आने और जाने वाली फिल्मों की समीक्षा : संजू, ऑक्टोबर

संजू : Movie Preview

संजय दत्त से बेइंतेहा चिढ़ और नापसंदगी के बावजूद चाहता हूं कि संजू को लोगों का असीम प्यार मिले क्योंकि मुझे हिरानी, विधु और रणवीर के काम और सिनेमा के लिए उनकी ईमानदारी से प्यार है.

सुनील दत्त के रोल में परेश रावल को छोड़ दिया जाए तो हिरानी की संजू में अब तक सब बढ़िया बढ़िया ही लग रहा है. संजय दत्त को महामानव बनाने और उसके अपराध का मासूमीकरण अलग विषय है, पर रणवीर संजू के मैनेरिज्म के बीच अपना पंच कम से कम प्रोमो में दे रहा है. सबसे ज़्यादा हैरान किया विकी कौशल ने, स्टार बने, न बने पर एक्टर तगड़ा है.

फिल्म के रिलीज़ हुए दो गानो में ‘कर हर मैदान फतेह’ को सुनकर लग रहा है कि इंडिया के मैच जीतने पर न्यूज़रूम वालों को क्लिप्स के बैकग्राउंड में बजाने को नया गाना मिल गया है. विराट के मैदान पर एग्रेशन को इस गाने की सख्त ज़रूरत थी.

कितना ज़्यादा चरस बो दिया है न्यूज़ चैनल ने कि हमें पता है कि हमें बनाया जा रहा है पर हम हँसते-हँसते इंजॉय करते बनते जाते है.

दूसरा गाना ‘बढ़िया बढ़िया’ बहुत प्यारा है. सोनू निगम के साथ सुनिधि चौहान ने इतना बढ़िया गाया है कि उसका सारा करियर याद आ गया. कितना कुछ दिया उसने और अब शायद किसी को याद भी नही कि अब उसे गाने मिलने कम या बन्द ही हो गए है. ये सुनिधि के करियर का उतराव है, पर उसके टैलेंट का शिखर. विधु का सिनेमा हमेशा की तरह हर प्रतिभा को उसका यथेष्ठ सम्मान देने के लिए हाज़िर है.

– नवल किशोर व्यास

October : मीठी सी कहानी

शिउली और डैन (नायिका और नायक) के मध्य विशेष परिस्थिति में उपजे प्रेम को दर्शकों के सम्मुख बहुत शान्ति से सम्प्रेषित करने में प्राकृतिक दृश्यों का खूबसूरत प्रयोग करने वाली फिल्म…

“शिउली” बंगाली भाषा में हरसिंगार/ पारिजात को बोलते हैं. भीनी मदहोश करने वाली खास खुशबू जो रात भर महकती है, सुबह होते ज़मीन पर बिछ जाती है.

मन, सुगन्ध की तलाश में भटकता हुआ, इन फूलों की सफेदी देख, मोहित होने से खुद को नहीं रोक पाता.

प्रेम कथाएं अनूठी और अधूरी होकर भी पूरी होती है. सच है कि बिना प्रेम जीवन तो क्या एक गीत भी नहीं लिखा जा सकता. बारिश की बूंदों से, चिड़ियों की चहचहाहट से, बादलों के घिरने से , मिट्टी की खुशबू से और ज़मीन पर बिखरे फूलों से लगाव नैसर्गिक है इसलिए प्रेम है

बड़ी ही अलग सी खूबसूरती समेटे प्रेम, जो October में सहेजा गया है, खुशबू जितना भीना भीना, अनकहा, पाकीज़ा और अनसमझा.

जो कभी कहा ही न जाए, उसे कोई समझने लग जाए, बिना पुकारे ही कोई आवाज़ों के मायने समझ आने लग जाए

‘शायद’ नहीं ‘यक़ीनन’ होते हैं रूह के रिश्ते, जिनमें साथ जीना, साथ मरना, साथ कहना ज़रूरी नहीं होता, बस जज़्ब करना होता है

आश्चर्यचकित करते हैं ‘वरुण’ , पिछली बार ‘बदलापुर’ में प्रभावित किया था, और इस बार ‘अक्टूबर’ में

दृश्य ऐसे हैं कि आँखों में नहीं, ज़ेहन में समा चुके हैं
नायिका और नायक के मध्य मौन संवाद रूप अन्तर्क्रिया जाने कब होती है, लेशमात्र भी प्रेमालाप नहीं.

प्रेम: हरसिंगार के झरते हुए फूलों से, नायक नायिका के मध्य का सारा मूक वार्तालाप शिउली के फूलों ने निभाया.

पसंद आई फ़िल्म और बहुत दिनों तक याद रखने वाला है इस फ़िल्म का कथानक और इसका संगीत फिल्म में प्राण फूँकता है

अक्टूबर को एक क्लासिक फ़िल्म कहा जा सकता है.

“कलात्मक” फिल्म ये कहती है केवल साथ जीना ही नहीं बल्कि पल भर साथ होना, साथ देना, दर्द अनुभव करना और चले जाने के बाद भी सोचते रहना “प्रेम” है.

निश्छल और स्पष्ट, नायक की चेष्टाओं और नायिका की जिजीविषा में निहित अंतहीन प्रेम, फिर कभी मिलेंगे शेष को अशेष बनाने के लिए

– प्रिया वर्मा

 

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