Lateral Entry in Civil Services : उत्पादक नहीं, शोषक है नौकरशाही कार्य संस्कृति

प्रख्यात रेलवे अभियंता एवं DMRC के जनक ई श्रीधरन साहब से लगभग हर कोई परिचित होगा.

सस्ते दर में विश्वस्तरीय लोकल ट्रान्सपोर्ट सुविधा देने वाली दिल्ली मेट्रो में सफ़र करते हुए प्रथम दृष्टया हर किसी के मन में ये ज़रूर आया होगा कि “ये अपना ही देश है न? ऐसा भारत में कैसे सम्भव हुआ?”

मैंने जापान का भी मेट्रो देखा और मुझे गर्व महसूस हुआ कि अपने देश का मेट्रो जापान से भी बेहतर है!

प्लेटफ़ॉर्म हो या कोच की साफ़ सफ़ाई की बात हो, निर्माण के मानक हों, या सुरक्षा की बात हो, हर मामले में दिल्ली मेट्रो नम्बर एक है.

और ये कोई साधारण बात नहीं है, ख़ासकर एक ऐसे देश में जहाँ कोलकाता में मेट्रो परियोजना भ्रष्टाचार का शिकार होकर फ़ेल हो चुकी थी.

उससे उपजे भयावह अनुभव से उस समय किसी ने कल्पना नहीं की थी कि दिल्ली में फिर कभी ऐसा कुछ बनेगा और वो भी विश्वस्तरीय मानक का!

लेकिन ऐसा हुआ और इसका श्रेय श्रद्धेय ई श्रीधरन साहब को जाता है!

[Lateral Entry in Civil Services : नौकरशाही के नाकारापन से उपजा कदम]

सौभाग्य से पिछले वर्ष NTPC में आयोजित एक प्रोग्राम में ई श्रीधरन साहब को प्रत्यक्ष सुनने का मौक़ा मिला.

श्रीधरन साहब ने बताया कि “वो कार्यक्षेत्र में Executives के Aptitude को नहीं बल्कि Attitude को महत्व देते थे. उनका कहना था कि Aptitude माने अपने काम से जुड़ी तकनीकी बातें आदमी समय के साथ सीख जाता है, लेकिन वास्तव में Result वही deliver कर पाता है जिसका Attitude बेहतर हो और ये आदमी का संस्कार होता है जिसमें आसानी से परिवर्तन सम्भव नहीं!”

दुर्भाग्य से कोई भी कठिन से कठिन लिखित परीक्षा या इंटर्व्यू आसानी से किसी का Attitude पता नहीं कर सकती है, वो नहीं पता कर सकती कि अगला व्यक्ति ईमानदार है, कार्य के प्रति समर्पित है, समयबद्ध है, जुझारू है, उत्तरदायित्व लेने वाला है आदि. ये गुण तो वास्तविक कार्यक्षेत्र में ही पता चलता है.

इसीलिए DMRC में सिर्फ़ प्रवेश परीक्षा में प्राप्त अंकों के आधार पर ऑफ़िसर के योग्यता का निर्धारण नहीं किया जाता, बल्कि वास्तविक कार्यक्षेत्र में उसके योगदान से उसका निर्धारण होता है और उसी पर उसका कैरियर निर्भर करता है!

और Organisation का माहौल भी स्पर्धात्मक, एक ही पद के लिए अनेक लोगों के बीच प्रतिस्पर्धा, वो भी काम में रिज़ल्ट देने को लेकर. ऊपर तक जाना है तो ज़िंदगी भर जूझना होगा!

ज़्यादातर कर्मचारी guideline से बँधे होते हैं, तदनुसार कार्य करते हैं, मनमानी नहीं कर सकते! कुछ लोगों का पास ही विवेकाधिकर होता और वो विवेकाधिकार भी उसे पूरी तरह आज़मा लेने के बाद देते हैं, उसके विवेक को परखने के बाद देते हैं.

एक ही बैच में अनेकों ऑफ़िसर, लेकिन ये अधिकार मिलता है केवल कुछ को! केवल प्रवेश परीक्षा के रिज़ल्ट के आधार पर विवेकाधिकार नहीं मिलता, यहाँ प्रवेश परीक्षा के आधार पर कैरियर सुरक्षित नहीं है.

यही कारण है कि DMRC में कर्मचारी कैरियर के प्रति आश्वस्त होकर बैठते नहीं और काम के प्रति संलग्न रहते हैं, समय के साथ उनकी क्षमता निखरती जाती है.

उनमें भी ईमानदार व कर्मठ लोग ही शीर्ष पदों पर पदोन्नत होते हैं जिससे भ्रष्टाचार नियंत्रित रहता है, साथ ही प्रतिस्पर्धी माहौल में पूरा organisation पर्फ़ॉर्म करता है. इसे ही एक उत्पादक वर्क कल्चर कहते हैं!

श्रीधरन साहब ने बताया कि उन्होंने बतौर चेयरमैन जब DMRC की नींव रखी तो ऐसे ही वर्क कल्चर को प्रोत्साहित किया. तब पूरे DMRC में केवल एक निदेशक ही IAS था वो भी किसी ख़ास डिसीजन मेकिंग पोज़ीशन पर नहीं.

