराने मठाधीश कह गये हैं कि व्यंग्यकार को दार्शनिकता और भावुकता के सार्वजनिक प्रदर्शन से बचना चाहिए तो वापस मुद्दे पर आते हैं.

हाल ही में एक अधेड़वय बालक को जो ख़ुद को कुछ नहीं समझता या सीधे शब्दों में कहें तो कुछ नहीं समझता, को लोगों ने ये विश्वास दिला दिया कि तुम फलां-फलां पार्टी के ढिमका-ढिमका अध्यक्ष हो, अब मरता क्या ना करता उसने भी मान लिया कि हाँ भैया हूँ.

कुछ साल पहले इस बालक के पिता को भी आधी रात को कुछ लोगों ने जाकर कहा था कि आज, अभी और इसी वक्त से तुम ख़ुद को इस देश का पिरधानमंत्री समझना, तो उसने कहा पर मैं तो ख़ुद को पायलट समझता हूँ लोगों ने कहा अभी कच्चे नींबू हो… बता तो रहे हैं कि हम सब तुम्हें पिरधानमंत्री समझते हैं और जब इतने सारे लोग तुम्हें पिरधानमंत्री समझते हैं, तो ये बात मान लेने में तुम्हारे पिताजी क्या जाता है. उसने कहा कि जाता तो कुछ नहीं पर मुझे देश चलाना नहीं आता, मैं तो बस थोड़ा बहुत प्लेन चला लेता हूँ वो भी अच्छे से नहीं..

तो लोगों ने कहा कि प्लेन चलाते हुए भी तो तुम्हें नीचे से निर्देश मिलते हैं, वो बोला हाँ… लोगों ने कहा कि बस तो तुम देश को भी प्लेन समझ कर चलाते रहना बाकी निर्देश हम नीचे से देते रहेंगे…

अगले ने भी मान लेने में ही अपनी भलाई समझी, तो आप समझिए कि सीधी-सच्ची बात ये है कि कुछ ‘होने’ के लिये बड़ी मेहनत लगती है ‘समझना’ आसान पड़ता है. तो अगर कभी आपने कुछ ‘होने’ का सपना देखा है, और आप जानते है कि उस ‘होने’ के लिए जितनी मेहनत करनी पड़ेगी वो आपसे सात जनम ना हो सकेगी, तो उसका एक अच्छा शॉर्टकट ये है कि आप ख़ुद को वो समझने लगिये जो आप होना चाहते हैं…

इसमें आपको कोई मेहनत नहीं करनी पड़ेगी, और जिस चीज़ को पाने के लिये कोई मेहनत ना करनी पड़े, उसका मज़ा ही कुछ और होता है… और मैं पूछता हूँ इतनी मेहनत की भी क्यों जाये साहब, जब समझने से भर से काम चल रहा है.

आप ख़ुद को कुछ समझने तो लगिए… आप देखेंगे थोड़े दिन बाद लोग भी आपको वही समझने लगेंगे, क्योंकि लोग भी तो हम आप जैसे ही हैं वो कोई आसमान से उतरे तो हैं नहीं….

जैसे आप कुछ होने के लिये कोई मेहनत नहीं करना चाहते… वैसे ही लोग, आप वो हैं कि नहीं जिसकी आपने घोषणा कर रखी है, ये जानने की मेहनत नहीं करना चाहते… वो मान लेते हैं, और हमारे लिए इतना काफ़ी है.

