ये कहां आ गए हम : सिर्फ एक नवजात शिशु ही है अब तनावरहित

हम सब तनाव में हैं.

कल विश्व कप फ़ुटबाल में जब मेस्सी एक सामान्य पेनल्टी को शूट नहीं कर पाया तो इसका मतलब ही है कि वो उस वक्त प्रेशर में था.

प्रेशर मतलब तनाव. गोल से चूकने के बाद अब वो और अधिक तनाव में होगा. यहां आधुनिक शब्दावली में कहना हो तो तनाव अर्थात टैंशन.

शिखर पर पहुंचने से अधिक मुश्किल है शिखर पर बने रहना. शिखर पर पहुंचने से पहले अन्य से प्रतिस्पर्धा और शिखर पर बने रहने के लिए अपने आप से प्रतिस्पर्धा. ये प्रतिस्पर्धा ही तनाव के मुख्य कारणों में से एक है.

तभी कोच कहता है नैचरल गेम खेलो. क्योंकि नेचर में तनाव नहीं है. लेकिन क्या कोच तनाव में नहीं होते हैं? उनके तनाव को हम टी वी स्क्रीन पर हर गेम में देख सकते हैं.

स्क्रीन पर और भी बहुत कुछ देखा जा सकता है कि कैसे दर्शकों में हारने वाली टीम के समर्थक तनाव में होते हैं. हरेक की अपेक्षा होती है कि उसकी टीम गोल मारे.

ये अपेक्षा ही सारे फसाद की जड़ है. जब अपेक्षा पूरी नहीं होती तो तनाव की जगह चिड़चिड़ापन ले लेता है, आक्रोश, क्रोध, गुस्सा आता है. यही कारण है कि कई बार खेल के बाद हारने पर प्रशंसक तोड़फोड़ करते हैं.

यही नहीं, प्रशंसक अपने आदर्श खिलाड़ी के आलोचक बन जाते हैं. कल से देख रहा हूँ मेस्सी के कई चाहने वाले निराश हैं. इनमें से कई अब अपने लिए कोई नया आदर्श खिलाड़ी चुन रहे होंगे. अर्थात अब मेस्सी को वो फैन फॉलोइंग नहीं मिलेगी, वो अटेन्शन नहीं मिलेगी.

यह आज नहीं तो कल, हर क्षेत्र के हर शिखर पुरुष के साथ होता है. मगर जब वे शिखर से उतरते हैं तो उन्हें इस बात को लेकर डिप्रेशन हो जाता है. ये डिप्रेशन तनाव की अंतिम पायदान (सीढ़ी) है.

शिखर से उतर कर अमूमन शिखर पुरुष इस सीढी पर चढ़ जाता है. और फिर शुरू होता है जीवन का भयावह दौर जो किसी बुरे सपने से कम नहीं.

अपेक्षा तनाव डिप्रेशन, यह आधुनिक जीवन शैली का एक कुचक्र है, जिस के चक्कर में सभी हैं. सामान्य से सामान्य. कम या ज्यादा. बच्चा बच्चा तनाव में हैं.

यहां तक कि बालक मंदिर के मासूम को भी अब आधुनिक माता-पिता तनाव में ला देते हैं. यह मत करो, ऐसे मत करो से लेकर यह करो, ऐसे करो, इस चक्कर में उसका प्राकृतिक जीवन छिन जाता है.

और फिर इस बच्चे से अपेक्षा का सिलसिला बढ़ता चला जाता है. हर माँ-बाप चाहता है कि उसका बच्चा आईआईटी पहुंच जाये. यह जानते हुए भी कि गधे कोचिंग में घोड़े नहीं बनाये जा सकते. मगर हर घर में माँ-बाप से लेकर बच्चा इस बात को लेकर तनाव में रहता है.

आस पड़ोस वाले एक दूसरे के बच्चे की परफॉर्मेन्स को देख कर तनाव में रहते हैं. तेरी कमीज मेरी से सफ़ेद कैसे? यह ईर्ष्याभाव कितना तनाव देता है उसकी कोई सीमा नहीं.