उन्होंने जानबूझ कर IAS मंडली को दूर रखा और केवल निदेशक को छोड़ किसी कर्मचारी को प्राइवेट केबिन व चपरासी नहीं दिया ताकि उसके अंदर साहबगिरी न प्रवेश करे और वो VIP कल्चर से दूर रहे!

बस इसी वर्क कल्चर का नतीजा है कि दिल्ली में बहुत सस्ते दर पर विश्वस्तरीय पब्लिक ट्रान्सपोर्ट उपलब्ध है. अब श्रीधरन दिल्ली मेट्रो में नहीं हैं, लेकिन उनका बनाया वर्क कल्चर स्वतः ही बेहतर लोगों को ही शीर्ष पर रखेगा और प्रतिस्पर्धी माहौल में organisation की performance सुनिश्चित करेगा!

न जाने कितनी सरकारें बदली, दिल्ली मेट्रो चल रही है! उसी बेहतरीन अन्दाज़ में!

ठीक इसी वर्क कल्चर से देश में अनेकों महारत्न व नवरत्न PSUs, ISRO व अन्य कई ऑर्गनाइज़ेशन काम कर रहे हैं, नतीजे सामने हैं!

वहीं इसी देश में एक ऐसी कार्य संस्कृति भी है जो न केवल लिखित परीक्षा व इंटर्व्यू के आधार पूरा कैरियर सुरक्षित कर देती है बल्कि बिना विवेक को परखे विवेकाधिकार तक दे डालती है! साथ ही VIP वर्क कल्चर को जन्म सिद्ध अधिकार के रूप में प्रमोट करती है. इसे ही नौकरशाही कार्य संस्कृति कहते हैं जो कि उत्पादक नहीं बल्कि शोषक है.

ऐसी कार्य संस्कृति हम अपने शहर के म्यूनिसिपल कॉरपोरेशन, विकास प्राधिकरण, नगर व ज़िला प्रशासन, रेलवे आदि में देख सकते हैं, उनका हाल भी हमारे सामने हैं.

इसी कल्चर से कोलकाता मेट्रो को लाने का प्रयास हुआ था, वो फ़ेल हो गया, भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ गया. तो इस वर्क कल्चर से देश प्रदेश कैसे आगे बढ़ सकता है?

ऐसी कार्य संस्कृति में जाने वालों का कैरियर तो सुरक्षित हो जाता है, लेकिन देश के कैरियर का अता पता नहीं होता. ये कार्यसंस्कृति नौकरशाही में ग़ुरूर तो भर देती है लेकिन देश का ग़ुरूर छलनी होता रहता है. और UPSC में सलेक्ट होने वाले अच्छे खासे मेहनती लोग कब इस सड़ी-गली कार्य संस्कृति के अंग हो जाते हैं, उन्हें भी पता नहीं चलता!

कार्यक्षेत्र में प्रतिस्पर्धा के अभाव में न उनकी बात उनके जूनियर सुनते हैं और न ख़ुद वो अपने सीनियर को गम्भीरता से लेते हैं. सब अपनी मनमानी करते हैं, नतीजा काम नहीं हो पाता. सब टाइम पास करते हैं. उनकी प्रतिभा को जंग लग जाता है. वो देश के किसी काम के नहीं बचते सिवाय एक बोझ के. अपवाद भी हर जगह होते हैं लेकिन गिनती के.

फिर प्रश्न पूछने पर नौकरशाह बहाने बनाते हैं कि इस देश के लोग ही बेकार हैं, वो नहीं सुधरेंगे तो कुछ नहीं सुधरेगा, नेता भ्रष्टाचार करवा रहा है लेकिन जब छापा पड़ता है तो अरबों रुपए की काली कमाई इन्ही के घरों से मिलती है. सुधार की दरकार कहाँ हैं, तब समझ आता है.

देश की असल समस्या पर ध्यान देना होगा. सिर्फ़ डिग्री देखकर किसी को बेहतर मत मान लीजिए.

सिर्फ़ राजनैतिक पार्टी बदलने से नहीं होगा. इसे भी बदलना होगा! और ये तब तक नहीं बदल सकता जब तक अच्छे वर्क कल्चर से निकले लोगों को नौकरशाही में शीर्ष पदों में न बिठाया जाया. साथ ही विषय वस्तु का विशिष्ट ज्ञान दूसरी बड़ी ज़रूरत है, जिसका अभाव नौकरशाही में पाया जाता है.

इन्ही चीज़ों को क्रियान्वित करने के लिए लैटरल एंट्री की आवश्यकता महसूस की गई. ये आया है, तो इसका स्वागत होना चाहिए. मालूम हो कि जापान, यूरोप, अमेरिका के देशों सहित कई अन्य देशों में लैटरल एंट्री की प्रक्रिया है. भारत इकलौता देश नहीं है.

फिर भी, किंतु-परंतु, अगर-मगर बहुत सारे हैं. इस प्रयोग के क्या परिणाम होंगे, ये समय के साथ ही पता चलेगा. लेकिन जो भी होगा, कम से कम अभी से बेहतर ही होगा.

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