शुजात बुखारी अगर मार दिए गए, तो जिनकी आवाज़ कुचली गयी वो कौन से ज़िंदा हैं?

क्या क़त्ल का मतलब मार देना भर है? क्या हत्या सिर्फ तब होती है जब किसी की जान ले ली जाए? मुझसे पूछेंगे तो जवाब होगा नहीं!

बिहार के ही एक नेताजी हैं, जो एक समुदाय विशेष से आते थे. वो एक रोज़ “जय श्री राम” कह बैठे. ज़ोरों का बवाल मचा और समुदाय विशेष का मजहब हमेशा की तरह खतरे में आ गया.

उनके मज़हबी जानकार बैठे, उनके दूसरे बड़े-छोटे मज़हबी नेता बातें करने लगे. आखिर तय हुआ कि कुफ्र हुआ है, और जो कहीं नेता जी ने जय श्री राम कहने के एवज में तौबा करके माफ़ी ना मांगी तो उन्हें मजहब से बाहर किया जाएगा.

बात इतने पर ही नहीं रुकी, कहा गया कि माफ़ी नहीं मांगी तो उनका निकाह भी खारिज़ होगा. बीवी-बच्चों पर किसी भी हक़ से उन्हें महरूम किया जाएगा.

मरता क्या न करता? आखिर नेताजी ने माफ़ी मांगी और मामला शांत हुआ. वो अब फिर कभी “जय श्री राम” तो नहीं कहेंगे.

कहते हैं कि किसी पत्रकार की हत्या हो गयी, उसकी आवाज दबा दी गयी. फ़्रांस में चार्ली हेब्दो पर हमलों के वक्त शुजात बुखारी कह रहे थे कि कहीं ना कहीं तो लकीर खींचनी होगी, आस्था के मामले में ऐसा नहीं चलता.

किसी एक मज़हब पर सवाल को गलत और उसी इलाके के अल्पसंख्यकों के धर्म के मज़ाक उड़ाए जाने पर चुप्पी साधने वाले वो एक आम ‘प्रगतिशील’ स्तंभकार थे जिन्हें मार दिया गया है.

जब उनकी मौत पर ‘कश्मीर की आवाज़ दबाये जाने’ और ‘जाने किसने क़त्ल कर डाला’ जैसे आम हथकंडे इस्तेमाल किये जा रहे हैं तो एक और घटना भी याद दिला दें.

हाल में ही एक अतुल कोचर नाम के खानसामे ने कुछ ऐसा लिख डाला जिसका मतलब होता था कि लोग 2000 साल से इस्लामिक आतंक झेल रहे हैं. अपने आस पास के हर काफ़िर पर हमला तो मज़हब के नाम पर ही किया गया है! इसमें गलत क्या था?

उसका काम छीन लिया गया और उसकी आवाज़ को बेरहमी से कुचला गया. अगर शुजात बुखारी को गोली मारना आवाज़ दबाना था तो फिर बिहार वाले नेताजी और अतुल कोचर के साथ जो हुआ वो क्या था? आवाज़ दबाने का ये तरीका कौन सा बहुत अलग है?

हाल में ही एक फिल्म देखी जिसमें एक हारे हुए अदाकार को अचानक उसके बाप का भूत दिखता है और वो भूत से पूछता है आप तो मर गए थे ना?

अदाकार अपनी अदाकारी छोड़कर कभी व्यापार कभी नौकरी से पैसे कमा लेने के चक्कर में लगा था. उसके बाप का भूत उस से पूछता है, चल मैं मरा हुआ तो तू कौन सा जिन्दा है?

चलिए शुजात बुखारी मर गया, बिहार वाले नेताजी और अतुल कोचर मरे कि नहीं, पता नहीं. ये तो पता है कि जम्मू-कश्मीर में कोई भारतीय अख़बार नहीं जाता. भारत के समाचार पत्रों और समाचार चैनलों पर भी वहां प्रतिबन्ध है.

सच तो आप भी नहीं बोलते ना? छेनू आता भी है तो चांदी के जूते खाकर लौट जाता है. पूरा सच आपके मुंह से नहीं निकलता.

संपादक पर चल रहे यौन-शोषण जैसे मामलों को आप दबा ले जाते हैं. साथियों पर बलात्कार के अभियोग आयें तो पीड़िता को बदचलन बताते हैं.

आप यौन दुराचार के लिए जुर्माना भर चुके एक लम्पट को छात्र नेता बनाते हैं. टी.आर.पी. की जहाँ उम्मीद ना हो, वहां सच्ची खबर को भी दबा ले जाते हैं.

इतना जब पक्का पता है तो किराये की कलम से ये भी लिख देते कि शुजात बुखारी अगर मार दिए गए, तो जिसकी आवाज़ कुचली गयी वो कौन से ज़िन्दा हैं? किसी के पक्ष में बोलना या ना बोलना जब राजनैतिक पक्ष-विपक्ष पर ही निर्भर है तो निष्कच्छ किराये की कलम कौन सी ज़िन्दा है?

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