और फिर यह ईर्ष्याभाव सिर्फ बच्चे तक ही नहीं, हर उस चीज से होने लगता है जो आप के पास नहीं और पड़ोसी के पास है. फिर चाहे वो गाड़ी हो, साड़ी हो, सोफा हो, गहने हो आदि आदि, जिसे पहनो या ना पहनो मगर तनाव तो ओढ़ना ही है.

तनाव सिर्फ पढाई के क्षेत्र में ही है ऐसा नहीं, बच्चे के क्रिकेट खेलते ही अपेक्षा होती है कि वो तेंदुलकर बन जाये, बैडमिंटन खेलने जाने पर हर किसी को साइना नेहवाल बनना है.

कोई भी क्षेत्र नहीं बचता जहाँ बच्चा और माँ-बाप तनाव में ना हो. और यह तनाव का दौर उम्र के साथ बढ़ता चला जाता है. बच्चा, जवान, बूढा, औरत, आदमी, रोगी, भोगी तो तनाव में हैं ही योगी और संत भी तनाव में हैं.

ये तनाव परिवार से लेकर मोहल्ला, समाज में सर्वव्यापी और सर्वत्र है. कोई नहीं बचा. राजनेता तनाव में है तो जननेता भी. डॉक्टर, इंजीनियर से लेकर बैंकर और एक्सिक्यूटिव सब तनाव में हैं.

चपरासी से लेकर क्लर्क और अफसर सब बराबरी से तनाव में हैं, जबकि सब की जिम्मेवारी और सैलरी भिन्न भिन्न है. मंत्री तनाव में है तो बाबू भी. दुकानदार से लेकर कारखाने का मालिक भी तनाव में है.

एक भ्रष्टाचारी अफसर से मैंने बात बात में यह पूछा कि वो इतने पैसे का क्या करेगा? उसके पास कोई जवाब नहीं, मगर मैंने उसे हमेशा पैसे कमाने के तनाव में और फिर उससे अधिक उसे छुपाने के लिए तनाव में देखा.

ये बैंक बैलेंस में ज़ीरो बढ़ाने के लिए हर कोई तनाव में है, जो फिर पैकेज से ही शुरू हो जाता है. कितना पैकेज मिलेगा? इस सवाल के जवाब को लेकर हर छात्र तनाव में रहता है.

यह एक ऐसा पैरामीटर है जिसको लेकर वर वधु और उनके माँ बाप तनाव में रहते हैं. और शादी के दौरान बाराती और शादी के बाद पड़ोसी तनाव में रहते हैं.

अब कॉर्पोरेट को तनाव पैदा करने वाली फैक्ट्री घोषित कर देना चाहिए. लेकिन कॉर्पोरेट ही क्यों, शायद ही कोई ऐसा वर्क-प्लेस बचा है जो तनाव ना देता हो.

कई बार ऐसा लगता है कि हम जीवन नहीं जी रहे, तनाव जी रहे हैं. और जब पिछले दिनों एक संत ने आत्महत्या की तो समझा जा सकता है कि तनाव किस हद तक कहाँ कहाँ प्रवेश कर चुका है.

हालात इतने खराब हैं कि यहां सोशल मीडिया में मठाधीशों को इस बात का तनाव रहता है कि इस पोस्ट पर कम लाइक क्यों मिले. और उससे अधिक तनाव इस बात का कि दूसरे मठाधीशों को ज्यादा शेयर क्यों मिल रहे हैं.

यह सब हास्यास्पद लगता होगा मगर सच है. जबकि इन सोशल मीडिया का उद्देश्य कुछ और हो सकता था मगर अब यह तनाव पैदा कर रहा है.

इस तनाव से बचने के लिए मनोरंजन एक साधन हो सकता है. मगर आज की तारीख में सिनेमा और थियेटर के भीतर भयंकर तनाव है. हर परफ़ॉर्मर तनाव में है और शायद एक दर्शक से ज्यादा.