जैसे साहित्य के क्षेत्र में लोग पहले-पहल कुछ कविता, कहानी, ग़ज़ल, उपन्यास आदि लिखना शुरू करते हैं और जैसे ही चार-छः साल गुज़रे तो आपने नाम के आगे ‘डॉ.’ लिखने लगते हैं… अब लोग भी ये जानने की मेहनत नहीं करना चाहते कि वाकई इस इंसान ने phd की है? या किस गुरुकुल काँगड़ी विश्वविद्यालय ने उन्हें ये phd की मानद उपाधि दी है? वो मान लेते हैं कि ये आदमी डॉक्टरेट है…

जैसे हमारे दिल्ली वाले ज़िल्लत-ए-सुब्हानी ने तमाम सबूतों के बाद भी मान लिया था कि उनके कानून मंत्री वकील हैं. अब उनकी डिग्री फर्जी थी ये एक अलग विषय है… दरअसल हमारे सड़जी ‘समझने और मान’ लेने वाली बिरादरी के प्रतीक पुरूष हैं, क्योंकि वो समझते… मतलब मानते हैं कि वो ईमानदार हैं… हैं नहीं ये अलग बात है, और मज़े की बात देखिए कि दिल्ली की जनता ने मान भी लिया कि वो ईमानदार हैं.

तो मैं कहता हूं कि जब ‘समझने’ भर से आपका काम चल रहा है तो ‘होने’ की मेहनत क्यों करना भला… और वैसे भी हम भारत के निवासी हैं, जहां एक रोबोट ये समझ कर कि वो इस देश का प्रधानमंत्री है दस साल तक सरकार चला सकता है, वहाँ कुछ भी हो सकता…

ये ख़ुद को कुछ समझने की चरम स्थिति है… मेरे ख़्याल से ख़ुद को प्रधानमंत्री समझने से बड़ा सपना तो आपने नहीं ही देखा होगा, अब तो स्थिति ये है कि कोई आदमी कड़ी मेहनत करके कुछ हो जाये तो हमें तकलीफ़ हो जाती है, क्योंकि हमारे लिए ये मानना कठिन है कि जब समझने भर से काम चल रहा है तब एक आदमी कुछ होने के लिए कड़ी मेहनत क्यों कर रहा है भला.

जिस देश में राजीव गांधी, आई.के. गुजराल, देवेगौड़ा और मौनमोहन सिंह जैसे लोग प्रधानमंत्री रह चुके हों, वहाँ ‘नरेंद्र दामोदर दास मोदी’ नामक व्याक्ति एक अच्छा प्रधानमंत्री होने के लिए कड़ी मेहनत कर रहा है… ये समझना हमारी समझ से परे है, क्योंकि हमें ऐसे ही लोग पसंद हैं जो हों भले कुछ ना… पर हमें इस धोखे में रख सके कि वो कुछ हैं.

अब बताइए जहाँ लोग कूड़े के ढेर पर बैठ कर ये समझते हों कि वो मख़मली कालीन पर बैठे हैं, वहाँ सफाई के लिए लोगों से आग्रह करना बेवकूफ़ी है कि नहीं, जहाँ लोग चूल्हे के धुँए लगने से माँ की आँसू बरसाती आँखों पर लंबी-लंबी कविताएं लिखते हों, वहाँ मुफ़्त गैस कनेक्शन देने की बात करना बज्र मूर्खता है कि नहीं, जहाँ लोग चाँद पर मकान खरीदने के सपने देखते हों… वहाँ स्कूलों में लड़कियों के लिये टॉयलेट बनाने की बात कहना… क्षुद्र बुद्धि का परिचय देना है या नहीं, जहाँ लोग ख़ुद को पैदाइशी बेरोज़गार समझते हों वहाँ स्किल डेवलपमेंट की बात सोचना पागलपन है या नहीं.

आप समझते नहीं हैं मोदी जी… आप कुछ होना चाहते हैं. पर याद रखिए यहाँ की जनता मेहनत करके कुछ हो जाने वाले लोगों को कभी माफ़ नहीं करती, यहाँ ‘समझना’ ही पर्याप्त है…. और जनता समझती है कि उसने आपको चुन कर ग़लती कर ली है ख़ैर वो 2019 में ये ग़लती दोहराएगी नहीं… इतिहास हो जाने की तैयारी कर लीजिए….

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