कला कभी तनाव का कारण नहीं हो सकती मगर आज हर कला का हर कलाकार तनाव में है. साहित्य में इस तनाव की चर्चा है मगर साहित्यकार, लेखक, पत्रकार सब तनाव में है. यहां तक कि बुद्धिजीवी भी तनावग्रस्त है.

सब जानते हैं कि यह हानिकारक है मगर तनाव में हैं और कुछ अधिक पढ़े लिखे तो इस बात को लेकर तनाव में हैं कि वे तनाव में क्यों हैं.

यही कारण है कि दुनिया में मानसिक रोगियों की संख्या बढ़ती जा रही है. और इस के चक्कर में अमेरिका में साइकेट्रिक का धंधा खूब चल रहा है. अब ये बीमारी पश्चिम से निकलकर पूरब में भी आम है. मानसिक रोगी हर घर में मिलेंगे.

यूं कहें तो बेहतर होगा कि हरेक थोड़ा या ज्यादा मानसिक स्तर पर रोगी है. हद तो तब हो जाती है जब मनोचिकित्सक स्वयं तनाव मे मिलता है.

इस तनाव से बचने के लिए भी हम अनेक तनाव पैदा करते हैं. सुबह उठकर पार्क में हंसने का कोर्स करने जाना है इस बात का भी तनाव है. परिवार में तनाव काम करने के लिए पति-पत्नी को किसी काउंसलर से मिलना है उसका भी तनाव. आधुनिक परिवार में तनाव कम करने के शॉर्ट और लॉन्ग कोर्स चल रहे हैं, उसे पूरा करने का तनाव.

इस तनाव का समाधान सनातन के पास था. इस संस्कृति ने इसका इंतजाम कर रखा था. यह हमारे संस्कारों द्वारा नियमित और नियंत्रित होता था. सनातन जीवन शैली तनाव से दूर रखती थी. यही कारण है जो हम शांति का पाठ पढ़ते आये हैं. संतोषी होना हमें बचपन से सिखाया जाता रहा है.

हमारे धर्म ग्रंथ जीवन के आनंद से भरे पड़े हैं. योग और ध्यान, तनाव के सामान्य मगर स्थायी उपचार हैं. मगर सनातन को पिछड़ा घोषित कर दिया गया है. और आधुनिक मानव के लिए अब मजहब सम्प्रदाय तनाव का कारण बनते जा रहे हैं.

हर पंथ सम्प्रदाय के अनुयायी के लिए उसका गुरु, ईश्वर बड़ा है, महान है, वो इस बात को लेकर तनाव देता भी और लेता भी है. धर्म के नाम पर अधर्म अधिक हो रहे हैं और धर्म अब शांति नहीं अशांति की वजह बनता जा रहा है.

एक मज़हब को लेकर तो विश्व तनाव में हैं. इन धर्मो की कट्टरता को लेकर जो लोग चुप है वे डर कर तनाव में हैं, जो बोलते हैं वे बोलकर तनाव में आ जाते हैं. सारी सीमाएं तब टूट जाती है जब एक का धर्म दूसरे के लिए तनाव बन जाता है.

अब सिर्फ एक नवजात शिशु ही तनावरहित है. वो भी तब तक जब तक उसने होश नहीं संभाला है. जब तक वो हमारे-आपके किसी चक्कर में नहीं फंसा है. और तभी तक वो जीवन का आनंद उठा रहा है.

कभी उसकी मुस्कराहट को देखिएगा, एक निश्छलता मिलेगी. जब भूख लगी तो रो लिए, वरना चिंता नही कि कल क्या होगा. यह चिंतारहित होना ही उसे विशिष्ट बनाता है. कहते भी हैं कि उसमें ईश्वर की छवि है. ईश्वर तनाव में नहीं है, जिस दिन वो तनाव में आ गया तो …?

अब इस बात को लेकर भी कइयों को तनाव होने वाला है.

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